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कांग्रेस के 'पेड' वर्करों के अति उत्साह ने डुबोई कांग्रेस की नैया
मप्र में जब विधानसभा चुनाव की उल्टी गीनती चल रही थी उसी वक्त कांग्रेस मीडिया विभाग का अति उत्साह पूरे शबाब पर था (congress mp) । उत्साह तो अच्छी बात है लेकिन अति उत्साह हमेशा बरबादी की ओर लेकर ही जाता है। पीसीसी चीफ कमल नाथ (kamal nath) को मीडिया विभाग को दुरुस्त करने के लिए भी एमपी से कोई और नहीं मिला उन्होने दिल्ली में काम करने वाले एक पत्रकार को समन्वयक बनाया। और कांग्रेस कार्यालय में मीडिया विभाग को दुरुस्त करने के लिए बैठा दिया। अब जब कमलनाथ ने किसी को बैठाया है तो अन्य प्रवक्ता उनकी जी हुजूरी में लग गए। स्थिति यहां तक पहुंच गई कि जिन प्रवक्ताओं ने जी हुजूरी नहीं की उन प्रवक्ताओं को ठिकाने लगा लिया गया। बांकि बचे प्रवक्ताओं ने दिल्ली से आए पेड वर्कर के सामने घुटने टेक दिए। अब पेड वर्कर साहब को खुश करने के लिए कांग्रेस के प्रवक्ता कुछ न कुछ करते रहते। आलम यह रहा कि जितने प्रवक्ता थे वो सब पेड वर्कर के साथ पीसीसी चीफ कमलनाथ की खुसामदी करने में भी जुट गए आलम ये था कि अगर कोई पत्रकार कांग्रेस कार्यालय में कांग्रेस के कमजोर पहलू पर बात करे तो उसे भाजपाई पत्रकार घोषित कर ब्लैक लिष्ट में डाल दिया जाता था और कहा जाता था कि हमारी सरकार आने दो उसके बाद इसको देख लिया जाएगा। दिल्ली से आए पेड वर्कर के अंडर में काम करने वाले प्रवक्ताओं का उत्साह इस सीमा पर पहुंच गया था कि वो पत्रकारों से सीधे मुंहु बात तक नहीं करते थे। आखिर ऐसा हो भी क्यों न। जब टीम का मुखिया आंख में पट्टी बांध ले तो फिर स्थिति में सुधार कैसे आएगा। कांग्रेस मीडिया विभाग पत्रकारों की लिष्ट बनाने में महगूल रहा और उसके ठीक उलट बीजेपी प्रदेश मीडिया प्रभारी आशीष अग्रवाल बगैर किसी भेदभाव के सभी पत्रकारों का मान और सम्मान करने में जुटे रहे। स्थिति तो तब और बुरी लगती थी जब कांग्रेस के पेड वर्कर पीसीसी चीफ कमल नाथ को यह बताते थे कि कांग्रेस इस बार 180 सीटों से कम नहीं जीतेगी। और पीसीसी चीफ कमलनाथ जैसा मझा हुआ सियासी खिलाड़ी भी अपने पेड वर्कर की बात को माल लेते थे। कांग्रेस के मीडिया विभाग में करोड़ों रुपये खर्च करने के बाद भी कांग्रेस मीडिया विभाग भाजपा के मीडिया विभाग को टक्कर देने में नाकाम रहा। यहां तक कि कांग्रेस के प्रवक्ता ठीक तरीके से भाजपा के प्रवक्ताओं का सामना तक नहीं कर पाए। जबकि सत्ता धारी दल के खिलाफ कहने के लिए बहुत कुछ होता है लेकिन कांग्रेस के प्रवक्ता पेड वर्कर की खुशामदी करने में इतने ब्यस्त रहे कि उन्हे पार्टी की बात जनता तक पहुंचाने का वक्त ही नहीं मिला। कुछ प्रवक्ताओं की स्तिति तो यहां तक देखने को मिली कि वो पेड वर्कर के पीछे-पीछे घूमते और उसका बैग उठाते उसके अलावा उनके पास अन्य कोई काम नहीं था (madhya pradesh election result)। ऐसे प्रवक्ताओं की लिष्ट भी Mukhbirmp.con जल्द ही जारी करेगा जो पार्टी का काम करने के बजाय बैग और टिफिन उठाने का काम करते थे।

'सुन लो रे कांग्रेसियो प्रदेश के हर घर में लाड़ली बहनों का ही राज चलता है'
मप्र में एक बार फिर भारतीय जनता पार्टी ने प्रचंड जीत दर्ज की है (madhya pradesh elections)। प्रदेश का हर राजनीतिक पंडित यही कह रहा था कि इस बार टफ फाइट है,कुछ ने यह माना कि इस बार के चुनाव में कांग्रेस पार्टी 140 से 160 सीटें जीतेगी,लेकिन उन राजनीतिक पंडितों को यह नहीं मालूम था कि हारी बाजी कैसे जीती जाती है उसका सबसे बड़ा उदाहरण मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान (shivraj singh chouhan) हैं। जहां से राजनीतिक पंडितों की सोच खत्म होती है वहीं से मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की सोच शुरु होती है। प्रदेश का हर ब्यक्ति यही कह रहा था कि सीएम के खिलाफ एंटीइंबेंसी है लेकिन उसे प्रो इंकंबेंसी में कैसे तब्दील करना है यह मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को बखूबी आता है। जिस वक्त लोग पाला बदलने में लगे थे उस वक्त मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान अपनी योजनाओं को अमली जामा पहनाने में लगे थे। मुख्यमंत्री ने सबसे पहले प्रदेश की आधी आवादी यानि महिलाओं को भाजपा की सरकार और खुद से जोड़ने की मुहिम शुरु की (ladli behna)। जिसके तहत उन्होने लाड़ली बहना योजना का आगाज किया। जिसके तहत सीएम शिवराज ने महिलाओं को आर्थिक रुप से सक्षम बनाने पर जोर दिया और उन्हे एक हजार रुपये देने की घोषणा कर दी। योजना की पहली किस्त डालते समय मुख्यमंत्री ने एक और बड़ा दांव खेला और कहा कि इस योजना को वो आगे बढ़ा कर तीन हजार रुपये तक कर देंगे। इतना ही नहीं मुख्यमंत्री ने लाड़ली बहना योजना के तहत घरेलू गैस सिलेंडर को 450 रुपये में देने की घोषणा भी कर दी। इस योजना को लांच करने के बाद मुख्यमंत्री ने ताबड़ तोड़ सभाएं लेनी शुरु की और महिलाओं से लगातार संपर्क और संवाद किया। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को इस बात का अहसास था कि बहनें अपने भाई को कभी धोखा नहीं दे सकतीं। और भाई बहन के इस अटूट संबंध को मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने लगातार मजबूत किया। सीएम शिवराज की जितनी तस्वीरें भी जारी होती थी वो लाड़ली बहनों के साथ ही होती थी। आखिरकार मुख्यमंत्री द्वारा बनाई गई रणनीति काम आई और लाड़ली बहनों ने अपने लाड़ले भाई का विश्वास नहीं तोड़ा। यह भी बता दिया कि घर के बाहर किसी का राज चले लेकिन घर के अंदर लाड़ली बहनों का ही राज चलता है।

एमपी में चला मोदी मैजिक,प्रचंड बहुमत की ओर भाजपा,मिठाई खिला कर मनाई जा रही खुशी
रुझानों को देखते हुए भारतीय जनता पार्टी में उत्साह का माहौल है। किस प्रकार से मध्य प्रदेश भाजपा (mp bjp) की ओर से एमपी के मन में मोदी नारा दिया गया था वह अब चरितार्थ होता नजर आ रहा है। जिस प्रकार से भाजपा लगातार प्रदेश में प्रचंड बहुमत की ओर आगे बढ़ रही है उसको देखते हुए भाजपा के नेता एक दूसरे को मिठाइयां खिला कर खुशियां मना रहे हैं। इस मौके पर प्रदेश मीडिया प्रभारी आशीष अग्रवाल (ashish agrawal) ने प्रदेश अध्यक्ष वीडी शर्मा (vd sharma) को मिठाई खिला कर जीत का जश्न मनाया। बीजेपी प्रदेश कार्यालय में कंट्रोल रुम का भी निर्माण किया गया है जिसमें पल-पल की खबर पर नजर रखी जा रही है। प्रदेश अध्यक्ष वीडी शर्मा का दावा है कि केन्द्र और राज्य सरकार की जन कल्याण की योजनाओं के कारण आज प्रदेश में एक बार फिर भाजपा की सरकार बन रही है। (madhya pradesh elections)

'कमलनाथ को अपने नेताओं पर नहीं भरोसा' निर्वाचन प्रमाण पत्र मिलते ही कमल नाथ के पास होगा जमा
आपरेशन लोटस (operation lotus) एमपी में फिर ना हो इसलिए कांग्रेस पार्टी ने बड़ी रणनीति तैयार की है। कांग्रेस की इस रणनीति का यह मतलब भी निकाला जा रहा है कि पीसीसी चीफ कमल नाथ (kamal nath) को अपने नेताओं पर भरोसा नहीं है। यह कयास इसलिए लगाए जा रहे हैं क्योंकि कांग्रेस पार्टी की ओर से सभी 230 प्रत्याशियों को फरमान जारी कर निर्देश जारी किया गया है कि मतगणना समाप्त होते ही प्रमाण पत्र को पीसीसी कमलनाथ के पास जमा कराना होगा। मतलब साफ है कि कांग्रेस के जितने संभावित विजेता हैं उनकी जीत होते ही उनको भोपाल आकर अपने प्रमाण पत्र पीसीसी चीफ कमलनाथ के हाथों में सौंपना पड़ेगा। जिससे भाजपा की तरफ से संपर्क करने के अथवा किसी भी लालच अथवा प्रलोभन देने के बाद भी कांग्रेस के विधायक भाजपा की तरफ न जाने पाएं। फिलहाल कांग्रेस के कंट्रोल रुम की तरफ से हर प्रत्याशियों से मिनट टू मिनट संवाद स्थापित किया जा रहा है जिससे उनके मन को समझने में दिक्कत न हो। Mukhbirmp.com को मिली जानकारी के अनुसार हर जिलों में प्रदेश कांग्रेस की ओर से ऐसे पदाधिकारियों को निगरानी में तैनात किया गया है जिन्हे वहां के स्थानीय नेता अथवा प्रत्याशी ना पहचानते हैं। खैर मतगणना कल है लेकिन कांग्रेस इस बार किसी प्रकार का मौका भाजपा को नहीं देना चाहती है यही कारण है कि कांग्रेस अलग-अलग तरीकों से अपने प्रत्याशियों की निगरानी कर रही है।

एग्जिट अनुमान अबकी बार 'कमल' की सरकार
मप्र में 17 नवंबर को मतदान संपन्न हुए थे तब से अब तक सभी प्रकार के राजनीतिक पंडित अपने-अपने तरीके से गणित लगा रहे थे कि एमपी में अगली किसकी सरकार बन रही है (madhya pradesh elections)। लंबे इंतजार के बाद गुरुवार को अलग-अलग एजेंसियों का एग्जिट पोल जारी हो गया। एग्जिट पोल (exit polls) में जिस प्रकार से चौकाने वाले आंकड़े आए हैं उसके बाद कांग्रेसी खेमें में खामोशी सी छा गई है। वहीं दूसरी तरफ भाजपा (mp bjp) में भी तरह-तरह की बातें शुरु हो गई है। दरअसल जिस प्रकार से एग्जिट पोल के अनुमान आया है उसके मुताबिक भारतीय जनता पार्टी प्रदेश में एक बार फिर से प्रचंड बहुमत के साथ सरकार बनाने जा रही है। मतलब साफ है कि एग्जिट पोल के मुताबिक कमलनाथ (kamal nath) की कोई भी गारंटी काम नहीं आई। कांग्रेस के वचन पत्र में महिलाओं,कर्मचारियों,किसानों हर वर्ग को साधने के लिए कुछ न कुछ गारंटी दी गई थी। यह भी बार-बार कहा जा रहा था कि इस बार कांग्रेस पार्टी एकजुट होकर चुनाव लड़ रही है लेकिन एग्जिट पोल के नतीजों ने कांग्रेस (mp congress) की बकिया उधेड़ कर रख दी है। कांग्रेस की ओर से एग्जिट पोल की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े किए जा रहे हैं और कहा जा रहा है कि भाजपा की साजिश के तहत इस प्रकार के रुझान दर्शाए जा रहे हैं जबकि स्थिति ठीक इसके उलट है। वहीं भाजपा नेताओं की मानें तो उधर खुशी की लहर है। भाजपा के नेताओं का मानना है कि एग्जिट पोल के अनुमान से भी अच्छे परिणाम भाजपा के पक्ष में आएंगे क्योंकि भाजपा की सरकार ने इतने काम किए हैं जिसका परिणाम वोट के रुम में भाजपा के पक्ष में आएगा।

एग्जिट पोल पर भरोसा नहीं करतीं पूर्व सीएम उमा भारती
मध्य प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा की वरिष्ठ नेत्री उमा भारती (uma bharti) ने गुरुवार को कहा कि वो एग्जिट पोल (exit poll) पर भरोसा नहीं करतीं हैं। उनका ये बयान पांच राज्यों के एग्जिट पोल जारी होने से पहले आया। पत्रकारों ने जब उनसे एग्जिट पोल के बारे में सवाल किया तो उन्होंने कहा कि वह (एग्जिट पोल) भरोसा नहीं करतीं। उन्होंने दावा किया कि वे भविष्यवाणी करते हैं कि एक पार्टी 112 से 130 सीटों के बीच जीतेगी। उन्होंने कहा कि अब अगर उस पार्टी को 112 सीटें मिलती हैं और चुनाव हार जाती है, तो एग्जिट पोल करने वालों का दावा है कि वे सही साबित हुए हैं, लेकिन अगर उस पार्टी को 120 सीटें मिलती हैं और वह जीतती है, तो एग्जिट पोल का दावा है कि उनकी भविष्यवाणी सही थी। जब उनसे पूछा गया कि भाजपा कितनी सीटें जीतेगी, तो उन्होंने कहा कि पार्टी हर सीट जीतने के लिए चुनाव लड़ती है। उन्होंने कहा कि दिसंबर 2018 और मार्च 2020 के बीच 15 महीने की अवधि को छोड़कर भाजपा 2003 से मध्य प्रदेश में सत्ता में है। मार्च 2020 में कांग्रेस की सरकार गिर गई और भाजपा सत्ता में वापस आ गई।

कांग्रेस की सरकार बनी तो शर्त में मिलेंगे एक लाख,स्टांप पर लिख कर दिया
तीन दिसंबर को मतगणना होने वाली है लेकिन उसके पहले लोगों के धैर्य का बांद फूट रहा रहा (madhya pradesh elections)। दरअसल प्रदेश में भाजपा और कांग्रेस में से किसकी सरकार बनेगी उसको लेकर शर्त लगाने का दौर तेज हो गया हो। दो लोगों ने शर्त की सीमा को लांघते हुए स्टांप पेपर पर एक लाख रुपये की शर्त लगा डाली है। बकायता दोनों ने स्टांप पेपर में एक लाख रुपये की शर्त लगाई है। धनीराम भलावी ने शर्तलगाते हुए कहा है कि कांग्रेस की सरकार (congress government) बनेगी वहीं नीरज मालवीय ने कहा है कि भाजपा की सरकार (bjp government) बनेगी। शर्त को और अपनी बात को सही साबित करने के लिए नोटरी से पचास रुपये स्टांप भी बनवाया गया है। इतना ही नहीं दोनों ने एक-एक लाख का चेक साइन कर गांव के ही अमित पांडे को दिया है जिसकी सर्त सही साबित होगी वो नीरज पांडे से एक लाख रुपये का चेक प्राप्त कर लेगा। यह पहला मौका नहीं है इससे कुछ दिन पहले भी इसी प्रकार से सर्त लगाई गई थी। फिलहाल इंतजार तीन दिसंबर का है जिस दिन मतगणना होगी उस दिन क्लियर होगा की एक लाख की लाटरी किसकी लगने वाली है।

17 जिलों के परिणाम तय करेंगे प्रदेश की भावी सरकार
मध्य प्रदेश के 17 जिलों के चुनाव परिणाम पर भाजपा और कांग्रेस,दोनों दलों की नजर है (madhya pradesh elections)। 2018 के चुनाव में यहां एकतरफा परिणाम रहे थे। टीकमगढ़,रीवा,सिंगरौली,शहडोल,उमरिया,हरदा,नर्मदापुरम,सीहोर और नीमच जिले की सभी सीटें भाजपा ने जीती थी। जबकि मुरैना,अशोक नगर,अनूपपुर,डिंडौरी,छिंदवाड़ा,अलीराजपुर और झाबुआ जिले की सभी सीटें कांग्रेस ने जीती थी। खरगोन जिले की छह में से पांच सीटें कांग्रेस ने तो एक पर कांग्रेस के बागी (केदार डाबर) निर्दलीय चुनाव लड़ कर जीते थे। अब ये कांग्रेस के टिकट पर चुनाव मैदान पर हैं। प्रदेश में बुरहानपुर और आगर जिला ऐसा है, जहां एक-एक सीट कांग्रेस और भाजपा तो एक-एक पर निर्दलीय चुनाव जीते थे। बुरहानपुर जिले में नेपानगर सीट कांग्रेस और बुरहानपुर से निर्दलीय विधायक सुरेन्द्र सिंह शेरा चुनाव जीते थे। शेरा अब कांग्रेस की टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं। यही स्थिति आगर जिले में भाजपा के साथ बनी थी। यहां एक सीट भाजपा तो एक निर्दलीय विक्रम सिंह राणा ने जीती थी। राणा इस चुनाव में भाजपा से मैदान में हैं। इस प्रकार 17 जिलों के परिणाम या तो भाजपा के पक्ष में थे या फिर कांग्रेस के।

दांव पर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ, दस लाख रुपये की लगी शर्त
मध्य प्रदेश के विधानसभा चुनाव में हाट सीट रही छिंदवाड़ा से प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमल नाथ मैदान में हैं (kamal nath)। मतगणना तीन दिसंबर को होगी। इससे पहले हार-जीत पर शर्त लगाई जाने लगी है। छिंदवाड़ा में एक पत्र व स्टांप पेपर इंटरनेट मीडिया में जमकर वायरल हो रहा है। जिसमें कमल नाथ की हार पर 10 लाख रुपयों की शर्त लगाई गई है। दो लोगों के बीच लगी शर्त में स्टांप पेपर पर तीन गवाह भी शामिल हैं। हालांकि मामला सुर्खियों में आने के बाद शर्त लगाने वालों ने यह शर्त रद की बात कही। शहर के लालबाग निवासी प्रकाश साहू और राम मोहन साहू ने एक एग्रीमेंट तैयार किया था। इसमें लिखा गया कि अगर कमल नाथ हारते हैं तो वह राम मोहन साहू को 10 लाख रुपये देंगे। अगर भाजपा के बंटी साहू (banti sahu) हारेंगे तो राम मोहन साहू एक लाख रुपये देंगे। इस इकरारनामे में तीन गवाह भी शामिल हैं। इसी प्रकार कांग्रेस के दो युवाओं ने भी आपस में शर्त लगाई है। (madhya pradesh elections)

मतगणना से पहले कांग्रेस देगी उम्मीदवारों को ट्रेनिंग
मप्र में 17 नवंबर को वोटिंग हो चुकी है और अब तीन दिसंबर को मतगणना होनी है (madhya pradesh elections)। उसके पहले भाजपा और कांग्रेस पार्टी अपने उम्मीदवारों को मतगणना को ट्रेनिंग देने की योजना बना रहे हैं। जिससे मतगणना के दौरान किसी प्रकार की हेरा फेरी ना होने पाए। दिलचश्प पहलू यह है कि कांग्रेस पार्टी के जितने भी एजेंट मतगणना में मौजूद रहेंगे वो हर राउंड के बाद प्रमाण पत्र लेंगे। कांग्रेस पार्टी की ओर से बकायदा ट्रेनिंग देने का काम किया जा रहा है जिसके लिए 26 तारीख तय की गई है। पार्टी के सभी 230 उम्मीदवार अथवा उनका कोई प्रतिनिधि प्रदेश कांग्रेस कार्यालय में 26 नवंबर को आकर ट्रेनिंग लेगा। और फिर वो अपने क्षेत्र में जाकर अन्य कार्यकर्ताओं को ट्रेनिंग देगा। ठीक इसी प्रकार से भारतीय जनता पार्टी ने भी रणनीति तैयार की है लेकिन भाजपा के उम्मीदवारों और कार्यकर्ताओं को भोपाल बुलाने के बजाय उन्हे जिला मुख्यालय में ही ट्रेनिंग देने का काम किया जाएगा। पार्टी सूत्रों के मुताबिक भारतीय जनता पार्टी एक्सपर्टों की टीम सभी जिला मुख्यालयों में भेजेगी जहां उस संबंधित जिले की सभी विधानसभा सीटों के प्रत्याशी और उनके एजेंट मौजूद रहेंगे जिन्हे एक्सपर्टों के माध्यम से ट्रेनिंग दी जाएगी। गौरतलब है कि तीन दिसंबर को प्रदेश भर में मतगणना होने जा रही है (assembly elections results) भाजपा और कांग्रेस दोनों ही पार्टियां अपनी जीत का दावा कर रही हैं और उनका दावा खोंखला साबित न होने पाए, मतगणना के दौरान किसी प्रकार की कोई कमी न रह जाए जिसके कारण भविष्य में पछताना न पड़े इसी लिए भाजपा और कांग्रेस ने अपने प्रत्याशियों और कार्यकर्ताओं को ट्रेनिंग देने की रणनीति तैयार की है। जिसको अमली जामा पहनाने के लिए भाजपा और कांग्रेस की ओर से काम भी शुरु हो चुका है।

बंपर वोटिंग सत्ता परिवर्तन के दे रही संकेत,राजनीतिक पार्टियां निकाल रहीं वोटिंग के मायने
प्रदेश में जब भी बंपर वोटिंग हुई है तब सत्ता परिवर्तन हुए हैं (madhya pradesh elections)। भाजपा और कांग्रेस इस वक्त यही गुत्थी सुलझाने में लगे हैं कि बंपर वोटिंग के मायने क्या हैं यह वोटिंग भाजपा के पक्ष में हुई है अथवा कांग्रेस के पक्ष में हुई है। आइए जानते हैं कि 2003 से लेकर 2018 तक राज्य में कितनी वोटिंग हुई और किसकी सरकार बनी। मध्यप्रदेश में 2018 में 75 फीसदी से ज्यादा वोटिंग हुई थी। 2018 के विधानसभा चुनाव में 75.2 फीसदी मतदान हुआ था। जिसके बाद राज्य में सत्ता परिवर्तन हुआ था। हालांकि किसी भी पार्टी को पूर्ण बहुमत नहीं मिला था। कांग्रेस को सबसे ज्यादा 114 और बीजेपी को 109 सीटें मिलीं थी। वहीं, वोट शेयर की बात करें तो 2018 में बीजेपी को कांग्रेस से ज्यादा वोट मिले थे। 2013 के विधानसभा चुनाव में राज्य की 230 विधानसभा सीटों पर 70.8 फीसदी वोटिंग हुई थी। इस चुनाव में बीजेपी को 165 और कांग्रेस को मात्र 57 सीटों पर जीत मिली थी। मध्यप्रदेश में 2008 के विधानसभा चुनाव में 69 फीसदी वोटिंग हुई थी। 70 फीसदी से कम हुई वोटिंग के बाद भी बीजेपी ने अपनी सरकार को बरकरार रखा था। बीजेपी को 143 और कांग्रेस को 71 सीटों पर जीत मिली थी। मध्यप्रदेश में 2003 के चुनाव बेहद अमह माने जाते थे। मध्यप्रदेश से छत्तीसगढ़ के अलग होने के बाद राज्य में पहली बार चुनाव हुए थे। 2003 में मध्यप्रदेश में कांग्रेस की सरकार थी। बीजेपी ने उमा भारती के नेतृत्व में चुनाव लड़ा था। 2003 में राज्य में 67 फीसदी वोटिंग हुई थी। तब बीजेपी को 173 और कांग्रेस को मात्र 38 सीटों पर जीत मिली थी। मध्यप्रदेश के बीते पांच चुनावों की बात करें तो केवल 2018 में ही 75 फीसदी से ज्यादा वोटिंग हुई थी। 2018 में किसी पार्टी को पूर्ण बहुमत तो नहीं मिला था लेकिन राज्य में कांग्रेस की सरकार बनी थी। अगर आंकड़ों पर गौर करें तो यह साफ होता है कि 75 फीसदी से ज्यादा वोटिंग राज्य में बदलाव का संकेत देती है (madhya pradesh voter turnout)।

एमपी में सियासी जमीन की तलाश में तीसरे दलों ने कई सीटों पर भाजपा-कांग्रेस का बिगाड़ा गणित
मप्र में मतदान हो चुका है और उम्मीदवारों की किस्मत ईवीएम में कैद हो चुकी है (mp elections)। साल 2018 की तुलना में इस साल बंपर वोटिंग हुई है जिससे भाजपा और कांग्रेस दोनों दलों में काफी उत्साह देखने को मिल रहा है। भाजपा के नेताओं का मानना है कि लाड़ली बहना योजना के कारण महिलाएं घर से बाहर निकली हैं और भाजपा कज पक्ष में वोट किया है वहीं कांग्रेस के नेताओं का दावा है कि पीसीसी चीफ कमलनाथ ने जिस प्रकार से अपने वचन पत्र में गारंटियां दी हैं उसी का परिणाम है कि प्रदेश में बंपर वोटिंग हुई है। खैर किस पार्टी का वर्चश्व होगा वो तो तीन दिसंबर को ही पता चलेगा लेकिन सबसे अहम बात यह है कि मप्र में हुए इस चुनाव में भाजपा और कांग्रेस के अलावा बसपा,आमआदमी पार्टी,सपा सहित कई अन्य दलों ने भी खूब पसीना बहाया और मजबूत उम्मीदवार उतारे हैं। प्रदेश की करीब दो दर्जन से ज्यादा ऐसी सीटें हैं जहां पर त्रिकोणीय मुकाबला है। अकेले विंध्य की दर्जन भर सीटों में त्रृकोणीय मुकाबला देखने को माल रहा है। जिसमें बीएसपी और सपा दोनों पार्टियों के उम्मीदवारों ने अलग-अलग सीटों पर भाजपा और कांग्रेस को खासी टक्कर दी है। पूरे एमपी में माना जा रहा है कि बीएसपी की करीब पांच से छह सीटें आने वाली हैं। जिस प्रकार से वोटिंग प्रतिशत आया है उससे दोनों पार्टियों में उत्साह तो खूब है लेकिन अंदर ही अंदर दोनों पार्टियों में चिंता की लकीरें भी देखने को मिल रही हैं। सभी नेता हिसाब लगाने में जुट गए हैं कि वोट प्रतिशत बढ़ा है तो इसका मतलब क्या है?