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मध्य प्रदेश

हिंदुओं की घटती आबादी बढ़ता विवाद,आखिर पलायन के पीछे किसका है हाथ पढ़िए खबर

Mar 26, 2025 3 min read
हिंदुओं की घटती आबादी बढ़ता विवाद,आखिर पलायन के पीछे किसका है हाथ पढ़िए खबर
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पुराने भोपाल में हिंदुओं की घटती आबादी सरकार के लिए चिंता का विषय हो सकती है। मामले की जानकारी देते हुए संघ के मध्य भारत प्रांत संघचालक अशोक पांडेय ने इस सर्वे के बारे में जानकारी देते हुए चिंता जाहिक की है। उन्होंने बताया कि भोपाल के पुराने शहर में हिंदुओं की आबादी तेजी से घट रही है। खासकर शाहजहानाबाद, मंगलवारा, बुधवारा, कोहेफिजा, सिंधी कॉलोनी, कबाड़खाना, टीलाजमालपुरा, चौकसेनगर, और ग्रीन पार्क कॉलोनी जैसे इलाकों में यह बदलाव साफ देखा जा सकता है। संघ के अध्ययन के मुताबिक, 1990 में कोहेफिजा में हिंदू-मुस्लिम अनुपात 80:20 था, यानी प्रति 100 परिवारों में 80 हिंदू और 20 अन्य समुदायों के थे। उस वक्त हाउसिंग बोर्ड और भोपाल डेवलपमेंट अथॉरिटी (बीडीए) ने इस क्षेत्र में कई आवासीय प्रोजेक्ट बनाए थे। लेकिन आज यह अनुपात उलटकर 30:70 हो गया है। अब इन इलाकों में हिंदू परिवार सिर्फ 30% रह गए हैं, जबकि अन्य समुदाय के लोग 70% हो गए हैं। संघ का दावा है कि 1990 के बाद से भोपाल के पुराने शहर से करीब 3,000 हिंदू परिवारों ने अपने घर बेच दिए, जिन्हें दूसरे समुदाय के लोगों ने खरीद लिया। यहां तक कि किराए पर रहने वाले हिंदू परिवार भी पुराना भोपाल छोड़कर नई बसाहटों की ओर जा रहे हैं। सिंधी कॉलोनी, जहाँ संघ का पुराना कार्यालय था, वहाँ भी हिंदुओं की आबादी आधी से ज्यादा घट गई है। अशोक पांडेय ने कहा, "यह पलायन चिंता का विषय है। हमें इस पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है।"आरएसएस ने अपनी स्थापना के 100 साल पूरे होने के मौके पर मध्यभारत क्षेत्र में एक व्यापक सामाजिक अध्ययन कराया। इस अध्ययन में मध्यप्रदेश के हर जिले में अलग-अलग 103 प्रकार की समस्याओं की पहचान की गई। यह अध्ययन संघ के विदिशा विभाग की 56 व्यवसायी शाखाओं के प्रयास से किया गया। अशोक पांडेय ने बताया, "हर जिले की समस्याएँ अलग हैं। कहीं शिक्षा की कमी है, कहीं स्वास्थ्य सेवाओं की, तो कहीं सामाजिक असंतुलन बढ़ रहा है। लेकिन भोपाल में हिंदुओं का पलायन सबसे गंभीर मुद्दा बनकर उभरा है।"आरएसएस का यह अध्ययन एक चेतावनी है-कि अगर समय रहते इस पलायन पर ध्यान नहीं दिया गया, तो भोपाल की सांस्कृतिक तस्वीर पूरी तरह बदल सकती है। अब सवाल यह है कि क्या इस मुद्दे पर एक सकारात्मक पहल होगी, या यह सिर्फ बहस तक सीमित रह जाएगा? इसका जवाब आने वाले दिनों में मिलेगा।

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