रीवा में भाजपा खुद की पार्टी से एक भी नेता नहीं कर पाई तैयार सातों विधायक दूसरे दल से आए चला रहे भाजपा

भारतीय जनता पार्टी दूसरे दल से आए नेताओं का बड़ा ठिकाना बनता जा रहा है। भाजपा खुद के नेता तैयार करने के बजाय दूसरे दल से आए नेताओं को चुनाव में लड़ाने पर ज्यादा विश्वास रखती है और उसमें भाजपा को कामयाबी भी मिली है। बात करें विंध्य की राजधानी रहे रीवा की तो वहां पर भाजपा के सात विधायक हैं और सभी विधायक दूसरे दलों से आए हुए हैं। राजेन्द्र शुक्ल विंध्य भाजपा के सबसे बड़े चेहरे माने जाते हैं। सरकार में डिप्टी सीएम हैं और सीएम पद की दौड़ में शामिल हैं ये बात किसी से छुपी नहीं है। आज का युवा वर्ग शायद उन्हें भाजपा नेता के रुप में जानता है लेकिन हकीकत तो यही है कि राजेन्द्र शुक्ल ने राजनीति का ककहरा कांग्रेस में रह कर सीखा इतना ही नहीं उन्होंने कांग्रेस पार्टी से चुनाव भी लड़ा लेकिन कामयाबी नहीं मिलने पर भाजपा का दामन थामा और उसके बाद कभी हार का स्वाद नहीं चखा। विस अध्यक्ष रह चुके गिरीश गौतम कम्युनिस्ट पार्टी से आए। तीन बार श्रीनिवास तिवारी ने उन्हें मनगवां विधानसभा सीट से चुनाव हराया उसके बाद उन्होंने भाजपा का दामन थामा तो अब तक पांच बार विधानसभा का चुनाव जीत चुके और अब भी विधायक हैं। मऊगंज से प्रदीप पटेल बीएसपी के नेता रहे बाद में भाजपा में आए और आज भी विधायक हैं। गुढ़ विधायक नागेन्द्र सिंह भी कांग्रेस से ही भाजपा में शामिल हुए थे। सिरमौर से लगातार तीन बार भाजपा के विधायक रह चुके दिव्य राज सिंह पुराने कांग्रेसी हैं उनके पिता दिग्विजय सरकार में मंत्री थे बाद में चुनाव हारे लेकिन पिता के नक्शे कदम पर चलते हुए दिव्यराज सिंह ने भी कांग्रेस से सक्रिय राजनीति की बाद में भाजपा का दामन थाम कर लगातार तीसरी बार विधायक बने और अब मंत्री बनने का सपना देख रहे हैं। पूर्व विधानसभा अध्यक्ष और विंध्य के सबसे चर्चित नेता श्रीनिवास तिवारी और फिर उनके बेटे सुंदरलाल तिवारी ने अपना पूरा जीवन कांग्रेस को समर्पित कर दिया तीसरी पीढ़ी में सिद्धार्थ तिवारी ने भी कांग्रेस में लोकसभा चुनाव से पार्टी का आगाज किया लेकिन नाकाम रहे और 2023 में कांग्रेस से टिकट नहीं मिलने की स्थिति में ऐन मौके पर उन्होंने भाजपा का दामन थामा और त्योंथर से विधायक बने। ऐसा भी नहीं है कि रीवा में भाजपा के नेता अथवा कार्यकर्ताओं का अभाव है लेकिन भारतीय जनता पार्टी ने लगातार दूसरे दलों से आए नेताओं को ही आगे किया और वहां के देवतुल्य कार्यकर्ताओं ने पार्टी के फैसले को सिर माथे में रख कर उन्हें चुनाव भी जिताया लेकिन अब पार्टी के कार्यकर्ता इस बात पर विचार करने लगे हैं कि क्या वो सिर्फ दरी बिछाने और होर्डिंग बैनर लगाने का ही काम करते रहेंगे पार्टी क्या उन्हें सिर्फ इसी लायक समझती है। मतलब साफ है कि साल 2028 में भाजपा को इस बात पर विचार करना होगा। नहीं तो कार्यकर्ताओं के सब्र का बांध कभी भी फूट सकता है।
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