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मध्य प्रदेश

बीजेपी के सामने बड़ी चुनौती नाराज और उपेक्षित नेताओं को कैसे मनाएगी पार्टी

भाजपा की खूबी एकजुटता के साथ चुनाव लड़ना और जीतना है। लेकिन मध्य प्रदेश में इस बार की परिस्थितियां कुछ अलग हैं

• Nov 7, 2026• 4 min read
बीजेपी के सामने बड़ी चुनौती नाराज और उपेक्षित नेताओं को कैसे मनाएगी पार्टी

📷 Cover Photo: बीजेपी के सामने बड़ी चुनौती नाराज और उपेक्षित नेताओं को कैसे

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भाजपा की खूबी एकजुटता के साथ चुनाव लड़ना और जीतना है। लेकिन मध्य प्रदेश में इस बार की परिस्थितियां कुछ अलग हैं। दरअसल साल 2023 में हुए विधानसभा चुनाव के बाद भाजपा में ऐसा पीढ़ी परिवर्तन का दौर चला जिसकी चपेट में पार्टी के वो नेता आ गए जिनके नाम पर पार्टी चलती थी न कि वो पार्टी के नाम से चलते थे। सीएम बदलते ही सबसे पहले मंत्रिमंडल में अप्रत्याशित बदलाव कर नए चेहरों को आगे किया गया और पार्टी के सीनियर नेताओं को ऐसे साइड में कर दिया गया जैसे घर में कोई पुरानी वस्तु धूल खाती पड़ी हो। लेकिन भाजपा के ये पुराने नेता कोई वस्तु नहीं बल्कि जीती जागती ऐसी प्रतिमूर्ति हैं जो आज भी हवा का रुख बदलने का माद्दा रखते हैं। भाजपा में ऐसा नेता प्रदेश के प्रत्येक अंचल में मौजूद हैं जो उपेक्षा के शिकार हुए हैं। इन नेताओं में सबसे पहला नाम गोपाल भार्गव का आता है जिन्होंने भाजपा को शून्य से शिखर तक आते देखा है और जीवन में कभी चुनाव नहीं हारे आज घर बैठे हैं। भूपेन्द्र सिंह भी ऐसे नेता हैं जिन्होंने पार्टी को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। महाकौशल से बात करें तो अजय विश्नोई जैसे नेता उपेक्षा का दंश झेल रहे हैं,सीतासरण शर्मा भी उन्हीं नेताओं में एक हैं जो लगातार उपेक्षा का शिकार हो रहे हैं। कैलाश विजयवर्गीय सरकार में होकर भी न के बराबर हैं क्योंकि उनको किसी प्रकार का महत्व नहीं दिया जा रहा है और उसकी बानगी राष्ट्रीय अध्यक्ष के मंच में भी देखने को मिल चुकी है। इनके अलावा ग्वालियर-चंबल से बात करें तो पूर्व गृह मंत्री डाक्टर नरोत्तम मिश्रा जिन्हें भाजपा का संकटमोचक कहा जाता था आज पार्टी ने उन्हें सिर्फ साइड लाइन ही नहीं किया बल्कि उनके खिलाफ लगातार षड़यंत्र रचने की प्रक्रिया अब भी जारी है। जिसका सबसे बड़ा उदाहरण दतिया में हुआ उप चुनाव है जिसमें ऐन मौके पर उनका टिकट काट कर एक ऐसे बाहरी व्यक्ति को चुनाव मैदान में उतारा गया जिसके लिए सरकार और संगठन ने पूरे प्रशासनिक अमले को उतार दिया फिर भी चुनाव नहीं जिता पाए। नरेन्द्र सिंह तोमर जो विधानसभा अध्यक्ष हैं। कहने के लिए एक सम्मानित और संवैधानिक पद पर हैं लेकिन हकीकत वही जानते हैं कि उनके साथ क्या हो रहा है। यह तो बड़े नाम हैं बांकी पार्टी में इनके अलावा करीब दो दर्जन से अधिक और नेता हैं जो आज अपना अस्तित्व बचाए रखने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। अब सवाल इस बात का उठता है कि पिछले तीन साल से उपेक्षा का शिकार हो रहे इन नेताओं को पार्टी कैसे मिलाएगी। प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल के सुलझे हुए अध्यक्ष हैं और यह समझते हैं कि इन नेताओं की चुनाव में आवश्यकता पड़ेगी। संगठन महामंत्री चन्द्रशेखर तिवारी ने भी अपनी जमावट तेज कर दी है लेकिन सवाल यही है कि तीन साल से जिस उपेक्षा का दंश यह नेता जेल रहे हैं क्या वो ऐन चुनाव के मौके पर खत्म हो जाएगा। भाजपा कैडर की बात तो करती है लेकिन पार्टी में बढ़ता कांग्रेसी कल्चर पार्टी के मूल नेताओं के लिए समस्या का सबब बन सकता है। भाजपा को सबसे पहले जनता को छोड़ खुद के नेताओं को मनाने और एक मंच पर लाने की चुनौती है। जब तक इन वरिष्ठ नेताओं को पार्टी नहीं मनाती हैं तब तक मिशन 28 फतह करना पार्टी के लिए एक दुश्वप्न से कम नहीं कहा जा सकता।

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