निगम-मंडल की सूची में ज्योतिरादित्य सिंधिया और पार्टी के वरिष्ठ नेता बन रहे रोड़ा

मध्य प्रदेश भाजपा राष्ट्रीय नेतृत्व के लिए हमेशा से प्रयोगशाला रहा है। भाजपा का राष्ट्रीय नेतृत्व पहले एमपी में कोई भी प्रयोग करता है और फिर सफल होने के बाद उस माडल को देश के अन्य राज्यों में अपनाया जाता है। लेकिन अब मध्य प्रदेश में समय के साथ भाजपा के न सिर्फ चेहरे बदले हैं बल्कि प्रयोग करने के तरीकों में भी बदलाव आ गया है। और यह बदलाव अब खुद भाजपा के लिए ही मंहगे साबित हो रहे हैं। 2023 में विधानसभा चुनाव हुए। दो वर्ष से अधिक का वक्त मोहन सरकार ने पूरा कर लिया उसके बाद भी भाजपा की प्रयोगशाला से निगम-मंडल की सूची के अविष्कार में दिक्कतें आ रही हैं। भाजपा के Mukhbir बताते हैं कि निगम-मंडलों की सूची कंप्लीट है। कभी भी जारी हो सकती है। इस उधेड़बुन के बीच भाजपा के कई नेताओं की सांसें थमी हुई हैं तो कुछ नेता अस्पताल जाकर बाड़ी चेकअप करवा चुके हैं क्योंकि उन्हें इस बात का टेंशन है कि सूची में उनका नाम शामिल है कि नहीं। संभावित दावेदारों के धैर्य का बांध फूट रहा है और भाजपा का नेतृत्व है कि जैसे सभी दावेदारों के धैर्य की परीक्षा ले रहा हो। सूची रुकने के पीछे एक और भी बड़ा कारण बताया जा रहा है। जिसके पीछे पार्टी के अंदर चल रही अंतर्कलह एक बड़ा कारण मानी जा रहा है। क्योंकि सूची को लेकर एक बार नहीं कई बार बैठकें हो चुकी हैं। कई बार नामों को जोड़ा और हटाया जा चुका है। पार्टी के अंदर पनपे अलग-अलग गुटों से भी प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल और संगठन महामंत्री हितानंद शर्मा बैठक चुके हैं। हाई कमान से भी करीब 32 नामों पर सहमति बनाई जा चुकी है। लेकिन इतना सबकुछ होने के बाद भी प्रदेश नेतृत्व सूची जारी करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है। जिसके पीछे केन्द्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया रोड़ा बन कर खड़े हो गए हैं। जिस प्रकार से उन्होंने शिवपुरी जिला कार्यकारिणी में अपने करीबियों को शामिल कराया है ठीक उसी प्रकार वो चाहते हैं कि निगम-मंडल की सूची में भी उनका एकाधिकार रहे और उनके कार्यकर्ताओं का वर्चस्व बना रहे। इन्ही जद्दोजहद के बीच निगम-मंडल की सूची जारी करने में प्रदेश नेतृत्व हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है। इस बीच एक और खबर भी है कि कुछ वरिष्ठ नेताओं को पहले निगम-मंडल में शामिल होने का आफर दिया गया था जिसे उन नेताओं ने ठुकरा दिया था लेकिन अब केन्द्रीय नेतृत्व का निर्देश है कि ऐसे नेताओं को निगम-मंडल में शामिल किया जाए जो पार्टी और कार्यकर्ताओं के बीच अपना काफी वर्चस्व रखते हैं। निगम मंडल में शामिल होने के बाद वो व्यस्त रहेंगे अन्यथा पार्टी के अंदर राजनीति अस्थिरता पैदा करते रहेंगे।
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