#ganesh singh
Total published stories tagged under #ganesh singh: 6

मोदी कैबिनेट में एमपी से एक सांसद और राष्ट्रीय संगठन में चार नेताओं का होगा प्रमोशन रीवा से जनार्दन अथवा सतना से गणेंश सिंह को मिलेगा मौका

सतना नगर निगम परिषद अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास लाने की भाजपा नेताओं ने ही रची शाजिस,सांसद गणेश सिंह की भूमिका संदिग्ध

अबकी बार 'गणेश' विसर्जन पर ध्यान,फंसी सतना और अब रीवा की बारी
लोकसभा का चुनाव जितना आसान दिख रहा है उतना है नहीं। एमपी में करीब दस ऐसी लोकसभा सीटें हैं जहां पर जीत किसी की भी हो लेकिन भारतीय जनता पार्टी के लिए चुनाव जीतना आसान नहीं होगा। विंध्य की बात करें तो यहां पर बीजेपी के लिए विधानसभा से ज्यादा कठिन लोकसभा का चुनाव होता चला जा रहा है। सतना से चार बार के सांसद गणेश सिंह (ganesh singh) पर बीजेपी ने एक बार फिर दांव लगाया है और उनके खिलाफ कांग्रेस के सिद्धार्थ कुशवाहा को चुनाव मैदान में उतार दिया गया है। ये वही सिद्धार्थ कुशवाहा (siddharth kushwaha) है जिन्होने विधानसभा चुनाव में गणेश सिंह को करारी पटखनी दी थी। और अब वही दोनों प्रतिद्वंदी एक बार फिर चुनाव मैदान में दो हाथ करने के लाए तैयार हैं। लेकिन इसके ठीक उलट मैहर से चार बार विधायक रह चुके नारायण त्रिपाठी (narayan tripathi) ने बीएसपी से टिकट लेकर चुनाव में उतने का ऐलान कर दिया है। मतलब साफ है ब्राम्हण बाहुल सीट में दोनों ही राष्ट्रीय पार्टियों ने ओबीसी उम्मीदवार पर दांव लगाया है। ऐसा माना जा रहा है कि सतना के ब्राम्हणों का पूरा वोट नारायण त्रिपाठी के पक्ष में जाएगा। उसके अलावा एससी वर्ग का वोट बीएसपी के नाते नारायण त्रिपाठी के खाते में जाएगा। और अगर ऐसा होता है तो अबकी बार गणेश विसर्जन तय है। गणेश सिंह से स्थानीय जनता काफी नाराज भी है। गणेश सिंह को कट्टर कुर्मी नेता माना जाता है। हांलाकि भारतीय जनता पार्टी के अन्य नेता संभावित हार को मानने के लिए तैयार नहीं हैं बल्कि उनका यह मानना है कि नारायण त्रिपाठी का चुनाव मैदान में उतरने का मतलब है कि गणेश सिंह एक बार फिर सतना से भाजपा का पर्चम लहराने वाले हैं।

रीवा और सतना में जातीय समीकरण के आगे फेल हो सकती है मोदी की 'गारंटी'
विंध्य क्षेत्र राजनीतिक दृष्टिकोण से हमेशा कठिन माना जाता रहा है। और बात जब चुनाव की आती है तो विंध्य में जातीय समीकरण पूरे शबाब पर आ जाते हैं। बात सतना और रीवा की हो तो कुछ अलग ही समीकरण सामने आते हैं। सतना से भाजपा ने चार बार के सांसद गणेश सिंह (ganesh singh) को पांचवीं बार चुनाव मैदान में उतार दिया है जो विधानसभा चुनाव में शिकस्त खा चुके हैं फिर भी भाजपा ने उनके नाम पर ही विश्वास दिखाया है। उनके खिलाफ कांग्रेस ने शिद्धार्थ कुशवाहा (siddharth kushwaha) को चुनाव मैदान में उतारा है दोनों नेता ओबीसी वर्ग से आते हैं। गणेश सिंह को कट्टर कुर्मी और जातिवादी नेता माना जाता है इसी लिए सतना में अन्य वर्ग के वोटर गणेश सिंह को पसंद नहीं करते। अब पता चल रहा है कि मैहर विधानसभा से कई बार विधायक रह चुके नारायण त्रिपाठी फिर से चुनाव मैदान में उतरने की रणनीति बना रहे हैं। नारायण त्रिपाठी एक ब्राम्हण नेता हैं और भाजपा कांग्रेस दोनों दलों से ओबीसी नेताओं के चुनाव लड़ने के कारण नारायण त्रिपाठी को ब्राम्हण वोट मिलना तय है। कुछ इसी प्रकार रीवा में भी समीकरण देखने को मिल रहे हैं जहां भाजपा ने दो बार के सांसद जनार्दन मिश्रा को फिर चुनाव मैदान में उतार दिया है। जनार्दन मिश्रा सरल और सौम्य ब्यक्तित्व के धनी हैं लेकिन उनकी क्षेत्र में उपस्थिति न के बराबर रहती है इसलिए रीवा की जनता उनसे नाराज है। Mukhbirmp.com को मिली जानकारी के अनुसार कांग्रेस भी ब्राम्हण उम्मीदवार को चुनाव मैदान में उतारने की योजना बना रही है। अगर यहां से कांग्रेस ने किसी DMT वर्ग के नेता यानि मिश्रा,तिवारी अथवा दुबे पर दांव लगाया तो मुकाबला दिलचश्प हो जाएगा। और इनसे हट कर बीएसपी ने अगर किसी कुर्मी वर्ग (पटेल) नेता को चुनाव मैदान में उतार दिया तो मुकाबला त्रिकोणीय हो जाएगा और बीएसपी के जीतने की संभावनाएं बढ़ जाएंगी। रीवा और सतना में जिस प्रकार से जातीय समीकरण देखने को मिल रहे हैं उसमें मोदी की 'गारंटी' भी कुछ ज्यादा कमाल नहीं दिखा पाएगी।

अबकी बार 'गणेश विसर्जन' पर ध्यान,सतना रीवा की जनता भाजपा के 'थोपे' उम्मीदवारों से नाराज
लोकसभा चुनाव को देखते हुए भारतीय जनता पार्टी ने देश के 16 राज्यों की 195वे लोकसभा सीटों के प्रत्याशी घोषित कर दिए हैं। इसमें एमपी की 29 सीटों के 24 उम्मीदवार भी शामिल हैं। भाजपा ने इस बार कोई भी चौकाने वाला निर्णय नहीं लिया जो जनता के गले से नहीं उतर रहा है। विंध्य की बात करें तो सतना लोकसभा सीट से सांसद गणेश सिंह (ganesh singh) पर भाजपा ने एक बार फिर भरोसा कर स्थानीय जनता को नाराज कर दिया है। सतना एक ब्राम्हण बाहुल सीट मानी जाती है और गणेश सिंह कुर्मी समाज से आते हैं। और गणेश सिंह एक कट्टर जातिवादी नेता माने जाते हैं जिसके चलते अन्य वर्ग के लोग उनसे नाराज रहते हैं। दो बार सतना की जनता ने मोदी के नाम पर सांसद बना दिया लेकिन इस बार सतना की जनता गणेश सिंह को फिर सांसद नहीं बनाना चाहती है। जनता मोदी को तो चाहती है लेकिन गणेश सिंह को नहीं चाहती जिसका उदाहरण विधानसभा चुनाव में देखने को मिल चुका है। सतना की जनता गणेश सिंह को विधानसभा चुनाव में हरा चुकी है। कुछ ऐसा ही हाल रीवा का भी देखने को मिल रहा है जहां भाजपा ने दो बार के सांसद जनार्दन मिश्रा को तीसरी बार चुनाव मैदान में उतारा है। जनार्दन मिश्रा को राजेन्द्र शुक्ला का डमी कैंडीडेट के रुप में माना जाता है। जनार्दन मिश्रा एक सरल और सौम्य सांसद की छवि रखते हैं लेकिन उनकी समस्या ये है कि वो क्षेत्र में सक्रिय नहीं रहते हैं। दस साल तक सांसद रहने के बाद भी जनार्दन मिश्रा आज तक पूरे रीवा का भ्रमण नहीं कर पाए हैं। रीवा की जनता बहुत जागरुक मानी जाती है। थोपे गए नेताओं को रीवा की जनता ज्यादा बर्दास्त नहीं करती है। लिहाजा इस बार के लोकसभा चुनाव में रीवा और सतना की लोकसभा सीटें भाजपा के लाए कठिनाई पैदा कर सकती हैं। देखना दिलचश्प यही होगा कि जनता की नाराजगी जीतती है अथवा मोदी की गारंटी के आगे जनता नतमस्तक होती है।

नारायण ने छोड़ा 'शिव' और 'विष्णु' का साथ,जल्द करेंगे अपने भविष्य का फैसला
मैहर से भाजपा विधायक नारायण त्रिपाठी (Narayan Tripathi) ने अपनी विधायकी से इस्तीफा देते हुए भाजपा की प्राथमिक सदस्यता से भी इस्तीफा दे दिया है। गौरतलब है कि विधायक नारायण त्रिपाठी को भारतीय जनता पार्टी ने इस बार के विधानसभा चुनाव (MP Elections) में टिकट नहीं दिया है जिससे नारायण त्रिपाठी काफी आहत चल रहे थे। लिहाजा नारायण त्रिपाठी ने विधायकी और पार्टी की सदस्यता से एक साथ इस्तीफा दे दिया है। साथ ही उन्होने यह भी कहा है कि वो जल्द ही खुलासा करेंगे कि आगे क्या करने वाले हैं। नारायण त्रिपाठी कांग्रेस छोड़ कर भाजपा में शामिल हुए थे और पृथक विंध्य राज्य की मांग को लेकर वो लगातार अपनी आवाज बुलंद कर रहे थे। नारायण ने विंध्य राज्य की मांग करते हुए कई यात्राएं भी निकाली थी। मैहर को भी अलग जिला बनाने के लिए उन्होने काफी संघर्ष किया आखिरकार उन्हे सफलता मिली और मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान (Shivraj Singh Chouhan) ने मैहर को अलग जिला बनाने की घोषणा कर दी। माना जा रहा है कि नारायण त्रिपाठी जल्द ही कांग्रेस का दामन थाम सकते हैं हालाकि उन्होने अभी अपने पत्ते नहीं खोले हैं क्योंकि उन्होने खुद की भी पार्टी बनाने की बात कही थी। इसलिए सियासी गलियारों में यह कानाफूसी चल रही है कि शायद नारायण त्रिपाठी खुद की भी पार्टी से चुनाव लड़ सकते हैं। नारायण त्रिपाठी का भाजपा से अलग होने का मतलब है कि सतना में भाजपा का और कमजोर होना। भाजपा ने सतना से सांसद गणेश सिंह (Ganesh Singh) को विधानसभा चुनाव में उतार रखा है और नारायण त्रिपाठी अगर भाजपा गणेश सिंह को हराने में जुट जाएंगे तो यह सीट भाजपा के हाथ में नहीं आएगी। फिलहाल नारायण त्रिपाठी चिंतन और मंथन कर रहे हैं जल्द ही वो अपने सियासी पत्ते खोलेंगे।