'लाशों' के ढेर पर खड़ी सरकार से मृत आत्माएं पूछ रही सवाल मेरा क्या दोष था छिंदवाड़ा से इंदौर फिर जबलपुर में मौत ने किया तांडव

पिछले एक साल के अंदर तीन बड़े हादसों में सैकड़ों लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी लेकिन कार्रवाई के नाम पर सिर्फ खानापूर्ति हुई। सरकार का तो काम है अपनी गलतियों को ढकना लेकिन विपक्ष की भूमिका भी इन हादसों में पूरी तरह संदिग्ध रही। विपक्ष जन सरोकार के मुद्दों को छोड़कर सिर्फ अपने संगठन के सृजन में लगा रहा। हादसों के दौरान विपक्ष ने खानापूर्ति के लिए प्रदर्शन किए लेकिन वो सिर्फ खानापूर्ति ही साबित हुए। जिस प्रकार से छिंदवाड़ा से शुरु हुआ मौत का तांडव प्रदेश के अलग-अलग जिलों में चला वो सिर्फ टीवी चैनलों की ब्रेकिंग और अखबारों की सुर्खियां बन कर रह गया। छिंदवाड़ा में जहरीली कफ सिरप (कोल्ड्रिफ) कांड में कुल 26 बच्चों की मौत हुई थी। इंदौर के भागीरथपुरा क्षेत्र में दूषित पानी पीने से 15 से 35 लोगों की मौत होने का दावा किया गया था लेकिन सरकारी आंकड़ों में संख्या 6 ही दर्ज की गई थी। जबलपुर के बरगी डैम Cruise हादसे में 13 लोगों की दर्दनाक मौत हो गई थी। इतने लोगों की मौत पर सरकार ने आंशिक कार्रवाई कर बही-खाता पूरा कर दिया और विपक्ष ने भी प्रेसवार्ता कर अपनी भूमिका पूरी कर दी। लेकिन सवाल अब भी जस का तस है कि इन हादसों में जिन लोगों की जान गई तो उनका क्या दोष था। नारी वंदन अधिनियम के फायदे की बात आई तो एक दिवसीय सदन आहुत हुई और करोड़ों रुपये खर्च कर दिए गए। लेकिन कुछ महीनों के अंतराल में ही तीन बड़े हादसे हुए और सैकड़ों लोगों की जान चली गई उसके बाद भी सरकार ने विधानसभा के विशेष सत्र का आयोजन नहीं किया। कम से कम मृतकों की आत्मा की शांति के लिए और उनके परिजनों को ढांढस बंधाने के लिए ही विधानसभा की बैठक कर हादसों पर चर्चा हो जाती और ऐसे हादसों की फिर पुनरावृत्ति न हो उसकी चर्चा हो जाती तो शायद प्रदेश की जनता का सरकार पर कुछ विश्वास बना रहता। लेकिन जिस प्रकार से प्रदेश के अलग-अलग जिलों में अलग-अलग हादसों में निर्दोष नागरिकों और मासूमों को अपनी जान गंवानी पड़ रही है। ऐसे हादसों से सरकार का सबक नहीं लेना यह दर्शाता है कि सरकार को सिर्फ सत्ता बचाए रखने में दिलचस्पी है तो विपक्ष को सत्ता हासिल करने में दिलचस्पी है। बांकी जिनके भरोसे सत्ता आनी है उनके जान की कीमत महज कुछ लाख का हर्जाना देकर ही आंकी जा रही है।
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