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जब 25 साल बाद मिले दो बैचमेट चेहरे पर झुर्रियां और आंखों पर सवाल लेकिन जुवान में झिझक
कई बार जीवन में ऐसे लम्हे आते हैं जब वक्त के थपेड़ों में उम्र गुजर जाने के बाद अचानक कोई ऐसा टकरा जाता है जो बेहद करीबी होता है और उसे पहचानने में पहले दिक्कत होती है और जब पहचान हो जाती है तो आंखों में हजारों सवाल होते हैं लेकिन उनके होंठ साथ नहीं देते,होंठ किसी तरह साथ भी देते हैं तो झिझक सवालों को होंठों तक आने नहीं देती। मामला है दो डाक्टरों का। जिन्होने एक साथ पढ़ाई की और फिर नौकरी में रम गए। एक से दूसरे शहर और जीवन व्यवस्थित करने की जद्दोजहद में लगे रहे। लेकिन एक दिन ऐसा आया जब वो दोनों दोस्त 25 साल बाद आमने-सामने खड़े थे। डाक्टर साहब के सिर के बाल झड़ चुके थे और चेहरे पर झुर्रियां पड़ चुकी थीं। हथेली की चमड़ियां सिकुड़ चुकी थी। ऐसी कुछ ऐसी ही स्थिति उनकी महिला मित्र की भी थी। चेहरे से तो समझ आ रहा था लेकिन 25 वर्ष पहले चेहरे पर जो आकर्षण था वो खत्म होकर जिम्मेदारियों में तब्दील हो चुका था। उम्र के इस पड़ाव में दोनों की मुलाकात अचानक एक अस्पताल में होती है जहां दोनों की ज्वाइनिंग होती है। दो-तीन दिन तक दोनों डाक्टर सिर्फ एक दूसरे को ठहर-ठहर कर देखते और फिर अपना काम करने लगते। लेकिन दोनों ये दूरी ज्यादा बर्दास्त नहीं कर पाए आखिर में तय किया कि अब बात करेंगे और पूछेंगे कि आप तो वही हो न जो कालेज में साथ पढ़ते थे। लंच का समय हुआ तो दोनों डाक्टर एक साथ बैठ गए दोनों ने अपना टिफिन खोलना शुरु कर दिया लेकिन अब भी झिझक दोनों को आपस में बात करने से रोक रही है। होंठ बोलने के लिए तैयार नहीं हैं सिर्फ आंखे आपस में बात कर रही हैं और आंखें ही एक दूसर से सवाल कर रही हैं और आंखें ही एक दूसरे को जवाब दे रही हैं। टिफिन खुल गया खाना थाली में लग गया जब खाने की बारी आई तब डाक्टर साहब के होंठों से एक शब्द निकला आप कौन से बैच की हैं और आपने पढ़ाई कहां से की है। डाक्टर साहब के एक सवाल से महिला मित्र ने कालेज का नाम लेते हुए अपना बैच बताया। धीरे से महिला डाक्टर ने कहा कि आप तो डाक्टर बेद हो न। जैसे ही महिला मित्र की जुवां से डाक्टर ने अपना नाम सुना तो उन्होंने भी तुरंत कहा कि आप तो डाक्टर रेणुका हैं ना। फिर क्या था अब तक जो होंठ बोलने के लिए तैयार नहीं थे उन्ही होंठों पर सवाल पर सवाल और दोनों का टिफिन समाप्त हो गया लेकिन सवालों का सिलसिला जारी रहा। असल में दोनों दोस्त कम एक दूसरे के प्रेमी ज्यादा थे जो 25 साल पहले बिछड़ गए थे। मोबाइल का दौर तो था नहीं और वक्त के थपेड़ों में दोनों खो से गए थे। लेकिन उम्र के इस पड़ाव में दोनों की मुलाकात क्या हुई आंखों में एक अलग ही नूर नजर आने लगा। इसकी आगे की स्टोरी पढ़नी है तो जुड़े रहिए मुखबिर के साथ।

एमपी में तेजी से बढ़ रही कुंवारे लड़कों की संख्या,लड़कों के माता-पिता शादी ढूंढ कर हो रहे परेशान
विकास की गति में एमपी जितनी तेजी से बढ़ रहा है उतनी ही गति से एमपी में कुंवारे लड़कों की संख्या बढ़ रही है। कुंवारे लड़कों की शादी के मामलों में शहर और गांव की स्थिति करीब एक जैसी ही है। आज के दौर में लड़की वालों के पास ऑप्शन की कमी नहीं लेकिन लड़के वालों के पास ऑप्शन ही नहीं है। लड़कों की समस्या ये है कि उनके घर पर जब शादी के लिए लड़की वाले आते हैं तो ये पूछा जाता है कि लड़का कौन सी नौकरी करता है कितना कमाता है। अगर लड़का नौकरी नहीं कर रहा होता है तो शादी वाले उल्टे पांव लौट जाते है। लड़का अगर नौकरी कर रहा है और वो नौकरी प्राइवेट सेक्टर में है तब भी शादी वाले रुचि नहीं लेते हैं क्योकि उन्हे प्राइवेट नौकरी पर आज भी विश्वास नहीं है। सीएम मोहन यादव प्रदेश के युवाओं को रोजगार देने के लिए लगातार निवेश लाने का प्रयास कर रहे हैं जिससे युवाओं को निजी सेक्टरों में नौकरी मिल पाए लेकिन लड़की के माता पिता का विश्वास निजी सेक्टर में काम करने वाले युवाओं पर है ही नहीं। शासकीय नौकरी में लड़का छोटे पद पर और कम वेतन में नौकरी कर रहा है तब भी उस पर लड़की के माता पिता विश्वास करते हैं। ग्रामीण क्षेत्र में सरकार कृषि को बढ़ा देने की बात करती है। युवाओं को कृषि के क्षेत्र में आगे आने के लिए सरकार लगातार प्रोत्साहित कर रही है। लेकिन किसान पुत्रों के साथ कोई अपनी लड़की का विवाह नहीं करना चाहता है। ग्रामीण क्षेत्रों में कुवारे लड़कों की संख्या इस गति से बढ़ रही है जिसका अंदाजा भी लगाना मुस्किल है। दरअसल लड़की के माता पिता की ये सोच है कि लड़का भले कम वेतन पाए लेकिन वो शहर में रहता हो। हर लड़की का पिता अपनी बेटी को शहर में रखना चाहता है। इसलिए वो गांव नहीं शहर में नौकरी करने वाले लड़के को लड़की व्याहना पसंद करते है। इन सब बातों के अलावा एक और बात देखने को मिल रही है। कुवारे लड़कों की स्थिति का आंकलन मैरिज व्यूरो में हुए रजिस्ट्रेशन से लगाया जा सकता है जहां कुवारे लड़कों की संख्या ज्यादा है जबकि लड़की वालों की संख्या बेहद कम है। प्रदेश में कुंवारे लड़कों की बढ़ती संख्या अब एक समस्या का सबब बनता जा रहा है जिसके लिए राज्य सरकार को जन जागरुकता अभियान चलाने की आवश्यकता है।

‘आखिर सिंधिया करना क्या चाहते हैं’ भाजपा नेताओं के लिए सिंधिया बने पहेली,बूझने का प्रयास कर रहे भाजपा के नेता और राजनीतिक विश्लेषक
केन्द्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया के द्वारा आए बयान में प्रदेश में एक नई बहस को जन्म दे दिया है| लेकिन यहां उनके बयान के कुछ और मायने भी निकाले जा रहे हैं| सिंधिया जब साल 2020 मे भाजपा में शामिल हुए तब उनके हिसाब से मप्र भाजपा चली और उनके कहे अनुसार सरकार में मंत्रियों को भी शामिल किया गया यहां तक कि निगम मंडलों में भी सिंधिया का ही रुतवा रहा| सेकिन साल 2023 में जब भारतीय जनता पार्टी ने प्रचंड बहुमत के साथ विजय हासिल की तो ज्योतिरादित्य सिंधिया का कद भाजपा में घट गया और भारतीय जनता पार्टी ने अपने हिसाब से ही मंत्रिमंडल में नेताओं को स्थान दिया| बात सिर्फ यहीं खत्म नहीं हुई बल्कि केन्द्र की सरकार बनी तो ज्योतिरादित्य सिंधिया को उम्मीद थी कि उनका कद बढ़ेगा लेकिन उनको 11वें नंबर में धकेल दिया गया उनसे काफी पहले पूर्व सीएम शिवराज सिंह चौहान को पांचवें नंबर पर स्थान दिया गया| सिंधिया की की नाराजगी उस वक्त तो नहीं दिखी लेकिन इस पूरे मामले में कांग्रेस नेताओं ने धीरे-धीरे पेट्रोल छिड़कने का काम शुरु कर दिया| करीब पांच महीने में पेट्रोल छिड़कते-छिड़कते उसमें माचिस मारने की बारी आई तो राहुल गांधी ने संसद के अंदर ज्योतिरादित्य सिंधिया का हात पकड़ कर माचिस मारने का काम भी कर दिया| राहुल गांधी ने सिंधिया का हाथ क्या थामा उनके सुर ही बदल गए| एमपी आते ही सिंधिया ने बयान दिया कि नेतृत्व अगर उन्हे विजयपुर में चुनाव प्रचार करने के लिए भेजता तो वो जरुर प्रचार करने के लिए जाते| सिंधिया ने एक बयान से प्रदेश की सियासत में भूकंप लाने का काम कर दिया बांकी उनके बयान को आगे बढ़ाने का काम कांग्रेस नेताओं ने किया| जैसे ही ज्योतिरादित्य सिंधिया का बयान आया प्रदेश के राजनीतिक हल्कों में जमकर कयासों का दौर शुरु हो गया|सिंधिया के बयान के बाद भारतीय जनता पार्टी भी हरकत में आई क्योंकि उस बयान की क्लिपिंग को कांग्रेस की तरफ से लगातार वायरल किया जा रहा था| सिंधिया के बयान का काउंटर करने के लिए पहले बीजेपी मीडिया बिभाग ने मोर्चा संभाला बात जब नहीं बनी तो उसके बाद प्रदेश महामंत्री भगवानदास सबनानी ने ऑफीशियली प्रेसवार्ता बुलाई और उन्होने कहा कि सिंधिया को मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव,प्रदेश संगठन महामंत्री हितानंद शर्मा और प्रदेश अध्यक्ष वीडी शर्मा ने खुद चुनाव प्रचार के लिए आमंत्रित किया था उसके बाद भी सिंधिया ब्यस्तताओं के कारण चुनाव प्रचार करने के लिए नहीं पहुंच पाए| भगवानदास सबनानी ने स्पस्ट शब्दों में कहा कि सिंधिया द्वारा यह कहना कि उन्हे नेतृत्व की तरफ से नहीं कहा गया यह पूरी तरह से गलत है| प्रदेश महामंत्री ने यह भी कहा कि ज्योतिरादित्य सिंधिया का नाम भाजपा की तरफ से स्टार प्रचारकों की सूची में भी शामिल था फिर भी वो कहते हैं कि उन्हे नेतृत्व की तरफ से नहीं कहा गया यह पूरी तरह से गलत है| सिंधिया द्वारा दिए गए इस बयान का एक ही मतलब है कि अगर भाजपा में उनकी नहीं चली तो उनके लिए उनके पुराने दोस्त पहले से ही हाथ थामने के लिए बैठे हैं|

भाजपा और कांग्रेस के एजेंडे में नहीं सामान्य वर्ग,हरियाणा चुनाव जीतने के बाद पीएम मोदी ने एससी,एसटी और ओबीसी का लिया नाम सवर्ण का नहीं किया जिक्र
चुनाव जीतने के लिए भाजपा और कांग्रेस दोनों ही पार्टियां इस वक्त हर समाज में जातीय जहर घोलने का काम कर रही हैं| भाजपा और कांग्रेस एससी,एसटी और पिछड़े वर्ग की बात तो करती हैं लेकिन इनके एजेंडे में कभी सामान्य वर्ग नहीं होता है| ऐसा लगता है कि जैसे भारत में सामान्य वर्ग नाम की कोई जाति नहीं बची है| बड़े नेताओं के भाषणों में हमेशा यही बताया जाता है कि दलित और पिछड़ों के साथ अन्याय हुआ वो गरीब हैं| अब सवाल इस बात का उठता है कि क्या देश में सामान्य वर्ग गरीब नहीं है| जितनी योजनाएं संचालित हो रही हैं वो सभी दलित और पिछड़े वर्गों को लेकर ही संचालित हो रही हैं| सभी पार्टियों की नीतियों को देख कर ऐसा लगता है जैसे सामान्य वर्ग को पिछड़ा बनाने की योजना चल रही हो| और चुनाव में जब किसी प्रकार की समस्या आती है तो उन्ही पार्टियों में मौजूद सामान्य वर्ग के नेताओं को ही यह पार्टियां आगे रख कर अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने लगती हैं| हाल ही में हरियाणा में विधानसभा चुनाव की जीत में हैट्रिक लगाने के बाद दिल्ली स्थित भाजपा कार्यालय में पीएम मोदी का करीब एक घंटे तक भाषण चला जिसमें उन्होने कई बातें कही| पीएम मोदी ने कांग्रेस को जमकर कोसा वो ठीक है उनका राजनीतिक विरोध समझ में आता है लेकिन इस बीच पीएम मोदी ने कहा कि दलित,आदिवासी और पिछड़े वर्ग का विकास करना उनका एक मात्र लक्ष्य है| पीएम मोदी के इस बयान पर शायद किसी ने ध्यान नहीं दिया अथवा ध्यान देकर भी सभी ने उस बात पर गौर नहीं किया| अन्य जातियों का विकास करना अच्छी बात है सभी जातियों का विकास होना चाहिए लेकिन क्या इस आधार पर कि सामान्य वर्ग को पिछड़ा बना दिया जाए| देश में करोड़ों की संख्या में सामान्य वर्ग ऐसे हैं जो रोटी,कपड़ा और मकान के लिए आज भी सरकार की ओर देख रहे हैं लेकिन उन पर सरकारों की नजर नहीं जा रही है| हर राज्य में आरक्षण का दायरा बढ़ता जा रहा है सामान्य वर्ग के लिए नौकरी नसीब नहीं हो रही है| अब तो राजनीति में भी आरक्षण लागू होने लगा है जातियों के आधार पर मंत्रालवय बांटे जा रहे हैं यहां तक की सीएम और पीएम के पद का भी बंटवारा योग्यता के अधार पर नहीं बल्कि जाति के आधार पर दिए जा रहे हैं| हर पार्टी बगैर जातीय जनगणना के यह कह रही है कि देश में 50 फीसदी से ज्यादा ओबीसी वर्ग है अब सवाल इस बात का उठता है कि जब जातीय जनगणना नहीं हुई तो इस बात का फैसला कहां से हो गया कि सबसे ज्यादा ओबीसी वर्ग है उसके बाद एससी और एसटी की संख्या है| बात कहीं से भी शुरु हो नेताओं के भाषण में कभी भी सामान्य वर्ग शामिल नहीं होता है| अगर किसी नेता ने अपने भाषण में भूले बिसरे सामान्य वर्ग का नाम ले भी लिया तो वो यही बताएगा कि सामान्य वर्ग ने पिछड़ों,दलितों का सोशण किया है| पूरे देश में सामान्य वर्ग सबसे जागरुक समाज में आता है इतने राजनीतिक विरोध के बीच भी सामान्य वर्ग खुद की उपेक्षा देख शांत है वो इस लिए कि देश में शांति बनी रहे लेकिन राजनीतिक पार्टियां अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रही हैं| जिस प्रकार से राजनीतिक पार्टियों ने सामान्य वर्ग को उपेक्षित करने का बीड़ा उठाया है उससे यह स्पष्ट है कि एक दिन सामान्य वर्ग इन सभी बातों को लेकर एकजुट होगा और जिस दिन ब्राह्मण,ठाकुर,बनिया और लाला एकजुट हो गए उस दिन देश में एक बड़ी क्रांति का आगाज हो जाएगा|

कांग्रेस के नामांतरण में पटवारी की लापरवाही,पट्टे के लिए दिल्ली से भोपाल तक भटक रहे सैकड़ों दावेदार
मध्यप्रदेश कांग्रेस की कार्यकारिणी पटवारी द्वारा बनाए जा रहे नामांतरण की तरह ही हो चुकी है| करीब सात महीने पहले जीतू पटवारी को पीसीसी चीफ बनाया गया था उसके कुछ समय बाद ही उन्होने प्रदेश कार्यकारिणी को भंग कर दिया था| नई कार्यकारिणी के लिए कांग्रेस की तरफ से बड़ी-बड़ी बातें की गई हुआ कुछ नहीं| कार्यकारिणी के नाम पर कांग्रेस में अब तक दर्जन भर से ज्यादा बैठकें हो चुकी हैं जिसमें इतनी बात निकल कर सामने आई कि इस बार पार्टी जंबो कार्यकारिणी नहीं बल्कि छोटी कार्यकारिणी बनाएगी और युवा कार्यकर्ताओं को मौका दिया जाएगा| बात यह भी निकल कर सामने आई कि भारतीय जनता पार्टी की तर्ज पर जिला महामंत्री और प्रदेश महामंत्री भी बनाए जाएंगे लेकिन अब तक उस पर भी काम नहीं हुआ| प्रदेश में तीन विधानसभा सीटों में उप चुनाव होना है जिसकी तैयारी भी कांग्रेस पार्टी ने शुरु कर दी है लेकिन आए दिन उसमें भी बदलाव हो जाता है| जिस तरह कांग्रेस अपनी रणनीति बदलती है उससे साफ नजर आता है कि नौसिखिया पटवारी ने नामांतरण बनाया है| कांग्रेस के प्रदेश प्रभारी भी किसी नौसिखिए तहसीलदार से कम नजर नहीं आते,पीसीसी में बैठक करते हैं और फिर कहते हैं दस दिन के अंदर नई कार्यकारिणी की घोषणा कर दी जाएगी लेकिन वो दस दिन कांग्रेस के कैलेंडर में कब आएंगे इस बात की जानकारी भी प्रदेश प्रभारी ने नहीं दी| पार्टी के कार्यकर्ता उस दस दिन का इंतजार ठीक उसी प्रकार कर रहे हैं जिस प्रकार दस दिन के अंदर राहुल गांधी ने प्रदेश के किसानों का कर्जा माफ करने का दावा किया था और वो दस दिन आज तक नहीं आए| बात सिर्फ पटवारी की कार्यशैली की ही नहीं है बात कांग्रेस हाई कमान के सोच की भी है जिसने एक ऐसे ब्यक्ति को पार्टी का अध्यक्ष बनाया जो खुद का चुनाव नहीं बचा पाए और वो दूसरों को चुनाव जिताने की रणनीति तैयार कर रहे हैं| मजे की बात यह है कि भाजपा के मझे हुए खिलाड़ियों के सामने कांग्रेस ने नौसिखिए पटवारी को सामने करके यह साबित कर दिया है कि कांग्रेस ने वास्तव में एक नाइट वाचमैन को मैदान में उतार दिया है जो कुछ समय के लिए बैटिंग करने के लिए उतरा है|

ऐसा लगता है चाय की मिठास अब फीकी पड़ने लगी है,मीठी करने के चक्कर में चाय के फटने का डर भी है,लेकिन दूसरा कोई रास्ता भी नहीं
दस साल पहले देश में चाय बेचने वाले ब्यक्ति को प्रधानमंत्री बनाया गया| देश की जनता ने सिर आंखों पर बिठाया और पीएम मोदी ने जो कहा देश की जनता ने उसी को स्वीकार किया| चाय वाले के नाम से प्रसिद्धि पाने वाले पीएम मोदी ने जमकर चाय पर चर्चा की,दिल्ली से लेकर एमपी और हर राज्यों में भाजपा ने सिस्टम बना लिया कि चुनाव के दौरान चाय पर चर्चा करनी है और उसी दौरान पार्टी की रणनीति को तैयार करना है| हुआ भी ऐसा ही चाय पर हुई चर्चा ने भारतीय जनता पार्टी को सत्ता के शिखर पर तो पहुंचाया ही जिस राज्य में चुनाव हुए हर जगह भारतीय जनता पार्टी ने जीत का पर्चम लहराया| जिस चाय ने भारतीय जनता पार्टी को सत्ता के शिखर तक पहुंचाया उसी चाय को भाजपा भूल गई और अलग-अलग पेय पदार्थों ने देश में राज करना शुरु कर दिया| चाय कब फीकी पड़ने लगी भारतीय जनता पार्टी के आधुनिक चाणक्य को इस बात का अहसास ही नहीं हो पाया और जब तक भाजपा को चाय फीकी पड़ने का अहसास हुआ तो भाजपा 303 से 240 में आकर सिमट गई| बात यहीं खत्म नहीं हुई, विधानसभा के उप चुनावों में भी भारतीय जनता पार्टी की चाय में मिठास नहीं आई जबकि कोशिश तो अच्छी चाय बनाने की हुई फिर भी जनता को भाजपा की चाय अच्छी नहीं लगी| दरअसल भाजपा की चाय में पप्पू का रंग पड़ चुका था| पीएम मोदी जीरो टोल रेंस की बात करते रहे और एक के बाद एक भ्रष्टाचार के मामले सामने आते रहे| इतनी ही नहीं जात,धर्म और न जाने चुनाव में क्या-क्या हथकंडे अपनाए गए और उन सभी से देश की जनता ऊबने लगी,हद तो तब होने लगी जब प्रचारित किया गया कि ‘जो राम को लाए हैं हम उनको लाएंगे’ ऐसे शब्दों का चुनाव में प्रचार किया गया तो अयोध्या की जनता ने भी बता दिया कि राम को लाने की किसी में क्षमता नहीं है जब उनको आना होता है तभी वो आते हैं| फिलहाल भारतीय जनता पार्टी की चाय का स्वाद अब जनता को पसंद नहीं आ रहा है| भाजपा को अब चाय के बजाय कुछ और सामने लाना होगा नहीं तो 2028 और फिर 29 तक देश और मध्यप्रदेश की जनता के मुंह में कोई और स्वाद अपनी जगह बना लेगा|

भाजपा और कांग्रेस के लिए विंध्य बना वोट 'मशीन' तैयार नहीं कर पाए नेत्रृत्व
राजनीतिक पार्टियों के लिए विंध्य (vindhya politics) हमेशा वोट की एक मशीन की तरह रहा है। पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह और श्रीनिवास तिवारी का स्वर्गवास होने के बाद कांग्रेस इस क्षेत्र से विलुप्त हो गई और भाजपा ने लगातार जीत का पर्चम लहराया। लेकिन भाजपा के लिए विंध्य हमेशा वोटिंग मशीन से ज्यादा और कुछ नहीं रहा। 30 विधानसभा क्षेत्र वाले विंध्य में एकतरफा बीजेपी की सीटें आ रही हैं लेकिन भाजपा ने राजेन्द्र शुक्ला के अलावा यहां से किसी अन्य चेहरे को तरजीह नहीं दी। जबकि राजेन्द्र शुक्ला का आम आदमी से कोई सरोकार नहीं वो सिर्फ वीवीआपी लोगों के नेता हैं आम नागरिक की पहुंच से वो काफी दूर हैं। गिरीश गौतम ने लगातार पांच बार विधानसभा का चुनाव जीता लेकिन उन्हे पार्टी ने कभी महत्व नहीं दिया। दिब्यराज सिंह लगातार तीन बार से चुनाव जीत रहे हैं लेकिन उन्हे भी पार्टी ज्यादा महत्व नहीं दे रही है। सीधी से केदारनाथ शुक्ला कई बार विधायक रहे उन्हे पार्टी ने कभी महत्व नहीं दिया अंत में पार्टी से बाहर का रास्ता भी दिखा दिया गया। सतना की बात करें तो वहां से भी भाजपा ने किसी नेता को महत्व नहीं दिया। मतलब साफ है कि भाजपा के एमपी का जो नेत्रृत्व है वो विंध्य में बड़े नेताओं को तैयार नहीं होने देना चाहता। भाजपा के वरिष्ठ नेताओं को मालूम है कि अगर विंध्य से बड़े नेता तैयार होंगे तो ग्वालियर-चंबल,बुंदेलखंड और मालवा-निमाड़ का प्रतिनिधित्व कम हो जाएगा। इसी लिए भाजपा के संगठन की तरफ से विंध्य में नेत्रृत्व तैयार नहीं होने दिया जाता है। कांग्रेस की तरफ से नेत्रृत्व तैयार करने का प्रयास जरुर हुआ लेकिन कमलेश्वर पटेल पर कांग्रेस ने दांव लगाया जिस पर क्षेत्र की जनता विश्वास नहीं करती। कमलेश्वर पटेल कुर्मी समाज से आते हैं और कट्टर कुर्मी के रुप में उनकी पहचान है। महज 15 महीने की सरकार में उनके बंगले पर कुर्मी समाज के अलावा किसी और वर्ग को महत्व नहीं दिया गया। यही कारण है कि आज लोकसभा चुनाव में कमलेश्वर पटेल की हालत खराब है। अजय सिंह (राहुल) के रुप में कांग्रेस के पास जरुर एक बड़ा चेहरा विंध्य में था लेकिन कांग्रेस ने उन्हे लगातार उपेक्षित कर अजय सिंह के राजनीतिक कैरियार को अंत की ओर अग्रसर कर दिया है। कुल मिला कर विंध्य क्षेत्र भाजपा और कांग्रेस के लिए वोट मशीन से ज्यादा कुछ नहीं है।

एक ऐसा नायक जो सबकुछ करके भी नहीं लेता क्रेडिट,कौन है वो नायक...
चुनाव जीतने के लिए सभी राजनीति करते हैं लेकिन जो दूसरों को जिताने के लिए राजनीति करे वो असल में नायक कहलाता है। और सबसे बड़ी बात तो यह है कि वो सबकुछ करके भी कोई क्रेडिट नहीं लेता। बात करते हैं साल 2019 की जब प्रदेश में भाजपा की सरकार नहीं बनी। महज कुछ सीटों के अंतर से भाजपा को विपक्ष में बैठना पड़ा। भाजपा के कई नेताओं की राजनीतिक विरासत खतरे में पड़ गई। ऐसे में भाजपा का एक ऐसा नेता सामने आया जिसे 'संकट मोचक' भी कहा जाता है। कट्टर हिंदुत्व की छवि तो उनमें दिखती ही है साथ ही प्रदेश के हर जिले का ब्राह्मण उन्हे अपना नेता मानता है। वो नाम है डॉ. नरोत्तम मिश्रा (narottam mishra) जिसने राजनीति में कभी हारना नहीं सीखा है। कहते हैं कुछ लोग जीवन में इतने संघर्ष करके आगे आते हैं कि छोटे मोटे राजनीतिक झटके उसके लिए कोई मायने नहीं रखते उन्ही में हैं डॉ. नरोत्तम मिश्रा। बीजेपी की सरकार जा चुकी थी उस वक्त उन्होने केन्द्रीय नेत्रृत्व को भरोसा दिलाया कि वो कांग्रेस की सरकार गिरा सकते हैं एक-दो मीटिंग में तो केन्द्रीय नेत्रृत्व ने उनकी बात पर विश्वास नहीं किया लेकिन नरोत्तम मिश्रा तो उन नायकों में हैं जो एक बार कदम बढ़ा देते हैं तो फिर पीछे मुड़ कर नहीं देखते। आखिर डॉ. नरोत्तम मिश्रा के आगे केन्द्रीय नेत्रृत्व भी झुका और आपरेशन लोटस की अनुमति दे दी। इस आपरेशन को सफल बनाने के लिए डॉ. नरोत्तम मिश्रा जुट गए और वो दिन आया कि जब कांग्रेस के डेढ़ दर्जन विदायक अचानक गायब हो गए। आखिर कांग्रेस की सरकार गिर गई। यहां भी सबकुछ करने के बाद भी डॉ. नरोत्तम मिश्रा के हाथ सीएम पद की कुर्सी नहीं बल्कि गृह मंत्रालय हाथ लगा। सबकुछ करके भी पूर्व गृह मंत्री ने किसी प्रकार का क्रेडिट नहीं लिया। साढ़े तीन साल सरकार चलने के बाद विधानसभा चुनाव हुआ और वो सियासत का नायक खुद चुनाव हार गया। हांलाकि राजनीतिक जानकारों का तो यहां तक कहना है कि डॉ. नरोत्तम मिश्रा के बढ़ते राजनीतिक कद को देखते हुए उन्हे हराया गया है। लेकिन कभी न हार मानने वाले डॉ. नरोत्तम मिश्रा ने यह साबित किया कि उन्हे कितना भी दरकिनार किया जाए लेकिन वो कभी हार नहीं मानते। ज्वाइनिंग कमेटी का उन्हे संयोजक बना दिया गया और जिस दिन से उन्हे नई जिम्मेदारी मिली कांग्रेस में भगदड़ मच गई। कांग्रेस के पूर्व विधायक से लेकर पूर्व सांसद और अन्य पदाधिकारियों सहित कांग्रेस के हर छोटे बड़े नेताओं के बीजेपी में आने का सिलसिला शुरु हो गया। छह अप्रैल भाजपा का स्थापना दिवस होता है इस दिन को यादगार बनाने के लिए डॉ. नरोत्तम मिश्रा ने एक लाख नए सदस्य बनाने का लक्ष्य रखा और एक दिन में एक लाख 26 हजार से ज्यादा नए कार्यकर्ताओं को बीजेपी में शामिल कराने का कीर्तिमान रच दिया। ओवरआल तीन महीने की ज्वाइनिंग के आंकड़े की बात करें तो दो लाख 58 हजार से ज्यादा कार्यकर्ता बीजेपी में शामिल हुए। इन सबके बीच जब डॉ. नरोत्तम मिश्रा से पूछा गया तो उन्होने पूरा श्रेय पीएम मोदी,राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा,सीएम मोहन यादव और प्रदेश अध्यक्ष वीडी शर्मा को दिया और कहा कि उन्ही के नेत्रृत्व से प्रभावित होकर सभी लोग भाजपा में शामिल हो रहे हैं। मतलब साफ है कि सबकुछ करके सारा श्रेय भी किसी दूसरे को कैसे दिया जाता है। यह बात पूर्व गृह मंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा में देखने को मिली इसी लिए लोग उन्हे राजनीति का नायक और चाणक्य कहते हैं।

आखिर चर्चा में क्यों है मध्यप्रदेश कैडर की 2 महिला आईएएस
मध्य प्रदेश कैडर की 2 महिला आईएएस (mp women ias) इन दिनों अपने रौबदार अंदाज के लिए चर्चा में हैं । आईएएस की नौकरी को उन्होंने शासकीय तंत्र के दुरुपयोग का साधन बना लिया है। जानकारी के मुताबिक यह महिला अधिकारी जिस विभाग में पदस्थ रहती हैं उसके संसाधनों पर अपना स्थाई कब्जा जमा लेती हैं। जिसकी वजह से वे इन दिनों प्रशानिक गलियारों के अलावा राजनीतिक हलकों में भी चर्चा का विषय बनी हुई है। बता दें कि दोनों महिला आईएएस अधिकारी राज्य शासन के एक निगम में एमडी रह चुकी है। एमडी रहते हुए उन्होंने निगम में अटैच एक कार को अपने आधीन रख लिया। जिसका 40 हजार रुपए महीना किराया एवं पेट्रोल–डीजल का खर्च हर महीने निगम द्वारा वहन किया जा रहा है। हैरत की बात यह है कि इनके बाद निगम में जितने भी एमडी आए किसी ने भी इस पर ध्यान नहीं दिया। और पिछले 2 साल से लगातार भुगतान किया जा रहा है। इनके अलावा एक और महिला आईएएस निगम की एमडी बनकर आई। उन्होंने निगम के 4 भृत्य को अपने बंगले पर रख लिया। कर्मचारी और गाड़ी बार बार बुलाने के बाद भी डर के कारण नहीं आ रहे है। पिछले करीब डेढ़ साल से चारों भृत्या की सैलरी भी निगम दे रहा है। सूत्रों के मुताबिक इसकी वजह से निगम को हर साल लाखों रुपए का नुकसान भी हो रहा है। एक तरफ तो जहां मोहन सरकार कर्ज लेकर सरकार चला रही है वहीं दूसरी ओर सरकार मे बैठे अधिकारी जमकर अपने पद का दुरुपयोग कर रहे हैं। ऐसे में प्रदेश की मोहन सरकार को सभी निगम मंडल में अटैच गाड़ी और बंगलों पर ड्यूटी में तैनात कर्मचारियों जानकारी मांगकर फिजूलखर्ची पर तत्काल रोक लगानी चाहिए। हृदेश धारवार

विंध्य की राजधानी का चुनावी सर्वे: क्या कहता है विंध्य,अबकी बार किसकी सरकार...
मप्र में विधानसभा चुनाव को देखते हुए राजनीति पूरे शबाब पर है (MP Elections)। विंध्य में हर व्यक्ति यही बात कर रहा है अबकी बार किसकी सरकार। विंध्य की तासीर भी ऐसी है कि वहां का एक छोटा सा बच्चा भी राजनीति की बात करता है और उसका राजनीतिक ज्ञान भी कमाल का ही रहता है (Vindhya Range)। गांव में ठंड के सीजन में अलाव जलता है वहां बैठे लोग प्रदेश की राजनीति तय कर देते हैं वो यहां तक बता देते हैं कि इस बार प्रदेश का मुखिया कौन होगा। अब बात करते हैं विंध्य में कौन किस पर भारी पड़ सकता है (Vindhya Politics)। रीवा की त्योंथर विधानसभा सीट में बसपा अथवा भाजपा का वर्चश्व रहता है जब भी कांग्रेस और भाजपा ने त्योंथर से ब्राम्हण को चुनाव मैदान में उतारा है तब हमेशा बसपा ने जीत दर्ज की है। पिछले दो चुनाव से बीजेपी ही जीत दर्ज कर रही है क्योंकि कांग्रेस रमाशंकर पटेल (कुर्मी) को अपना उम्मीदवार बना रही है। और इस चुनाव में फिर कांग्रेस ने भाजपा को वाकओवर देते हुए दो बार हार चुके रमाशंकर पटेल (Rama Shankar Patel) को तीसरी बार चुनाव मैदान में उतार दिया है। देवतालाव की बात करें तो कुर्मी बाहुल सीट है यहां से गिरीश गौतम (Girish Gautam) तीन बार से विधायक हैं लेकिन बसपा यहां से मजबूत रहती है यहां भी अगर भाजपा के बाद कांग्रेस ब्राम्हण को चुनाव मैदान में उतारती है बसपा का उम्मीदवार देवतालाव से जीत दर्ज करता है। मनगंवा आरक्षित सीट है पहले श्रीनिवास तिवारी फिर गिरीश गौतम और अब पंचूलाल प्रजापति (Panchulal Prajapati) वहां से विधायक हैं माना जा रहा है कि गिरीश गौतम ने पंचूलाल प्रजापति को चुनाव जिताने की जिम्मेदारी ली है इसलिए उन्हे भाजपा एक बार फिर टिकट दे सकती है। मऊगंज आम तौर पर कांग्रेस अथवा बसपा की पारंपरिक सीट मानी जाती है यहां का मतदाता हमेशा चौकाने वाले फैसले करता है। कभी लक्ष्मण तिवारी (Laxman Tiwari) जैसे नेता लोकजन शक्ति पार्टी से चुनाव जीत जाते हैं तो कभी सुखेन्द्र सिंह बन्ना (Sukhendra Singh Banna) कांग्रेस से चुनाव जीत जाते हैं पिछली बार भाजपा उम्मीदवार प्रदीप पटेल (Pradeep Patel) ने मऊगंज से जीत दर्ज की थी। इस चुनाव में उनका भारी विरोध है,और माना जा रहा है कि कांग्रेस नेता सुखेन्द्र सिंह बन्ना का दावा ज्यादा मजबूत है। गुढ़ की बात करें तो यहां से भाजपा उम्मीदवार नागेन्द्र सिंह (Nagendra Singh) जीतते रहे हैं और इस चुनाव में उन्होने फिर दावा ठोंक रखा है कांग्रेस की तरफ से कपिध्वज सिंह (Kapidhwaj Singh) का टिकट फायनल हो चुका है,दोनों तरफ से ठाकुर नेता होने के कारण यहां के राजनीतिक समीकरण भी बदल सकते हैं। सिरमौर से बीजेपी की तरफ से दिब्यराज सिंह (Divyaraj Singh) हैं जो दो बार के विधायक हैं,यहां से तीन ब्राम्हण चुनाव मैदान में हैं इसलिए माना जा रहा है कि दिब्यराज एकबार फिर फतह हासिल करने में कामयाब हो सकते हैं।

आज की सबसे बड़ी भविष्यवाणी- हारे कोई भी लेकिन सरकार तो 'कमल' की ही बनेगी
मप्र सहित पांच राज्यों में कल से आदर्श आचार संहिता लागू हो चुकी है (Madhya Pradesh Elections)। अगले 37 दिनों तक प्रदेश में सियासी बुखार जमकर देखने को मिलने वाला है। प्रदेश में जिस प्रकार से भाजपा और कांग्रेस सत्ता हासिल करने के लिए अपने सियासी मोहरे फिट करने में जुटे हैं उससे स्पष्ट है कि भाजपा और कांग्रेस इस चुनाव को बिल्कुल भी हल्के में नहीं ले रहे हैं। कर्नाटक चुनाव में हार के बाद जिस प्रकार से भारतीय जनता पार्टी ने वहां से सीख ली है तो वहीं कांग्रेस पार्टी अति उत्साहित नजर आ रही है। जो कांग्रेस अभी तक 150-180 सीटों का दावा कर रही थी उसी कांग्रेस के पदाधिकारी कुछ एजेंसियों द्वारा किए गए सर्वे को वाट्सेप ग्रुपों में वायरल कर खुश हो रहे हैं। दरअसल एक एजेंशी के सर्वे में भाजपा को 104 से 116 सीटें मिलती दिख रही हैं तो वहीं कांग्रेस को 116 से 125 सीट मिलने का अनुमान लगाया गया है। इस प्रकार के सर्वे से कांग्रेस कार्यकर्ताओं में काफी उत्साह नजर आ रहा है। लेकिन उन्हे यह नहीं मालूम कि चुनाव का काउनडाउन अब शुरु हुआ है। जिस भारतीय जनता पार्टी को लड़ाई में नहीं माना जा रहा था उसी भारतीय जनता पार्टी को सर्वे एजेंसियों 104 से 116 सीट तक दे रहे हैं। मतलब साफ है कि मुख्यमंत्री शिवराज स़िह चौहान (Shivraj Singh Chouhan) द्वारा ऐन मौके पर शुरु की गई लाड़ली बहना योजना (Ladli Behana Yojana) काम कर गई है जिसके कारण भाजपा के वोटबैंक का ग्राफ बढ़ गया है। भारतीय जनता पार्टी ने अलग-अलग तरह की यात्राएं निकाल कर लगातार जनता से संवाद भी किया है। भाजपा महिला मोर्चा (BJP Mahila Morcha) को भी लक्ष्य दे दिया गया है कि वो हर बूथ में जाएं वाट्सेप ग्रुप बनाएं और स्थानीय महिलाओं को ग्रुपों में जोड़ कर केन्द्र और राज्य सरकार की ओर से महिला हितैषी योजनाओं का जमकर प्रचार करें जिससे महिलाओं को भावनात्मक तरीके से भाजपा से जोड़ा जाए। जनता का दिल जीतने के लिए कांग्रेस (MP Congress) की ओर से भी बहुत सारे अभियान चलाए जाते रहे हैं लेकिन कांग्रेस की कमजोरी यही रही है कि भोपाल में पीसीसी चीफ कमलनाथ (Kamal Nath) को खुश करने के लिए नेता और कार्यकर्ता तो जुट जाते हैं लेकिन वो अभियान भोपाल से निकलने के बाद कहां जाता है और कहां खत्म होता है इसका पता आज तक नहीं चल पाया है। बात स्पष्ट है कि अगले 37 दिन मध्यप्रदेश में जमकर एमोश्नल ड्रामा देखने को मिलने वाला है। साम-दाम-दंड और भेद सभी इस चुनाव में स्पष्ट रुप से देखने को मिलने वाला है। इस बीच यह बात तय है कि सत्ता के सिंहासन की इस लड़ाई में भाजपा और कांग्रेस कितनी भी मेहनत कर लें लेकिन यह अटल सत्य है कि सरकार 'कमल' की ही बनेगी।

'कैसे बनेगी भाजपा की सरकार',कितनी सीटें घटेंगी और कितनी बढ़ेंगी,कमलनाथ अपने ही करीबियों के शब्दजाल में फंसे
हर जगह एक ही सवाल किसकी सरकार होगी। सरकार बनेगी तो कैसे बनेगी। हर जगह गुड़ा भाग,राजनीतिक हिसाब लगाए जा रहे हैं सारे सियासी पंडित चार दीवारी में बैठ कर सरकार तय कर रहे हैं कुछ राजनीतिक पंडित टीवी डिवेट में बैठ कर सरकार बना रहे हैं (MP Elections)। कांग्रेस के प्रवक्ता और नेता कहते हैं कि इस बार कांग्रेस 150 से 180 सीटों के आस पास लेकर आएगी। पूर्व सीएम कमलनाथ (Kamal Nath) को भी उनके करीबी सलाहकार 180 सीटों का ही सपना दिखा रहे हैं। जब उनके करीबी उनके पास से निकल जाते हैं तो फिर कमलनाथ मन में सोचते हैं कि इसमें अगर कम करो तो 140 सीट तो आ ही जाएगी। लेकिन उसके उलट भाजपा के गणित की बात करें तो वहां कुछ और ही खिचड़ी पक रही है जिस पर कांग्रेस की शायद नजर नहीं पड़ी अथवा पड़ी भी है तो कोई ध्यान नहीं देना चाहता क्योंकि कांग्रेस में विश्वास कम अति विश्वास ज्यादा दिखाई पड़ रहा है। अब बात भाजपा के गणित की करते हैं। वर्तमान में भाजपा के पास 127 विधायक हैं। भाजपा यह मान कर चल रही है कि 127 में 57 सीट वो हार सकती है मतलब 70 सीट भाजपा 127 वर्तमान की सीटों में बचा पाएगी। इसकी पुष्टि तो कांग्रेस की वो 66 सीटें भी कर रही हैं जहां कांग्रेस लगातार तीन बार से हार रही है और भाजपा की वो सीटें गढ़ बनी हुई हैं। 230 विधानसभा सीटों में 127 विधायक भाजपा के पास हैं। 95 वे विधायक कांग्रेस के पास हैं बांकी अन्य,सपा बसपा के पास हैं। भाजपा ने हारी हुई 103 सीट जिन्हे आकांक्षी विधानसभा सीटों का नाम भी दिया गया था। उन सीटों पर भाजपा ने करीब एक साल से ही मंथन करना शुरु कर दिया था। आकांक्षी सीटों पर भाजपा ने जमकर काम किया,हर दावेदार के हिसाब से पार्टी ने सर्वे भी कराया यही कारण है कि आकांक्षी सीटों पर जहां भाजपा के पास जिताऊ उम्मीदवार नहीं थे वहां पर भाजपा ने नरेन्द्र सिंह तोमर (Narendra Singh Tomar) ,कैलाश विजयवर्गीय (Kailash Vijayvargiya) और प्रहलाद पटेल (Prahlad Patel) जैसे नेताओं नेताओं को चुनाव मैदान पर उतार दिया। मतलब साफ है सरकार कैसे बनाना है भाजपा को मालूम है। भाजपा का हिसाब है कि 103 आकांक्षी सीटों में भाजपा 50 सीटों पर जीत दर्ज करेगी। ऐसी स्थिति में 70 और 50 को प्लस करें तो भाजपा को 120 सीट मिल रही है और वो सरकार बना रही है। इससे कुछ ऊपर नीचे होता है तो भाजपा उस पर अलग से विचार कर रही है पार्टी के नेता अलग-अलग आप्शनों पर भी काम कर रहे हैं। वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस की बात करें तो कमलनाथ के करीबी उन्हे 180 सीटों का सपना दिखा रहे हैं जिस पर कमलनाथ 140 सीट का आंकड़ा लेकर चल रहे हैं।