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मध्य प्रदेश

भाजपा की 'संगठनात्मक' नियुक्तियों में सरकार के हस्तक्षेप से कार्यकर्ताओं में 'असंतोष' प्रदेश अध्यक्ष नहीं सीएम ले रहे संगठन के फैसले

भारतीय जनता पार्टी के संगठनात्मक ढांचे पर पिछले कुछ महीनों से राज्य सरकार ने कब्जा कर लिया है। दरअसल सीएम का अधिकार सरकार पर होता है न कि संगठन पर लेक...

Sep 21, 2026 3 min read
भाजपा की 'संगठनात्मक' नियुक्तियों में सरकार के हस्तक्षेप से कार्यकर्ताओं में 'असंतोष' प्रदेश अध्यक्ष नहीं सीएम ले रहे संगठन के फैसले

📷 Cover Photo: भाजपा की 'संगठनात्मक' नियुक्तियों में सरकार के हस्तक्षेप से

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भारतीय जनता पार्टी के संगठनात्मक ढांचे पर पिछले कुछ महीनों से राज्य सरकार ने कब्जा कर लिया है। दरअसल सीएम का अधिकार सरकार पर होता है न कि संगठन पर लेकिन अब भाजपा की परंपरा में काफी बदलाव देखने को मिलने लगा है। पार्टी को सरल स्वभाव के और एक कुशल संगठक के रुप में प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल मिले लेकिन सरकार ने उनके चारों तरफ ऐसा घेरा बना कर रखा है जहां संगठन से जुड़े सारे फैसले भी सरकार ही ले रही है। हाल ही में हुई कुछ नियुक्तियां इस बात का प्रमाण हैं जहां पर प्रदेश अध्यक्ष की मर्जी से बाहर जाकर सीएम मोहन यादव ने कुछ पदों पर नियुक्तियों को हरी झंडी दी और उनकी औपचारिक घोषणा भी कर दी गई। संगठन में होने वाली प्रत्येक नियुक्तियों और कामों पर नजर रखने के लिए सीएम ने अपने एक विश्वस्त व्यक्ति को महत्वपूर्ण पद पर पहले ही नियुक्त करवा दिया था जिससे संगठन की प्रत्येक जानकारी उनको मिलती रहे। ऐसा भी नहीं है कि प्रदेश अध्यक्ष सीएम के उस व्यक्ति को नहीं जानते लेकिन जानते हुए भी वो उस पदाधिकारी के खिलाफ कोई एक्शन नहीं ले सकते ये उनकी मजबूरी है। भाजपा के इतिहास में पहली बार ऐसा देखने में आया है जब संगठन इतना असहाय नजर आया है। इससे पहले कई नेता सीएम बने और बहुत से प्रदेश अध्यक्ष बदले लेकिन संगठन के काम में 100 फीसदी अधिग्रहण कभी नहीं हुआ। इस सरकार ने संगठन में पूरी तरह से अपनी चलाई है जिसके कारण अब कार्यकर्ताओं में नेतृत्व के प्रति आक्रोश देखने को मिलने लगा है। दस दिन पहले तक सरकार और संगठन में जम कर अस्थिरता का माहौल देखने को मिल रहा था। सीएम के और प्रदेश अध्यक्ष के अलावा कई नेताओं के दिल्ली दौरे हुए। नतीजा यह निकला कि सीएम को और पावरफुल कर दिया गया। इससे यह बात भी स्पष्ट होती है कि केन्द्रीय नेतृत्व को कार्यकर्ताओं के भावना से कोई लेना-देना नहीं है। वो सिर्फ चुनाव जीतना जानते हैं और प्रदेश में बार-बार भाजपा की सरकार बनाना जानते हैं। बांकी संगठन में क्या चल रहा है और कार्यकर्ता पार्टी के बारे में क्या सोच रहे हैं उन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता है। लेकिन सहन सीलता की भी एक हद होती है। जिस दिन कार्यकर्ताओं के सब्र का बांध फूटेगा उस दिन भाजपा नेताओं के सारे गणित खुद फेल हो जाएंगे। कुछ साल पहले इसी प्रकार से कांग्रेस में भी देखने को मिल रहा था जब लगातार सत्ता में रहने के कारण संगठन पर सरकार ने कब्जा कर लिया था और नतीजा यह निकला कि कांग्रेस का संगठनात्मक ढांचा पूरी तरह ध्वस्त हो गया जिसे आज तक कांग्रेस दोबारा मजबूत नहीं कर पाई।

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