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मध्य प्रदेश

सातवें घोड़े पर सवार मोहन सरकार पार्टी के अंदर हो रहे 'डैमेज' को 'कंट्रोल' करने पर नहीं कर रही विचार

जिस प्रकार हाथ से रेत फिसलती है ठीक उसी प्रकार वक्त भी निकलता जाता है और उस पर किसी का जोर नहीं होता। देखते ही देखते मोहन सरकार के तीन साल बीतने चले औ...

• Oct 8, 2026• 3 min read
सातवें घोड़े पर सवार मोहन सरकार पार्टी के अंदर हो रहे 'डैमेज' को 'कंट्रोल' करने पर नहीं कर रही विचार

📷 Cover Photo: सातवें घोड़े पर सवार मोहन सरकार पार्टी के अंदर हो रहे 'डैमेज

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जिस प्रकार हाथ से रेत फिसलती है ठीक उसी प्रकार वक्त भी निकलता जाता है और उस पर किसी का जोर नहीं होता। देखते ही देखते मोहन सरकार के तीन साल बीतने चले और सरकार सातवें घोड़े में सवार सिर्फ 'सेवा के संकल्प' भरोसे चल रही है। पार्टी के अंदर जो डैमेज हुआ उसे कंट्रोल करने के लिए अब तक सरकार और संगठन ने विचार नहीं किया है। क्योंकि बाहर से सब ठीक दिखने की स्थिति में अंदर सब कुछ खोखला हो चुका है और सरकार यह बात स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है। सरकार में काम कर रहा ऐसा कोई भी मंत्री नहीं जो अपनी ही सरकार से खुश हो। किसी भी मंत्री को काम करने की खुली छूट नहीं है। किसी भी मंत्री के पास कार्यकर्ता काम की उम्मीद से जाते हैं तो माननीय यही कहते हैं विभाग मेरे पास जरुर है लेकिन अधिकार सीएम साहब के पास हैं। लिहाजा उनके पास कुछ भी करने का अधिकार नहीं है। यही हाल भाजपा के अन्य विधायकों के हैं जिनके पास सिर्फ कहने के लिए भाजपा की सरकार है लेकिन हालत उनकी 'बेगानों की शादी में अब्दुल्ला दीवाना जैसी ही है'। संगठन की बात करें तो एक सुलझे हुए अध्यक्ष होने के बाद भी प्रदेश अध्यक्ष खुल कर फैसले नहीं ले पाते हैं। उनकी नाराजगी के चलते फ्री-हैंड का लालीपाप पकड़ाया गया था लेकिन वो सिर्फ लालीपाप ही साबित हुआ क्योंकि फैसले अब भी कोई और ही ले रहा है। पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को जिस प्रकार से ठिकाने लगाने और साइड लाइन करने पर काम चल रहा है उस पर कोई रोक नहीं लग रही है। करीब दर्जन भर ऐसे वरिष्ठ नेता हैं जिन्हें घर बैठा दिया गया है। उनके साथ ऐसा सलूक किया जा रहा है जैसे वो किसी दूसरे ग्रह से आए हुए प्राणी हों। ये सब ऐसे नेता हैं जो पार्टी की दिशा और दशा तय करने का काम करते रहे हैं। लेकिन साल 2023 में हुए नेतृत्व परिवर्तन के बाद ऐसी आंधी आई कि सारे वरिष्ठों को उड़ा कर एक किनारे कर दिया गया। जिस प्रकार से बड़े नेताओं की उपेक्षा हुई और हो रही है उसकी गवाह खुद पार्टी के कार्यकर्ता बन रहे हैं लेकिन उनके हाथ में करने के लिए कुछ नहीं है। पार्टी अंदर ही अंदर टुकड़ों-टुकड़ों में बंट रही है जिसे पार्टी के ही नेता स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं। दरअसल साल 2023 के बाद भाजपा में लाखों कार्यकर्ता बाहर से आए। जिसका फायदा पार्टी के अंदर छिपे विभीषणों ने उठाया। कांग्रेस से आए कार्यकर्ता तो अब भी 'रिफ्यूजी' की जिंदगी जी रहे हैं लेकिन उनकी आड़ में पार्टी के विभीषण जम कर मलाई खा रहे हैं। कुछ विभीषणों ने तो अपना साम्राज्य तक खड़ा कर लिया। अब सवाल इस बात का उठता है कि सरकार कब तक विभीषणों की बात पर विश्वास करती रहेगी। संगठन कब तक समय का इंतजार करता रहेगा। जब तक डैमेज को कंट्रोल करने का समय आएगा तब तक समय का पहिया ही मुड़ चुका होगा। सरकार और संगठन को अब इस बात पर विचार और मंथन करना जरुरी है कि पार्टी और सरकार में मौजूद नेताओं को कैसे खुश रखा जाए और माहौल को कैसे दुरुस्त किया जाए।

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