भाजपा को कांग्रेस से नहीं खुद से चुनाव लड़ने की करनी होगी तैयारी भाजपा के नेता ही होंगे पार्टी के लिए चुनौती

पीढ़ी परिवर्तन के नाम पर भाजपा ने जो रायता फैलाया है उसको समेटना अब पार्टी के लिए कठिन चुनौती साबित होने वाला है। दरअसल राष्ट्रीय अध्यक्ष के रुप में युवा नेता नितिन नवीन का चयन होने के बाद भाजपा में पीढ़ी परिवर्तन की बात प्रमुखता से उठाई जा रही है। हाल ही में जारी राष्ट्रीय कार्यकारिणी की लिस्ट में भी पीढ़ी परिवर्तन की छवि देखने को मिली है। लेकिन अब सवाल इस बात का उठ रहा है कि जिन वरिष्ठ नेताओं के भरोसे भाजपा अब तक फर्ष से अर्ष तक पहुंचती रही है उन्हीं नेताओं को घर बैठाने का मतलब है कि अपने ही नेताओं को चुनौती देना अथवा उनके राजनीतिक भविष्य पर सीधे विराम लगा देना। पार्टी के जितने भी उम्रदराज नेता हों वो खुद भले चुनाव जीतने की क्षमता न रखते हों लेकिन भाजपा के उम्मीदवार को हराने का दम जरुर रखते हैं। इसकी बानगी दतिया में देखने को मिल चुकी है। जहां पर पूर्व गृह मंत्री डाक्टर नरोत्तम मिश्रा की लाख कोशिशों के बाद भी भाजपा दतिया के जनता का दिल जीतने में नाकाम रही और नतीजे के तौर पर मोहन सरकार के कार्यकाल में भाजपा को दूसरे उप चुनाव में शर्मनाक हार का सामना करना पड़ा। उसके बाद भी भाजपा नेतृत्व की आंखें नहीं खुली और पूर्व गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा को राष्ट्रीय कार्यकारिणी से बाहर रखा गया। कुछ ऐसा ही हाल गोपाल भार्गव का है जो नौ बार के विधायक हैं लेकिन उन्हें मंत्री नहीं बनाया गया। बेटे के लिए टिकट मांगा तो पार्टी परिवारवाद की बात करती है। ऐसी स्थिति में गोपाल भार्गव पार्टी के लिए समस्या बन सकते हैं। एक और वरिष्ठ नेता भूपेन्द्र सिंह हैं जो चुनाव जीतने के बाद भी उपेक्षा का दंश झेलने को मजबूर हैं। आर्टी के हर बुरे वक्त में खड़े रहने वाले भूपेन्द्र सिंह को साइड लाइन कर दिया गया क्योंकि वो शिव समर्थक माने जाते हैं। भाजपा में इसी प्रकार विरोधी नेताओं की संख्या बढ़ती जा रही है। कैलाश विजयवर्गीय हैं अथवा प्रहलाद पटेल और फिर राकेश सिंह ये सब ऐसे नेता हैं जिनको सिर्फ पोर्टपोलियो के नाम पर मंत्री बनाया गया है। बांकी ये अपने विभाग में किसी चपरासी का भी तबादला करने का दम नहीं रखते। कुछ मंत्रियों ने तो अब काम करना भी बंद कर दिया है उनका कहना है कि जब काम होना ही नहीं है उन्हें काम करने का अधिकार ही नहीं है तो उससे ठीक यही है कि वो शांत बैठें और तमाशा देखें। साल 2027 से चुनावी गिनती शुरु होने वाली है पहले नगरीय निकाय चुनाव होंगे जिसमें भाजपा को अपनी क्षमता का अंदाजा होगा उसके बाद विधानसभा चुनाव की बारी आएगी।
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एमपी में 'इंजन-डिब्बे' पर चल रही लड़ाई कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी का बड़ा बयान सरकार को दिया आठ दिन का 'अल्टीमेटम'
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