निगम-मंडलों की नियुक्तियां शायद मोहन सरकार में संभव नहीं अब तो दावेदारों ने भी उम्मीद छोड़ी

मध्य प्रदेश में मोहन सरकार को दो वर्ष से अधिक बीच चुके हैं। सरकार बनने के बाद ही निगम-मंडलों में नियुक्ति का दावा किया गया था। लेकिन संगठनात्मक चुनावों के कारण निगम-मंडलों की नियुक्ति पीछे होती चली गई और अब तो लगता है कि शायद निगम-मंडलों की नियुक्ति इस सरकार में होना संभव नहीं है। दरअसल भाजपा के संगठन और सरकार में अंतर्कलह का ज्वार-भांटा उबाल मार रहा है। सरकार और संगठन नियुक्तियों में देरी कर विवाद को रोके रखना चाहते हैं लेकिन नियुक्तियों में जितनी ज्यादा देरी हो रही है उतना ही ज्यादा पार्टी पर दबाव की स्थिति बनती जा रही है। करीब महीने भर पहले भाजपा के सभी वरिष्ठ पदाधिकारी ये कहते हुए नहीं थकते थे कि अब किसी भी समय पर निगम-मंडलों की नियुक्ति हो सकती है। लेकिन अब तो जो नेता खुद को निगम-मंडल का दावेदार मान कर चल रहे थे उन्हें खुद निगम-मंडलों की नियुक्ति के नाम पर चिढ़न होने लगी है। दूसरी तरफ ये नियुक्तियां नहीं हो पाने से सरकार और संगठन के बीच चल रही अंतर्कलह भी जनता के सामने आने लगी है। जिस भाजपा के कैडर की चर्चा आम और खास में हुआ करती थी आज उसी भाजपा के कैडर के नाम पर लोग हंसते नजर आते हैं। निगम-मंडलों की नियुक्ति नहीं कर पाने के कारण मोहन सरकार ने अपनी कमजोरियों को जनता के सामने रख दिया है। पार्टी के पदाधिकारी भी अब दवी जुवां यही कहते नजर आते हैं कि सरकार में किसकी चल रही है और किसके कहने से फैसले हो रहे हैं ये सब समझ से परे है। Mukhbir को मिली सूचना के अनुसार निगम-मंडलों में नियुक्ति के लिए अंचल बार मंत्रियों को क्वार्डिनेशन की जिम्मेदारी दी गई थी जिसके तहत दावेदारों का नाम क्वार्डिनेटरों को देना था। मंत्रियों ने नाम दिए भी लेकिन सीएम ने उन नामों पर अपनी सहमति नहीं दी जिसके कारण नियुक्तियों पर पेंच फंस गया। वहीं दूसरी तरफ निगम-मंडलों के लिए दावा ठोकने वालों को जब पार्टी के अंदर चल रही आंतरिक गुटबाजी की जानकारी हुई तो उन्होंने भी शांति बनाए रखने में ही अपनी भलाई समझी। लेकिन ये नियुक्तियां नहीं होने से पार्टी के कार्यकर्ताओं में पार्टी के प्रति अविश्वास की भावना बनने लगी है। अब पार्टी के फैसलों पर पार्टी के कार्यकर्ताओं को ही विश्वास नहीं हो रहा।निगम-मंडलों की नियुक्ति न कर भाजपा नेताओं को लग रहा है कि उन्होने बड़ी कामयाबी हासिल की है लेकिन हकीकत तो यही है कि नियुक्तियां नहीं होने का मतलब है कि सरकार ने अपनी कमजोरी को जनता के सामने रख दिया है जो भविष्य में पार्टी के लिए घातक साबित हो सकता है।
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विधायकों के 'चंगुल' में भाजपा के मंडल अध्यक्ष निधि संचय अभियान में मंडल अध्यक्षों के हाथ रहते हैं खाली जिला और प्रदेश इकाई होती हैं मालामाल
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