मध्य प्रदेश
16000 परिवारों के लिए बड़ी खबर! अनुकंपा नियुक्ति पर CM का बड़ा आदेश - अब नहीं टलेगा और नहीं अटकेगी अनुकंपा नियुक्ति
भोपाल। अगर आपके परिवार में भी किसी सरकारी कर्मचारी की ड्यूटी के दौरान मौत हुई है और आप सालों से अनुकंपा नियुक्ति के लिए फाइल लेकर भटक रहे हैं, तो ये ख...
• Nov 7, 2026• 2 min read

📷 Cover Photo: 16000 परिवारों के लिए बड़ी खबर! अनुकंपा नियुक्ति पर CM का बड
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भोपाल। अगर आपके परिवार में भी किसी सरकारी कर्मचारी की ड्यूटी के दौरान मौत हुई है और आप सालों से अनुकंपा नियुक्ति के लिए फाइल लेकर भटक रहे हैं, तो ये खबर आपके लिए है।
मध्यप्रदेश में ऐसे ही लगभग 16,000 मामले सालों से अटके पड़े थे। फाइलें धूल खा रही थीं, आश्रित दर-दर भटक रहे थे, लेकिन अब मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने सीधा अल्टीमेटम दे दिया है - अब कोई बहाना नहीं चलेगा!
क्या हुआ है? जानिए 1 मिनट में
मुख्यमंत्री के निर्देश पर सामान्य प्रशासन विभाग ने शुक्रवार को सभी विभागों को साफ आदेश जारी कर दिया है - लंबित अनुकंपा नियुक्ति के सभी मामलों का निराकरण करो।
मुख्यमंत्री जल्द ही खुद इसकी समीक्षा भी करेंगे। यानी अब अधिकारी फाइल को टाल नहीं पाएंगे।
कहां अटके हैं सबसे ज्यादा केस?
ये 16,000 मामले सिर्फ एक विभाग के नहीं हैं। हर विभाग में अटके हैं:
- लोक निर्माण, वन, लोक स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा
- पुलिस एवं गृह, जल संसाधन, पंचायत एवं ग्रामीण विकास
- राजस्व, नगरीय विकास और स्कूल शिक्षा
सबसे चौंकाने वाली बात ये है कि कई जगह तो इसलिए नियुक्ति नहीं हो रही थी, क्योंकि पद ही उपलब्ध नहीं थे!
अब क्या बदला है?
अब पदोन्नति होने के कारण हर संवर्ग में पद उपलब्ध हो गए हैं। यानी अब "पद खाली नहीं है" वाला बहाना खत्म!
और इसका सबूत भोपाल में ही मिल गया।
भोपाल में हुआ कमाल - 2 दिन में 954 केस निपटे!
स्कूल शिक्षा विभाग में सबसे ज्यादा प्रकरण लंबित थे। लेकिन आयुक्त अभिषेक सिंह ने सभी संभागीय अधिकारियों को भोपाल बुलाकर सिर्फ 2 दिन में 954 शिक्षक व अन्य कर्मचारियों के प्रकरणों का निराकरण करवा दिया।
सोचिए, जब 2 दिन में 954 हो सकते हैं, तो सालों से 16,000 क्यों अटके थे?
अनुकंपा नियुक्ति होती क्या है?
सरकारी सेवा के दौरान किसी कर्मचारी की मृत्यु होने पर उसके आश्रित को पात्रता के अनुसार नौकरी दी जाती है। इसे ही अनुकंपा नियुक्ति कहते हैं।
इसका मकसद एक ही है - परिवार को भूखा न रहने देना। लेकिन हकीकत ये थी कि नियम तो बन गए, पर फाइलें चलती रहीं और परिवार रोते रहे।
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