मध्य प्रदेश
बिना रियासत के 'राजा' और बगैर हल्के के 'पटवारी' सत्ता की दहलीज पार करने के लिए कर रहे आखिरी प्रयास
मध्य प्रदेश की राजनीति में इन दिनों 'उमस' भरा माहौल देखने को मिल रहा है। कांग्रेस के नेता अचानक अटैकिंग मूड पर आ गए हैं और राज्य सरकार पर लगातार हमला ...
• Oct 9, 2026• 3 min read

📷 Cover Photo: बिना रियासत के 'राजा' और बगैर हल्के के 'पटवारी' सत्ता की दहल
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मध्य प्रदेश की राजनीति में इन दिनों 'उमस' भरा माहौल देखने को मिल रहा है। कांग्रेस के नेता अचानक अटैकिंग मूड पर आ गए हैं और राज्य सरकार पर लगातार हमला कर रहे हैं। मजे की बात यह है कि कांग्रेस में राजा साहब के नाम से मशहूर पूर्व सीएम दिग्विजय सिंह इन दिनों काफी सक्रिय हैं। उम्र के आखिरी पड़ाव पर चल रहे पूर्व सीएम प्रत्येक प्रदर्शन में शामिल हो रहे हैं। गिने-चुने कार्यकर्ताओं के साथ पूर्व सीएम लगातार प्रदर्शन कर रहे हैं और यह मैसेज देने का प्रयास कर रहे हैं कि पिक्चर खत्म नहीं हुई है उसका थोड़ा अंश अब भी बांकी है। पूर्व सीएम तो अयोध्या तक एक पैदल यात्रा भी निकालने जा रहे हैं जो चंदा चोरी मामले को सियासी रुप देने की कोशिश है। ये बात और है कि पूर्व सीएम की यह पद यात्रा अब पार्टी की नहीं बल्कि उनकी व्यक्तिगत हो चुकी है। क्योंकि पार्टी ने इस यात्रा से खुद को अलग कर लिया है उसके बाद भी पूर्व सीएम हार मानने को तैयार नहीं है। इससे पहले साल 2018 में दिग्विजय सिंह ने नर्मदा परिक्रमा की थी और उसके बाद कांग्रेस की सत्ता में वापसी हुई थी। इस बार यह यात्रा कौन सा गुल खिलाएगी यह भविष्य के गर्व में छिपा है। दूसरी तरफ कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी आर-पार के मूड में हैं। लगातार सरकार पर हमले कर यह बताने की कोशिश कर रहे हैं कि कांग्रेस जाग चुकी है। प्रदेश में भ्रष्टाचार का जो साम्राज्य चल रहा है उसको खत्म करने के लिए पटवारी कमर कस चुके हैं। हांलांकि पटवारी की कमर दो-चार दिन के बाद ढीली भी पड़ जाती है। जिस प्रकार से पहली बारिश में पानी के बुलबुले तेजी से निकलते हैं ठीक उसी प्रकार कांग्रेस अध्यक्ष किसी मुद्दे को जोर से उठाते हैं और फिर कोई परिणाम नहीं मिलने पर अचानक शांत हो जाते हैं और फिर एक अगले मुद्दे की तैयारी में जुट जाते हैं। अब सवाल इस बात का उठता है कि बिना रियासत के राजा और बगैर हल्के के पटवारी प्रदर्शन तो करते हैं लेकिन उन प्रदर्शनों का जनता के मन मस्तिष्क पर असर क्यों नहीं पड़ता है। कांग्रेस अध्यक्ष ने दो साल में दर्जन भर से अधिक बड़े मुद्दे उठाए लेकिन प्रदेश की जनता के कानों में जूं तक नहीं रेंगी। मतलब साफ है कि कांग्रेस जनता के दिल में अपना स्थान बनाने में पूरी तरह नाकामान हो रही है। एंटी इंकंमबेंसी की बात तो करते हैं लेकिन दिखती नहीं है। ऐसा भी नहीं कि मोहन सरकार में राम राज है लेकिन कांग्रेस नेताओं द्वारा जनता का दिल नहीं जीत पाने का सीधा मतलब है कि कांग्रेस द्वारा किए जा रहे प्रदर्शनों में निरंतरता की कमी है जिसे प्रदेश की जनता महसूस कर रही है।
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