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मध्य प्रदेश

जीतू पटवारी की नाकामी का आलम ये है कि अब तक 32 विधानसभा क्षेत्रों में बीएलए नियुक्त नहीं कर पाए जहां किया वो भाग गए

साल 2028 विधानसभा चुनाव में सत्ता की वापसी का दावा कर रही मध्य प्रदेश कांग्रेस की हकीकत जमीन पर शून्य के बराबर है। प्रदेश कार्यालय में प्रेसवार्ता आयो...

• Nov 6, 2026• 3 min read
जीतू पटवारी की नाकामी का आलम ये है कि अब तक 32 विधानसभा क्षेत्रों में बीएलए नियुक्त नहीं कर पाए जहां किया वो भाग गए

📷 Cover Photo: जीतू पटवारी की नाकामी का आलम ये है कि अब तक 32 विधानसभा क्षे

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साल 2028 विधानसभा चुनाव में सत्ता की वापसी का दावा कर रही मध्य प्रदेश कांग्रेस की हकीकत जमीन पर शून्य के बराबर है। प्रदेश कार्यालय में प्रेसवार्ता आयोजित कर वहीं पर सभी अभियान शुरु किए जाते हैं बांकी प्रदेश में उसकी हकीकत कुछ और है। जिसका सबसे बड़ा उदाहरण यही है कि कांग्रेस 32 विधानसभा क्षेत्रों में बीएलए तक बनाने में नाकाम रही है। 12 नवंबर से मतदाता सूची का विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण प्रारंभ होने वाला है। इसमें नए नाम हटाने और संशोधन के लिए आवेदन लिए जाएंगे। इस काम में बूथ लेवल आफिसर (बीएलओ) के बाद सबसे महत्वपूर्ण भूमिका राजनीतिक दलों के बूथ लेवल एजेंट बीएलए की होती है। लेकिन प्रदेश के हर बूथ पर कांग्रेस के बीएलए नहीं हैं। 32 विधानसभा क्षेत्रों में बीएलए की नियुक्तियां होनी हैं। गौरतलब है कि प्रदेश में 230 विधानसभा सीटों में 71,930 बूथ हैं। सभी बूथों को मजबूत करने का दावा करने वाली कांग्रेस पार्टी ने पिछले साल जम कर नियुक्तियां की लेकिन उसके पास कार्यकर्ताओं की कमी का अभाव था जिसके कारण बीएलए की नियुक्तियां नहीं हो पाई। दरअसल कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी का रवैया इस प्रकार का है कि कार्यकर्ता उन पर विश्वास नहीं कर पा रहे हैं। प्रदेश के अलग-अलग जिलों में कांग्रेस के लिए काम कर रहे कार्यकर्ता अब यहां तक सोचने लगे हैं कि वो कांग्रेस में क्यों हैं और हैं तो उनका भविष्य क्या है। क्योंकि जिस प्रकार से मध्य प्रदेश कांग्रेस नेताओं की चुनावी तैयारी दिख रही है वो सिर्फ राजधानी और प्रदेश कार्यालय तक ही सीमित है। कांग्रेस जमीनी स्तर तक भाजपा के खिलाफ कोई भी माहौल खड़ा नहीं कर पाई है जबकि प्रदेश की जनता खुद भाजपा को पसंद नहीं कर रही लेकिन कांग्रेस पर विश्वास करने के लिए जनता के पास कोई एक कारण भी तो होना चाहिए। जीतू पटवारी खुद एक हारे हुए नेता हैं। जो बड़बोले भी हैं। एरोगेंसी उनमें कूट-कूट कर भरी हुई है। वही एरोगेंससी उन्हें आर्ष से फर्ष पर लाने का काम करती है। पटवारी की तुलना में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार जनता के बीच जम कर उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं। खास कर आदिवासी बहुल क्षेत्रों में जिस प्रकार से उमंग सिंघार अपना वर्चस्व बना रहे हैं वो भाजपा के लिए मुसीबत का सबब बनेगा ही साथ ही पटवारी के लिए भी उमंग सिंघार एक बड़ी चुनौती पेस करने वाले हैं।

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