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मौन होकर चुनाव की बिसात बिछा रहे भाजपा के नेता,असंतुष्टों को भी साधने में हो रहे कामयाब
भाजपा के केन्द्रीय नेतृत्व ने इन दिनों प्रदेश विधानसभा की चुनाव कमान संभाल रखी है। केन्द्रीय मंत्री और मप्र के चुनाव प्रभारी भूपेन्द्र यादव (Bhupendra Yadav) और सह प्रभारी अश्वनी वैष्णव (Ashwini Vaishnaw) दोनों ही नेता मौन रह कर पार्टी की सारी रणनीति तैयार कर रहे हैं। कई दिनों से दोनों नेताओं ने मध्य प्रदेश में ही डेरा जमाया हुआ है। ये नेता ना सिर्फ मप्र पर नजर रखे हुए हैं बल्कि टिकट वितरण से लेकर कार्यकर्ताओं में उठ रहे असंतोष को थामने के साथ समन्वय भी बिठा रहे हैं (mp elections)। प्रतिदिन दोनों नेता मप्र के सैकड़ों नेताओं से संवाद भी कर रहे हैं। इनके वार रुम से विपक्ष की पल-पल की गतिविधियों पर नजर रखी जा रही है। दूसरी ओर, कई नेताओं को अलग-अलग जिम्मेदारी सौंपी गई है। चुनाव आयोग प्रबंधन के कार्य में एसएस उप्पल,अशोक विश्वकर्मा सहित छह लोगों की टीम लगाई गई है। इसी तरह चुनाव प्रबंधन के कार्य की जिम्मेदारी प्रदीप त्रिपाठी,आलोक संजर,विनोद गोटिया और राजेन्द्र सिंह को सौंपी गई है। प्रधानमंत्री,गृह मंत्री राष्ट्रीय अध्यक्ष के प्रवास के दौरान उनके आवागमन और ठहरने की व्यवस्था के लिए अलग से समिति बनाई गई है। इसका जिम्मा आनंद सिंह सेंगर को दिया गया है। विमानन का काम राजेन्द्र राजपूत देख रहे हैं। मीडिया समन्वय का काम आशीष अग्रवाल और इंटरनेट मीडिया का काम अभिषेक शर्मा के जिम्मे है। विज्ञापन क्रिएशन और काल सेंटर के लिए पांच-पांच लोगों की टीम कार्य कर रही है। यह व्यवस्था प्रदेश से लेकर संगठनात्मक 57 जिला मुख्यालयों तक बनाई गई है।

जगह-जगह घूम रहा हाथी,पंजे और फूल से मुकाबला करने कई दावेदार हाथी पर हुए सवार
मप्र के विधानसभा चुनाल में एकबार फिर हाथी जमकर घूम रहा है (bsp mp)। साल 2018 विधानसभा चुनाव की तुलना में इस बार हाथी अच्छी खुराग लेकर निकला है। यूपी से लगे क्षेत्रों में हाथी, पंजे और कमल को टक्कर देने के लिए लगातार फुफकार रहा है। भाजपा (mp bjp) और कांग्रेस (mp congress) के कई बागियों ने बसपा का दामन थामा और उन्हे 24 घंटे के अंदर बसपा की ओर से टिकट देकर चुनाव मैदान में उतार दिया गया है। यह बागी ऐसे हैं कि इनका वोटबैंक भाजपा और कांग्रेस का ही है और ये नुकसान भी भाजपा और कांग्रेस को ही पहुंचाएंगे। साल 2018 में करीब एक दर्जन ऐसी सीटें थी जहां पर बसपा के उम्मीदवारों ने दस हजार से ज्यादा का वोट हासिल कर भाजपा और कांग्रेस को काफी नुकसान पहुंचाया था यही कारण है कि भाजपा और कांग्रेस दोनों ही पार्टियां बहुमत से दूर रह गई थी। बाद में कमलनाथ ने निर्दलीयों,सपा और बसपा के विधायकों को अपने साथ मिला कर प्रदेश में 15 साल बाद कांग्रेस की सरकार बनाने में कामयाबी हासिल की थी। इस विधानसभा चुनाव में जिस प्रकार से बसपा ने कुछ मजबूत उम्मीदवारों पर दांव लगाया है उससे ऐसी स्थिति स्पष्ट हो रही है कि तीन दिसंबर के बाद एमपी में एक बार फिर हाथी दौड़ लगाएगा। कुछ भाजपा के तो कुछ कांग्रेस के नाराज नेता इस बार बसपा से विधानसभा चुनाव मैदान में उतरे हैं और उनमें कुछ ऐसे उम्मीदवार भी हैं जो चुनाव जीत भी सकते हैं पिछले विधानसभा चुनाव में बसपा के खाते में दो सीट आई थी लेकिन हालिया स्थिति की बात करें तो इस चुनाव में बसपा के खाते में ज्यादा सीटें आती दिख रही हैं। बसपा ने कुछ सीटों पर ब्राम्हण तो कुछ सीटों पर ठाकुरों को मौका दिया है जो चुनाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले हैं।