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मध्य प्रदेश

ओबीसी वर्ग को आरक्षण का 'लालीपाप' देकर कोर्ट में लड़ाई लड़ने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही कांग्रेस सवर्णों की नाराजगी का सता रहा डर

साल 2019 में राजनीतिक लाभ उठाने के लिए तत्कालीन कमलनाथ सरकार ने सरकारी नौकरियों में ओबीसी आरक्षण 14 से बढ़ाकर 27 फीसदी किया था। उसके बाद लोकसभा चुनाव ...

• Oct 18, 2026• 3 min read
ओबीसी वर्ग को आरक्षण का 'लालीपाप' देकर कोर्ट में लड़ाई लड़ने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही कांग्रेस सवर्णों की नाराजगी का सता रहा डर

📷 Cover Photo: ओबीसी वर्ग को आरक्षण का 'लालीपाप' देकर कोर्ट में लड़ाई लड़ने

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साल 2019 में राजनीतिक लाभ उठाने के लिए तत्कालीन कमलनाथ सरकार ने सरकारी नौकरियों में ओबीसी आरक्षण 14 से बढ़ाकर 27 फीसदी किया था। उसके बाद लोकसभा चुनाव के दौरान इसे प्रदेश के सबसे बड़े वर्ग के  को साधने की पहल के रुप में प्रस्तुत किया गया। यह बात अलग है कि कांग्रेस 29 लोकसभा सीटों में हार गई। यहां तक कि कमलनाथ अपनी पारंपरिक सीट छिंदवाड़ा में भी चुनाव हार गए। राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि कमलनाथ के फैसले से सामान्य वर्ग भाजपा से अलग हो गया जिसके कारण कांग्रेस को पहले विधानसभा और फिर लोकसभा चुनाव में करारी हार का सामना करना पड़ा। 2023 में दिग्विजय सिंह ने दलित एजेंडे के चलते भी कुछ ऐसी ही स्थिति बनी थी। राजनीतिक हानि-लाभ के आंकलन के बीच कांग्रेस कभी सामाजिक संगठनों को आगे रखने तो कभी अपने ओबीसी नेताओं के नेतृत्व में लड़ाई लड़ने पर विचार कर रही है। कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने पूर्व अध्यक्ष अरुण यादव की अध्यक्षता में समिति बनाई गई है। कांग्रेस ने सभी से विचार- विमर्श करने के बाद कदम उठाने का फैसला किया है। दरअसल साल 2023 के विधानसभा और फिर 24 के लोकसभा चुनाव में करारी हार का सामना करने के बाद कांग्रेस को सवर्ण वर्ग के वोट की ताकत का अंदाजा लगा। यही कारण है कि ओबीसी वर्ग के आरक्षण की बात तो कांग्रेस करती रही लेकिन उसका आरोप भाजपा की सरकार पर मढ़ती रही है। कांग्रेस के कुछ सवर्ण नेताओं का भी कहना है कि साल 2018 में जब तत्कालीन सीएम शिवराज ने सवर्णों को चुनौती देते हुए माई के लाल शब्द का इस्तेमाल किया था तो प्रदेश से 15 साल बाद भाजपा की सरकार का सफाया हो गया था। लिहाजा उस बात का अहसास कांग्रेस को है। इसी लिए कांग्रेस ऐसी कोई ग़लती नहीं करना चाहती जिससे सवर्ण वर्ग का वोट बैंक सीधे छिटक जाए। दूसरी तरफ भाजपा भी ओबीसी आरक्षण के मामले में फंस चुकी है। सवर्णों को छोड़ना नहीं चाहती और ओबीसी वर्ग से बैर लेना नहीं चाहती। इसी लिए भाजपा भी अपने ओबीसी वर्ग के नेताओं और विधायकों को आगे करके ओबीसी वर्ग की लड़ाई को आगे बढ़ाना चाहती है जिससे सीधे सवर्णों से भी बैर न हो और ओबीसी वर्ग को भी साधा जा सके। कुल मिला कर कमलनाथ के द्वारा फैलाए रायते को अब तक पक्ष और विपक्ष समेट नहीं पाए हैं। जितना समेटने की कोशिश करते हैं उतना बिखरता जाता है।

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