मध्य प्रदेश
'कोमा' में मोहन सरकार का स्वास्थ अमला मौत के मामले दबाने में एक साथ जुटे सत्ता और संगठन विपक्ष को रोकना जरुरी लेकिन व्यवस्था सुधार पर जोर नहीं
मध्य प्रदेश की स्वास्थ व्यवस्था वेंटिलेटर में जाने के बजाय अब कोमा में पहुंच चुकी है लेकिन स्वास्थ विभाग बेफिक्र होकर तमाशबीन बना हुआ है। डिप्टी सीएम ...
• Oct 1, 2026• 3 min read

📷 Cover Photo: 'कोमा' में मोहन सरकार का स्वास्थ अमला मौत के मामले दबाने में
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मध्य प्रदेश की स्वास्थ व्यवस्था वेंटिलेटर में जाने के बजाय अब कोमा में पहुंच चुकी है लेकिन स्वास्थ विभाग बेफिक्र होकर तमाशबीन बना हुआ है। डिप्टी सीएम राजेन्द्र शुक्ल बैठक तो हमेशा करते हैं लेकिन चाय बिस्कुट के अलावा उन बैठकों में और कुछ नहीं होता है। अगर कुछ होता तो प्रदेश की स्वास्थ व्यवस्था इतनी खराब नहीं हुई होती। एक दो नहीं करीब आधा दर्जन ऐसे मामले हैं जहां स्वास्थ व्यवस्था खराब होने के कारण लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी लेकिन सरकार के कानों तक जूं नहीं रेंगी। स्वास्थ मंत्री के गृह जिले और निर्वाचन क्षेत्र रीवा के अस्पताल में कल्पना मिश्रा की मौत पर सरकार मौन रही। छिंदवाड़ा सिरप कांड हुआ कितने बच्चों की मौत हो गई फिर भी सरकार की आंख नहीं खुली। कुपोषण के चलते बालाघाट में आदिवासी बच्चों की मौत हो गई और स्वास्थ विभाग के अधिकारी एसी कमरों में बैठ कर व्यवस्था सुधारने की दुहाई ही देते रहे। जब बात दूर तलक निकली तो राजेन्द्र शुक्ल प्रेसवार्ता कर मामले में सफाई देने के लिए निकले। अगर सबकुछ ठीक ही चल रहा था तो राजेन्द्र शुक्ल को सफाई देने की जरुरत क्या थी। सवाल इस बात का उठता है कि जब विपक्ष का कोई बड़ा नेता ऐसे मामलों में आता है तो उसकी बात को दबाने के लिए सत्ता से लेकर संगठन अपनी पूरी ताकत लगा देते हैं। अगर समय रहते वही ताकत कुपोषण दूर करने में लगाई गई होती तो शायद बच्चों को अपनी जान नहीं गंवानी पड़ती। इस पूरे मामले में कांग्रेस कम भाजपा ज्यादा चिताओं पर सियासी रोटियां सेंक रही है। भाजपा सरकार इंसानों की जान से ज्यादा खुद की सरकार बचाए रखने पर ध्यान दे रही है। मोहन सरकार को बेपटरी होती स्वस्थ व्यवस्था नहीं दिख रही उसे दिख रहा है तो बस ये कि सरकार को इस कठिन दौर से कैसे बाहर लाना है। दोषी अधिकारियों के खिलाफ तो कार्रवाई हो जाती है लेकिन उस विभाग के मंत्री राजेन्द्र शुक्ल पर सरकार बोलने के लिए तैयार नहीं है। समझ में नहीं आता कि जिस जनता से सरकार बनी है उसी जनता की जान जा रही है और सरकार के नुमाइंदे समस्या का हल निकालने के बजाय उस समस्या पर पर्दा डालने की रणनीति तेयार करने में लगे हैं। मोहन सरकार में सिर्फ स्वास्थ व्यवस्था ही बेपटरी नहीं हुई है। कानून व्यवस्था भी ध्वस्त हो चुकी है। 12 से अधिक विभाग सीएम खुद अपने पास लेकर बैठे हैं लेकिन मंत्रिमंडल का विस्तार नहीं कर रहे। आखिर ऐसा क्यों। क्या सारी मलाई एक ही नेता खाना चाहता है। लंबे समय से मंत्रिमंडल विस्तार की बात हो रही है। मोहन सरकार को तीन साल से अधिक का वक्त बीतने चला लेकिन मंत्रिमंडल विस्तार एक पहेली बन कर रह गया। कुल मिला कर मोहन सरकार में काम के बजाय वो सबकुछ होता है जो नहीं होना चाहिए।
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