मध्य प्रदेश
OBC वोट की फसल पर लगा 'पाला' सरकार की बोलती 'बंद' विपक्ष हुआ मुखर कोर्ट ने स्वीकारा 'सवर्ण' अभी जिंदा है उसको भी नौकरी का अधिकार
मध्य प्रदेश में सीएम और सरकार भले बदल गए लेकिन इनकी सवर्णों को लेकर चली आ रही कटुता लगातार जारी रही। सरकार के सर्वोच्च स्थान पर पहुंचने वाले नेता शायद...
• Oct 10, 2026• 3 min read

📷 Cover Photo: OBC वोट की फसल पर लगा 'पाला' सरकार की बोलती 'बंद' विपक्ष हुआ
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मध्य प्रदेश में सीएम और सरकार भले बदल गए लेकिन इनकी सवर्णों को लेकर चली आ रही कटुता लगातार जारी रही। सरकार के सर्वोच्च स्थान पर पहुंचने वाले नेता शायद यह भूल जाते हैं कि सवर्ण वर्ग भी इंसान हैं। उन्हें भी जीने और नौकरी करने का अधिकार है। प्रदेश और देश में सिर्फ ओबीसी वर्ग ही नहीं रहता। सवर्ण वर्ग के नाम का भी प्राणी रहता है जो आज भी देश को चलाने और उसकी इकोनॉमी में महत्वपूर्ण योगदान देता है। सरकार शायद यह भूल जाती है कि सियार झुंड में भी आए तब भी शेर का शिकार नहीं कर सकता। कुछ ऐसा ही प्लान सरकार का था कि ओबीसी की पतवार के सहारे सरकार की नैया पार लगाई जाएगी लेकिन न्यायालय की नजर में प्रत्येक प्राणी एक समान होता है और वहां सबको न्याय मिलता है देर भले हो जाए। जिस प्रकार से शुक्रवार को ओबीसी वर्ग की 27 फीसदी आरक्षण की याचिका को हाई कोर्ट ने रद्द किया है उससे सरकार और विपक्ष दोनों के मंसूबे में पानी फिर गया है। पिछले पांच साल से ओबीसी के नाम पर भाजपा और कांग्रेस दोनों दलों ने जम कर राजनीति की। खूब वोट की फसल भी काटी लेकिन उस फसल को कोर्ट के एक फैसले से पाला मार जाएगा इसकी उम्मीद पक्ष और विपक्ष ने नहीं की थी। न्यायालय का फैसला आते ही विपक्ष का बोलना तो बनता है लेकिन सत्ता पक्ष की बोलती ही बंद हो गई। और वो स्वाभाविक भी है क्योंकि सरकार भाजपा की है और कोर्ट में चल रहे मामले को सरकार ही लड़ रही थी। ऐसे समय में ओबीसी आरक्षण की याचिका को रद्द करने का मतलब सरकार को आइना दिखाना है। विपक्ष सरकार पर कोई भी आरोप लगाए लेकिन सत्य तो यही है कि ओबीसी वर्ग से भाजपा को इतना प्यार है कि सवर्णों को एक-एक करके ठिकाने लगाने का सिलसिला शुरु हो गया। सिर्फ नौकरी ही नहीं राजनीति में भी सवर्ण वर्ग के नेताओं को एक-एक करके साइडलाइन किया गया। सवर्ण वर्ग के दर्जन भर नेता घर बैठाए जा चुके हैं। और उतने ही नेताओं को बैठाने का काम चल रहा है। ऐसे में कोर्ट के फैसले ने सरकार के मंसूबों पर पानी फेरते हुए स्पष्ट कर दिया है कि देश संविधान और कानून व्यवस्था से चलता है न कि बंद कमरे में फैसले लेने से चलता है जहां किसी भी नेता को घर बैठाने का हुक्म जारी हो जाता है। दरअसल इस बात का आभास कोर्ट को भी है कि अब सवर्णों के साथ अन्याय हो रहा है जिसे बर्दाश्त नहीं किया जाएगा और आखिर में हुआ भी वही।
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