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इंदौर में 'बम' हुआ डिफ्यूज,कांग्रेस उम्मीदवार अक्षय कांति बम ने वापस लिया अपना नामांकन

सरकार से नाराज शासकीय कर्मचारियों ने दिखाई मतदान में उदासीनता,वोटिंग में नहीं ली दिलचश्पी

भोपाल लोकसभा सीट पर तीन चुनाव से लगातार बढ़ा भाजपा का वोटबैंक,कांग्रेस का घटा
मोदी की गारंटी हो या फिर भाजपा की सरकार द्वारा किए गए काम हों लेकिन भोपाल की लोकसभा सीट (bhopal lok sabha) पर भारतीय जनता पार्टी का वोटबैंक लगातार बढ़ा है। पिछले तीन चुनाव की बात करें तो भाजपा ने हर बार एअ नए कैंडीडेट को मौका दिया है और हर बार भाजपा के उम्मीदवार भोपाल में रिकार्ड मतों से जीत दर्ज करने में कामयाब हुए हैं। वहीं प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस का वोटबैंक लगातार खिसकता चला गया है। तीसरे मोर्चों में शामिल बसपा,सपा और जदयू के वोटिंग शेयर भी लगातार कम हो रहे हैं। पिछले तीन चुनावों पर नजर डालें तो इन चुनावों में प्रदेश के मतदाताओं का भरोसा भी भारतीय जनता पार्टी पर बढ़ा है। वर्ष 2009 के चुनाव में भाजपा को कुल मतदाताओं में से 43.45 प्रतिशत यानि 84 लाख 65 हजार 532 मतदाताओं ने भाजपा को वोट दिया। इसके अगले साल 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा का वोट प्रतिशत बढ़ कर 54.02 प्रतिशत हो गया। और एक करोड़ 60 लाख मतदाताओं ने भाजपा उम्मीदवारों को जिता कर संसद भेजा। इसके बाद अगले पांच साल में भाजपा की रीति-नीति ने मतदाताओं को फिर प्रभावित किया और 2019 में भाजपा वोटिंग शेयर बढ़ कर 58 प्रतिशत हो गया। कुल दो करोड़ 14 लाख 6 हजार 887 मतदाताओं ने भाजपा उम्मीदवारों को जिताने में सार्थक भूमिका का निर्वहन किया। इस मामले में बीजेपी प्रदेश मीडिया विभाग के प्रभारी आशीष अग्रवाल का कहना है कि भाजपा की सेवा और सुशासन की नीतियों ने भाजपा के प्रति मतदाताओं का रुझान बढ़ाया है। जनता अब मेनिफेस्टो को मानने लगी है। पिछले तीन चुनाव में जिस तरह से भाजपा को बढ़त मिली है यही वो कारण हैं कि लगातार जनता का रुझान भाजपा की तरफ हो रहा है।

संविदा कर्मचारियों के लिए बड़ी खबर, नियमितीकरण पर सुप्रीम कोर्ट ने लिया अहम फैसला
देश की सर्वोच्च आदलत ने संविदा (samvida employees) और अनियमित कर्मचारियों के नियमितीकरण को लेकर बड़ा फैसला लिया है। दरसअल संविदा कर्मचारियों की याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि बारहमासी/स्थायी प्रकृति के काम करने के लिए नियोजित श्रमिकों को अनुबंध श्रम (विनियमन और उन्मूलन) अधिनियम, 1970 के तहत उन्हें सिर्फ स्थायी नौकरी के लाभ से वंचित करने के लिए अनुबंध श्रमिक नहीं माना जा सकता है। Mukhbirmp.com को मिली जानकारी के मुताबिक जस्टिस नरसिम्हा ने अपने आदेश में हाई कोर्ट और इंडस्ट्रियल ट्रिब्यूनल के उस फैसले को बरकरार रखा है, जिसमें रेलवे लाइन के किनारे सफाई करने वाले मजदूरों को संविदा कर्मी से हटाकर स्थायी कर्मी का दर्जा और वेतन-भत्ते का लाभ देने का आदेश दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने इस तथ्य को रेखांकित किया कि रेलवे लाइन के किनारे गंदगी हटाने का काम ना सिर्फ नियमित है बल्कि बारहमासी और स्थायी प्रकृति का है। कोर्ट ने कहा कि इन कारणों से अनुबंध पर बहाल कर्मचारियों को स्थायी किया जाना चाहिए। दरअसल, महानदी कोलफील्ड्स ने इस तरह के 32 कॉन्ट्रक्ट कर्मचारियों में से 19 की नौकरी परमानेंट कर दी थी, जबकि 13 को अनुबंध कर्मी के रूप में ही छोड़ दिया था, जबकि सभी कर्मियों की ड्यूटी एक समान और एक ही प्रकृति की थी। इसके खिलाफ यूनियन ने केंद्र सरकार और महानदी कोलफील्ड्स को ज्ञापन सौंपा लेकिन जब कार्रवाई नहीं हुई तो इंडस्ट्रियल ट्रबियूनल में मामला पहुंचा, जहां ट्रिब्यूनल ने सभी 13 अनुबंध कर्मियों को नियमित करने का आदेश दिया। बाद में उसी फैसले को हाई कोर्ट ने भी बरकरार रखा, जिसके खिलाफ महानदी कोलफील्ड्स ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था लेकिन वहां से भी उसे निराशा हाथ लगी है।

डॉ. नरोत्तम मिश्रा राजनीति की चलती फिरती पाठशाला,जिसने जीवन में हारना नहीं सीखा
मप्र में नेताओं की कमी नहीं है लेकिन बात जब पूर्व गृह मंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा (dr narottam mishra) की आती है तो सभी के शिर खुद ब खुद उनके सजदे में झुक जाते हैं। संसदीय ज्ञान ऐसा कि सालों तक लोकसभा का प्रतिनिधित्व करने वाले पूर्व सीएम कमलनाथ (kamal nath) भी उनकी बातों का तोड़ नहीं निकाल पाते हैं। एक वाक्य याद आता है जब कांग्रेस पार्टी शिवराज सरकार (shivraj government) के खिलाफ सदन में अविश्वास प्रस्ताव लेकर आई। लेकिन उस अविश्वास प्रस्ताव को पूर्व गृह मंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा ने पल भर में तहस नहस कर दिया। राजनीतिक गलियारों में पूर्व सीएम शिवराज और डॉ. नरोत्तम मिश्रा को एक दूसरे का विरोधी कहा जाता है लेकिन जब भी पूर्व सीएम पर शंकट आया है तो सबसे पहले डॉ. नरोत्तम मिश्रा उनकी ढाल बन कर खड़े हुए। साल 2019 में भाजपा की सरकार जाने के बाद जिस प्रकार से डॉ. नरोत्तम मिश्रा के प्रयासों से फिर भाजपा की सरकार बनी उसमें पूर्व गृह मंत्री की क्या भूमिका थी अब किसी से छुपी नहीं है। फिर कोरोनाकाल में डॉ. नरोत्तम मिश्रा ने स्वास्थ्य मंत्री की जिम्मेदारी जिस प्रकार से संभाली और वैक्सीनेशन के काम को जिस प्रकार से उन्होने गति दी उसके अलावा आवागमन के माध्यम बंद होने के वाबजूद पूर्व गृह मंत्री ने लोगों को खासकर मजदूरों को उनके घर तक पहुंचाने का लगातार प्रयास किया और उसमें वो सफल भी रहे। साल 2023 के विधानसभा चुनाव में डॉ. नरोत्तम मिश्रा चुनाव हार गए लेकिन उन्हे पार्टी ने ज्वाइनिंइ कमेटी का संयोजक बनाया तो उन्होने फिर अपनी उपस्थिति दर्ज कर चार लाख से अधिक लोगों को भाजपा की सदस्यता दिला दी जो पूरे देश में रिकार्ड है। पूर्व गृह मंत्री पार्टी में अपनी भूमिका को लेकर बड़ी सहजता से कहते हैं कि वो एक छोटे से कार्यकर्ता हैं और पार्टी उन्हे जो भी काम देगी वो उसे पूरी निष्ठा और ईमानदारी से निभाते रहेंगे। बांकी पूर्व गृह मंत्री का यह भी कहना है कि वो कर्म पर विश्वास रखते हैं फल ऊपर वाले और पार्टी के शीर्श नेत्रृत्व के हाथ में है।

शासकीय कर्मचारी बढ़ाएंगे भाजपा की टेंशन,गुप्त रुप से चल रही लाविंग,4% डीए की मोहन सरकार ने नहीं ली गारंटी
लोकसभा का चुनाव प्रचार पूरे शबाब पर है। मोदी के चेहरे पर भाजपा के नेता लगातार चुनाव प्रचार कर रहे हैं। लेकिन एमपी सरकार (mp government) ने जिस प्रकार से शासकीय कर्मचारियों (government employees) को तड़पा-तड़पा कर चार फीसदी डीए दिया है उससे प्रदेश के शासकीय कर्मचारी खासे नाराज हैं। प्रदेश की मोहन सरकार के चार फीसदी डीए देने के बाद भी राज्य सरकार के कर्मचारी केन्द्रीय कर्मचारियों की तुलना में उनसे चार फीसदी डीए कम पा रहे हैं। वर्तमान में राज्य के शासकीय कर्मचारी 46 प्रतिशत के हिसाब से डीए पा रहे हैं तो वहीं केन्द्रीय कर्मचारी 50% के हिसाब से मंहगाई भत्ता पा रहे हैं। मतलब हर कर्मचारी को हर महीने में चार से पांच हजार रुपये का नुकसान हो रहा है। ऐसे में मोदी की गारंटी पर शासकीय कर्मचारी किस प्रकार से विश्वास कर आएंगे। Mukhbirmp.com की टीम ने प्रदेश के शासकीय कर्मचारियों के संगठनों से संपर्क किया तो चुनाव आचार संहिता के चलते उन्होने खुल कर तो नहीं बोला लेकिन नाम न छापने की शर्त पर कहा कि जिस प्रकार से राज्य सरकार उनकी उपेक्षा कर रही है उससे सभी शासकीय कर्मचारियों में भाजपा सरकार के प्रति काफी नाराजगी है। और वो नाराजगी कहीं न कहीं तो दिखेगी और चुनाव से बेहतर कोई और प्लेटफार्म नहीं हो सकता। गौरतलब है कि जिस प्रकार से भाजपा प्रदेश की सभी 29 लोकसभा सीटें जीतने का दावा कर रही है उसमें अगर प्रदेश के साढ़े सात लाख से ज्यादा शासकीय सेवकों ने कहीं भाजपा से किनारा किया तो उसमें भाजपा की उम्मीदों पर पानी फिर सकता है। प्रदेश की मोहन सरकार ने चुनाव आचार संहिता लगने के ठीक दो दिन पहले राज्य के शासकीय कर्मचारियों को चार फीसदी डीए देने का ऐलान किया था। जिसके तहत महंगाई भत्ता 42% से बढ़कर 46% हो गया है। आदेश में वित्त विभाग ने कहा है कि कर्मचारियों को एक जुलाई 2023 से 4 प्रतिशत महंगाई भत्ता स्वीकृत किया जाता है। अब शासकीय कर्मचारियों का मानना है कि चुनाव था इसलिए चार फीसदी मंहगाई भत्ता दे दिया गया है। लेकिन वो फिर भी केन्द्र से चार फीसदी पीछे हैं। और चुनाव समाप्त होने के बाद अब सरकार उनके बचे हुए चार फीसदी मंहगाई भत्ते को देगी या नहीं देगी इसकी गारंटी मोहन सरकार ने नहीं ली है इसलिए कर्मचारी सोच में हैं कि वो भाजपा को वोट कैसे दें क्योंकि उसी भाजपा की प्रदेश में सरकार है जिसने अब भी उनका चार फीसदी मंहगाई भत्ता रोक रखा है।

भाजपा और कांग्रेस के लिए विंध्य बना वोट 'मशीन' तैयार नहीं कर पाए नेत्रृत्व
राजनीतिक पार्टियों के लिए विंध्य (vindhya politics) हमेशा वोट की एक मशीन की तरह रहा है। पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह और श्रीनिवास तिवारी का स्वर्गवास होने के बाद कांग्रेस इस क्षेत्र से विलुप्त हो गई और भाजपा ने लगातार जीत का पर्चम लहराया। लेकिन भाजपा के लिए विंध्य हमेशा वोटिंग मशीन से ज्यादा और कुछ नहीं रहा। 30 विधानसभा क्षेत्र वाले विंध्य में एकतरफा बीजेपी की सीटें आ रही हैं लेकिन भाजपा ने राजेन्द्र शुक्ला के अलावा यहां से किसी अन्य चेहरे को तरजीह नहीं दी। जबकि राजेन्द्र शुक्ला का आम आदमी से कोई सरोकार नहीं वो सिर्फ वीवीआपी लोगों के नेता हैं आम नागरिक की पहुंच से वो काफी दूर हैं। गिरीश गौतम ने लगातार पांच बार विधानसभा का चुनाव जीता लेकिन उन्हे पार्टी ने कभी महत्व नहीं दिया। दिब्यराज सिंह लगातार तीन बार से चुनाव जीत रहे हैं लेकिन उन्हे भी पार्टी ज्यादा महत्व नहीं दे रही है। सीधी से केदारनाथ शुक्ला कई बार विधायक रहे उन्हे पार्टी ने कभी महत्व नहीं दिया अंत में पार्टी से बाहर का रास्ता भी दिखा दिया गया। सतना की बात करें तो वहां से भी भाजपा ने किसी नेता को महत्व नहीं दिया। मतलब साफ है कि भाजपा के एमपी का जो नेत्रृत्व है वो विंध्य में बड़े नेताओं को तैयार नहीं होने देना चाहता। भाजपा के वरिष्ठ नेताओं को मालूम है कि अगर विंध्य से बड़े नेता तैयार होंगे तो ग्वालियर-चंबल,बुंदेलखंड और मालवा-निमाड़ का प्रतिनिधित्व कम हो जाएगा। इसी लिए भाजपा के संगठन की तरफ से विंध्य में नेत्रृत्व तैयार नहीं होने दिया जाता है। कांग्रेस की तरफ से नेत्रृत्व तैयार करने का प्रयास जरुर हुआ लेकिन कमलेश्वर पटेल पर कांग्रेस ने दांव लगाया जिस पर क्षेत्र की जनता विश्वास नहीं करती। कमलेश्वर पटेल कुर्मी समाज से आते हैं और कट्टर कुर्मी के रुप में उनकी पहचान है। महज 15 महीने की सरकार में उनके बंगले पर कुर्मी समाज के अलावा किसी और वर्ग को महत्व नहीं दिया गया। यही कारण है कि आज लोकसभा चुनाव में कमलेश्वर पटेल की हालत खराब है। अजय सिंह (राहुल) के रुप में कांग्रेस के पास जरुर एक बड़ा चेहरा विंध्य में था लेकिन कांग्रेस ने उन्हे लगातार उपेक्षित कर अजय सिंह के राजनीतिक कैरियार को अंत की ओर अग्रसर कर दिया है। कुल मिला कर विंध्य क्षेत्र भाजपा और कांग्रेस के लिए वोट मशीन से ज्यादा कुछ नहीं है।

खुद के बनाए जाल में उलझी कांग्रेस,अपनी ही सीट पर उलझे कांग्रेस के महारथी
लोकसभा चुनाव में एमपी से करीब दस सीटें जीतने का कांग्रेस (mp congress) के नेता दावा कर रहे हैं जबकि हकीकत उसके कुछ उलट ही देखने को मिल रही है। दरअसल कांग्रेस पार्टी में जिन नेताओं के ऊपर पार्टी प्रत्याशियों के पक्ष में संगठन को सक्रिय करने की सियासी जिम्मेदारी थी अब वो सभी नेता अपनी ही सीट पर उलझ कर रह गए हैं। कांग्रेस पिछड़ा वर्ग विभाग के प्रदेश अध्यक्ष सिद्धार्थ कुशवाहा सतना से तो आदिवासी कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष रामू टेकाम को बैतूल लोकसभा सीट से चुनाव मैदान में उतार गया है। इसी तरह पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह राजगढ़, कमलनाथ छिंदवाड़ा और कांतिलाल भूरिया रतलाम में उलझ कर रह गए हैं। विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद कांग्रेस ने रणनीति के तहत कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाने के लिए अपने वरिष्ठ नेताओं को चुनाव मैदान में उतारा है। गौरललब है कि 2018 से पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ के हाथों में पार्टी की पूरी बागडोर थी वही सत्ता और संगठन के केंद्र बिंदु थे उन्होंने अपने हिसाब से जमत भी की थी लेकिन जब चार माह पहले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को पराजय मिली तो पार्टी ने उन्हें हटाकर जीतू पटवारी को प्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष बना दिया। इसके बाद प्रदेश में आदिवासी और पिछड़ा वर्ग को पार्टी के पक्ष में जोड़ने की जिम्मेदारी जिन संगठनों की थी, उनके मुखिया ही चुनाव लड़ रहे हैं। Mukhbirmp.com को मिली जानकारी के अनुसार न तो सिद्धार्थ कुशवाहा सतना छोड़ रहे हैं और न ही रामू टेकाम बैतूल से बाहर निकल पा रहे हैं। इससे संगठन की गतिविधियां भी एक प्रकार से तप हो गई हैं और टीम भी एक दिशा में काम नहीं कर पा रही है। यही स्थिति युवा कांग्रेस के साथ भी हो रही थी। इसके प्रदेश अध्यक्ष डॉ. विक्रांत भूरिया के पिता कांतिलाल भूरिया रतलाम लोकसभा से चुनाव लड़ रहे हैं। वह स्वयं झाबुआ से विधायक भी हैं जो रतलाम लोकसभा क्षेत्र में ही आता है इसलिए वो पूरा समय वहीं दे रहे थे। इससे संगठन की गतिविधियां प्रभावित हो रही थी जिसे देखते हुए उन्होंने पद छोड़ने की पेशकश की, जिसे स्वीकार करते हुए अब मितेंद्र सिंह को अध्यक्ष बनाया गया है। फिलहाल भाजपा के आगे कांग्रेस के चुनावी जमावट की बात करें तो कांग्रेस बेहद कमजोर नजर आ रही है। भाजपा के नेता एक साथ एक दिन में आठ से दस लोकसभा सीट कवर कर रहे हैं तो वहीं कांग्रेस एकात सीट से आगे नहीं निकल पा रही है। इसके अलावा कांग्रेस इतने बड़े चुनाव में कांर्यकर्ताओं की कमी से भी जूझ रही है।

...और कितना टूटेगी कांग्रेस,क्या कर रहे हैं पीसीसी चीफ पटवारी,फिर सैकड़ों कार्यकर्ता बीजेपी में हुए शामिल
कांग्रेस पार्टी में लगातार पलायन का दौर जारी है। शुक्रवार को पूर्व विधायक पारुल साहू (parul sahu) सहित सैकड़ों कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने बीजेपी का दामन थाम लिया। ज्वाइनिंग कमेटी के प्रदेश संयोजक डॉ. नरोत्तम मिश्रा (narottam mishra) मुख्यमंत्री मोहन यादव (mohan yadav) और पूर्व सीएम शिवराज सिंह चौहान (shivraj singh chouhan) की उपस्थिति में सैकड़ों कांग्रेसियों ने अपने हाथ में फूल थाम लिया। ज्वाइन करने वाले नेताओं में सागर जिले की सुरखी से पूर्व विधायक पारुल साहू,अमित सक्सेना जिला पंचायत उपाध्यक्ष छिंदवाड़ा,शेर सिंह यादव प्रदेश महामंत्री कांग्रेस,डॉक्टर प्रतिमा राजगोपाल,पूर्व पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन, प्रशासन अकादमी,शाहिद खान, पूर्व अध्यक्ष, शासकीय महाविद्यालय, छिंदवाड़ा सहित छिंदवाड़ा और विदिशा,रायसेन बेगमगंज के सैकडों कांग्रेसियों ने भाजपा की सदस्यता ग्रहण कर ली। गौरतलब है कि जिस दिन से जीतू पटवारी को मप्र कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष की कमान सौंपी गई है उसी दिन से कांग्रेस पार्टी में लगातार पलायन का दौर जारी है जो अब तक नहीं थमा है। सदस्यता समारोह के दौरान सीएम मोहन यादव ने कहा कि जिस दिन कांग्रेस ने भगवान राम के स्थापना का निमंत्रण ठुकराया उसी दिन से कांग्रेस के पतन का दौर शुरु हो गया है और अब सभी पीएम मोदी के नेत्रृत्व में देश को आगे बढ़ाना चाहते हैं। इसी लिए सब बीजेपी में अपना भविष्य देख रहे हैं।

आदिवासी वोट पर भाजपा की नजर,संघ ने संभाला मोर्चा
भारतीय जनता पार्टी अपनी कमजोर कड़ी पर हमेशा जनर रखती है और उसमें सुधार करने का प्रयास करती है। लोकसभा चुनाव की तैयारियों में जुटी भारतीय जनता पार्टी ने आदिवासी वोटबैंक (adivasi votebank) को अपनी तरफ करने के लिए अपने अलग-अलग अनुशांगिक संगठनों को मैदान में उतार दिया है। उन्ही अनुशांगिक संगठनों में भाजपा का सबसे प्रमुख अंग है 'संघ' जिसके पदाधिकारियों ने आदिवासी बहुल क्षेत्रों में डेरा डाल दिया है। Mukhbirmp.com को मिली जानकारी के अनुसार विधानसभा चुनाव में भाजपा आदिवासी वर्ग के लिए सुरक्षित 47 सीटों में से 24 सीटें ही जीत पाई थी। और 23 सीटों पर भाजपा को हार का सामना करना पड़ा था। इसलिए लोकसभा चुनाव में आदिवासी सीटों पर भाजपा अधिक फोकस कर रही है। भाजपा की तरफ से संघ प्रचारकों ने आदिवासी सीटों और खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में मोर्चा संभाल लिया है। छिंदवाड़ा जिले में महाराष्ट्र के संघ प्रचारक प्रभारी बनाए गए हैं। संघ प्रचारकों ने गांव में ही डेरा डाल दिया है। संघ के कार्यकर्ता लगातार आदिवासियों के बीच समय बिता रहे हैं। कुछ गांव में संघ की शाखा से दिनचर्या की शुरुआत की जा रही है। 2019 के लोकसभा चुनाव में आदिवासी वर्ग के लिए सुरक्षित 47 में से 14 विधानसभा सीटों पर भाजपा को कम वोट मिले थे। यहां 2023 के विधानसभा चुनाव में 22 सीटों पर कम वोट मिले थे। भाजपा और संघ ने इन सीटों पर विधानसभा प्रभारी भी बनाए हैं। कम वोटिंग वाली सीटों पर प्रभारी,सह प्रभारी और संयोजक नियुक्त किए गए हैं।

'दिग्विजय' के किले पर नरोत्तम मिश्रा की 'सेंधमारी' भरी जीत की हुंकार
राजगढ़ लोकसभा (rajgarh constituency) का चुनाव अब दिलचश्प हो चला है। दरअसल चुनाव के दिलचश्प होने का कारण दो राजनीतिक महारथियों के आमने-सामने होने के कारण हुआ है। पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह (digvijaya singh) राजगढ़ लोकसभा सीट से कांग्रेस उम्मीदवार के तौर पर चुनाव मैदान में हैं। वहीं भाजपा की तरफ से राजनीति के खिलाड़ी डॉ. नरोत्तम मिश्रा (narottam mishra) को भाजपा उम्मीदवार को जिताने का जिम्मा सौंप दिया गया है। अभी तक माना जा रहा था कि राजगढ़ में दिग्विजय सिंह आसानी के साथ चुनाव में जीत दर्ज कर लेंगे और भाजपा के सभी 29 लोकसभा सीटें जीतने के मंसूबों पर पानी फिर सकता है। ऐसे में भारतीय जनता पार्टी ने अपने सबसे भरोसेमंद नेता को राजगढ़ चुनाव की कमान सौंप दी है जिनकी जिंदगी में हार जैसा शब्द नहीं है। डॉ. नरोत्तम मिश्रा पूर्व प्रधानमंत्री अटलविहारी वाजपेयी की उस कविता को ध्येय वाक्य मानते हैं जिसमें उन्होने कहा था 'हार नहीं मानूंगा,रार नहीं ठानुंगा' इसी कविता को ध्येय वाक्य मानते हुए पूर्व गृह मंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा ने बुधवार को राजगढ़ में जीत की हुंकार भरते हुए दिग्विजय सिंह के किले पर सेंधमारी का ऐलान कर दिया। गौरतलब है कि इतिहास के पन्नों पर नजर डालें तो जब भी भाजपा ने पूर्व गृह मंत्री को जब कोई बड़ी जिम्मेदारी सौंपी है तब-तब उन्होने पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के विश्वास पर खरा उतर कर पार्टी की झोली में जीत डाली है। Mukhbirmp.com को मिली जानकारी के अनुसार राजगढ़ संसदीय क्षेत्र के भाजपा कार्यकर्ताओं में हार की हताशा घर कर रही थी लेकिन डॉ. नरोत्तम मिश्रा की एक सभा ने मानों भाजपा कार्यकर्ताओं को संजीवनी देने का काम किया हो। जिस प्रकार से पूर्व गृह मंत्री ने राजगढ़ में सभा के दौरान कार्यकर्ताओं को संबोधित किया है उसके बाद भाजपा के कार्यकर्ता एक नए जोश और उत्साह के साथ चुनाव प्रचार में उतर चुके हैं। यूं ही डॉ. नरोत्तम मिश्रा को पार्टी का 'संकट मोचक' नहीं कहा जाता है। पार्टी को जब भी विषम परिस्थिति दिखती है तो पूर्व गृह मंत्री को वहीं पर खड़ा कर दिया जाता है जो अपने चिर परिचित अंदाज में जनता का मन बदल कर पूरा माहौल भाजपा के पक्ष में करने की महारत रखते हैं।

डेढ़ घंटे की प्रेसवार्ता में कांग्रेस नेता नहीं बता पाए कि आखिर वो कहना क्या चाहते हैं?
कांग्रेस के घोषणा पत्र को लेकर एमपी कांग्रेस कार्यालय में प्रेसवार्ता (congress press conference) का आयोजन किया गया। जिसमें प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी (jitu patwari) ,नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार,विवेक तन्खा अरुण यादव,पूर्व सीएम दिग्विजय सिंह और कांग्रेस मीडिया विभाग के अध्यक्ष मुकेश नायक शामिल हुए। प्रेसवार्ता के दौरान सभी नेताओं ने एक-एक कर अपनी तरफ से मीडिया को संबोधित किया। करीब डेढ़ घंटे तक चली प्रेसवार्ता के दौरान कांग्रेस का एक भी नेता यह नहीं बता पाया कि वो कहना क्या चाहता है। विवेक तन्खा के हाथ में माइक गया तो वो न्यायालय पर सवाल खड़ा करते नजर आए,अरुण यादव के पास माइक आया तो उन्होने किसानों के विषय में बात की। जीतू पटवारी ने भी कई मिनट तक अपनी बात रखी लेकिन उन्हे खुल नहीं मालूम होगा कि उन्होने किस बारे में बात की है। इन सब नेताओं की बात खत्म हुई अथवा बता नहीं पाए तो जेपी धनोपिया को अंत में माइक पकड़ा दिया गया। कुछ देर जेपी धनोपिया ने बोला तो इतना समझ में आया कि कांग्रेस के नेत्रृत्व में सरकार बनी तो मनरेगा में 400 रुपये के हिसाब से मजदूरी मिलेगी। प्रेसवार्ता के दौरान मुकेश नायक ने अल्पसंख्यकों का मुद्दा उठाते हुए कहा कि सबको लिख कर ले दिया गया है जिसको जो पूछना हो पूछ सकते हैं। दिग्विजय सिंह ने प्रेस वार्ता के दौरान कहा कि कांग्रेस कभी भेदभाव नहीं करती सभी को साथ लेकर चलती है। पूर्व मुख्यमंत्री ने केन्द्र पर आरोप लगाते हुए कहा कि क्या कारण है कि केन्द्र सरकार जातिगत जनगणना क्यों नहीं करवाती है। दिग्विजय सिंह ने कहा कि अर्जुन सिंह की सरकार में भी पिछड़ा वर्ग को 27 फीसदी आरक्षण देने की कोशिश हुई थी लेकिन न्यायालय ने यह कहा था कि 50 फीसदी से ज्यादा आरक्षण नहीं दिया जा सकता। दिग्विजय सिंह ने कहा कि आरक्षण के लिए भारतीय संबिधान में संशोधन किया जाएगा।