जिस देश में 15 सौ रुपये में सरकार बनती है उस देश में नारी सशक्तिकरण की बात होती है लेकिन बेरोजगारी मुद्दा नहीं होती

महिला सशक्तिकरण के नाम पर चुनाव से ठीक पहले महिलाओं को मुफ्त में राशि बांटी जाती है। और कहा जाता है कि इससे नारी सशक्त हो रही है। इससे कई राज्यों में सरकार भी बनती है। लेकिन इंसान की अपेक्षाएं धीरे-धीरे बढ़ने लगती है। और इसकी जानकारी भाजपा जैसी पार्टी को है। इसी लिए उन्हीं महिलाओं की भावना का लाभ लेने के लिए एक नया तरीका इजात होता है महिला आरक्षण। संसद का विशेष सत्र भी बुलाया जाता है। भाजपा के नेताओं को यह मालूम रहता है कि सदन में बिल औंधे मुंह गिरेगा लेकिन यहां तो भाजपा की चिट भी अपनी और पट भी अपनी ही। दो दिन जमकर हाई वोल्टेज ड्रामा देखने को मिलता है। आखिर में वही होता है जो सब जानते हैं। महिला आरक्षण का बिल औंधे मुंह गिर जाता है। उसके बाद भाजपा जुट जाती है महिलाओं की भावना के बांध को अपनी तरफ मोड़ने पर। अब सवाल इस बात का उठता है कि महिला आरक्षण के नाम पर संसद का विशेष सत्र आयोजित होता है लेकिन यही संसद कभी बेरोजगारी के लिए नई बुलाई गई। जिन महिलाओं को हम लक्ष्मी और शक्ति के रुप में पूजते हें उन्हीं महिलाओं को चुनाव के समय चंद पैसों में तौल कर उनके सशक्तिकरण की बात हो जाती है। असल में भारत की अर्थव्यवस्था ही महिलाओं के हाथ में होती है। भारत के प्रत्येक घर में महिलाओं का राज चलता है। घर में खाना बनाने से लेकर घर में प्रत्येक कार्य महिलाओं के भरोसे ही होता है उसके बाद भी कहा जाता है कि महिला कमजोर है सशक्त नहीं है। इतना सबकुछ होने के बाद भी अगर महिला सशक्त नहीं है और सरकार द्वारा दिए जा रहे चंद रुपयों से नारी सशक्त हो रही है तो यह एक ठगने वाला बयान हो सकता है। असल में महिला उस दिन सशक्त होगी जिस दिन उसके पति अथवा बेटे को नौकरी मिलेगी। जब पति और बेटा नौकरी करेंगे तो वो पैसा उसी महिला के पास आएगा। जिस दिन महिला के पास मेहनत से कमाए पैसे आएंगे उस दिन वो नारी खुद को सशक्त महसूस करने लगेगी। भारत की नारी स्वाभिमानी होती है। लेकिन उसके स्वाभिमान को चंद पैसों से खरीदने का षड़यंत्र हो रहा है जिसे भावनाओं में आकर नारी खुद समझ नहीं पा रही हैं। जिस दिन महिलाओं की समझ में ये बात आ जाएगी कि चंद पैसे बांट कर राजनीतिक रोटियां सेंकने के लिए उन्हें इस्तेमाल किया जा रहा है उस दिन महिलाएं सरकार से पैसे लेने के बजाय कहेंगी कि उन्हें 1500 रुपये देने के बजाय उनके पति अथवा बेटे को नौकरी दे दी जाए जिससे सिर्फ वो सशक्त नहीं होंगी बल्कि उनका पूरा परिवार सशक्त हो जाएगा।
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होंगे आप 'सीएम' लेकिन जिले के 'राजा' तो हम हैं प्रदेश की ब्यूरोक्रेसी दे रही सरकार को मौन चुनौती
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