14वें-15वें और 16वें राउंड में विजयपुर हारी भाजपा,सत्ता और संगठन किसकी हुई हार,पटवारी को कैसे मिली संजीवनी

विजयपुर की हार ने भाजपा के संगठन और सरकार के विकास पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया है। महाराष्ट्र की प्रचंड जीत के आगे भाजपा को यह हार भले मामूली लग रही हो लेकिन जिस प्रकार से विजयपुर में रामनिवास रावत का किला ध्वस्त हुआ है उससे साफ हो गया है कि संगठित होकर चुनाव लड़ा जाए तो एमपी के संगठन और सरकार के सभी दावों को ध्वस्त किया जा सकता है। ऐसा नहीं है कि सरकार और संगठन ने विजयपुर में कोई कमी छोड़ी लेकिन यहां पर अति आत्म विश्वास ने भाजपा की नेया तो डुबोई ही साथ में रामनिवास रावत की राजनीतिक विरासत को खत्म कर दिया है। भाजपा के कई वरिष्ठ नेताओं को इस नतीजे की भनक भी पहले से ही थी। कई नेता दवी जुवान कह चुके थे कि विजयपुर में विजय का पर्चम लहराना संभव नहीं होगा। कहा तो यह भी जा रहा है कि भाजपा के ज्यादातर नेता रामनिवास को हारता हुआ देखना चाहते थे। जिस प्रकार से सिंधिया ने विजयपुर चुनाव प्रचार से दूरी बना कर रखी थी उससे नरेन्द्र सिंह तोमर और सिंधिया के बीच राजनीतिक दरार भी खुल कर देखने को मिल रही थी। जिस प्रकार से विजयपुर में पूर्व सीएम दिग्विजय सिंह ने अपनी रणनीति को धरातल में उतारा उसका तोड़ भाजपा के नेता नहीं निकाल पाए। कांग्रेस ने इस चुनाव को उसी दिन अपने पक्ष में कर लिया था जब आदिवासी कार्ड खेल कर मुकेश मल्होत्रा को अपना उम्मीदवार बना दिया। भाजपा सिर्फ ओबीसी की राजनीति में ही ब्यस्त रही और आदिवासियों ने खेला कर दिया। मतगणना के दौरान जब रामनिवास रावत आगे चल रहे थे तब भी भाजपा के कुछ नेताओं को आश्चर्य लग रहा था लेकिन जैसे ही 14वें-15वें-16वें राउंड की बारी आई और कांग्रेस प्रत्याशी मुकेश मल्होत्रा ने वापसी की सभी का राजनीतिक गणित सही बैठने लगा। फाइनली कांग्रेस की इस हार ने प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी को संजीवनी देने का तो काम किया ही है साथ ही पूरी कांग्रेस में एक उत्साह का वातावरण देखने को मिल रहा है। हांलाकि इस हार से न सरकार के स्वास्थ पर असर पड़ेगा न कांग्रेस को कोई बड़ा फायदा लेकिन यहां से जो देखने को मिला तो वो यह कि संगठित होकर ही भाजपा को हराया जा सकता है। अब यह हार किसके सिर जाएगी यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा।
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