भाजपा के पांच विधायक और एक सासंद ने रोकी भोपाल जिले की कार्यकारिणी संगठन नहीं जुटा पा रहा हिम्मत

Jan 5, 2026 - 08:51
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भाजपा के पांच विधायक और एक सासंद ने रोकी भोपाल जिले की कार्यकारिणी संगठन नहीं जुटा पा रहा हिम्मत

मप्र भाजपा का संगठन मजबूत संगठनों में गिना जाता है लेकिन उसके पीछे की हकीकत कुछ और ही है। Mukhbirmp.com ने पहले भी अपनी खबर में प्रकाशित किया था कि विधायकों और सांसदों ने भाजपा के संगठन को बंधक बना रखा है और उसकी बानगी भी बार-बार देखने को मिलती रही है। मप्र भाजपा की ओर से 95वे फीसदी से अधिक जिलों की कार्यकारिणी घोषित की जा चुकी है लेकिन राजधानी की कार्यकारिणी घोषित करने में भाजपा का संगठन अब तक असमर्थ रहा है। दरअसल भोपाल में भाजपा के पांच विधायक और एक सांसद हैं। सभी ने अपनी-अपनी तरफ से दो-दो नाम कार्यकारिणी में शामिल करने के लिए कहा है। दो मंत्री हैं उन्होंने तीन-तीन नाम दिए हैं। ऐसी स्थिति में 14 नाम विधायक और सांसदों ने ही दे दिए हैं। जिला अध्यक्ष रविन्द्र यति भी अध्यक्ष होने के नाते चाहते हैं कि कार्यकारिणी उनके अंडर में रहेगी लिहाजा उनकी तरफ से भी तीन नाम जोड़े जाएं। ऐसी स्थिति करीब 17 नाम विधायक,सांसद और अध्यक्ष की तरफ से हो चुके हैं। इस बीच प्रदेश संगठन भी कार्यकारिणी में अपनी पैठ बनाए रखने के लिए कुछ लोगों को शामिल करना चाहता है। लेकिन जिस प्रकार से सांसद,विधायक अपनी बात मनवाने के लिए अड़े हैं तो प्रदेश संगठन सूची को अंतिम रुप देने की हिम्मत ही नहीं जुटा पा रहा है। भोपाल में सक्रिय रुप से काम कर रहे भाजपा के कार्यकर्ता चाहते हैं कि जिला कार्यकारिणी में उनका नाम जरुरी है। भाजपा के जिलों की कार्यकारिणी में जिस प्रकार से महिलाओं को शामिल करने की अनिवार्यता हो गई है उससे भी प्रदेश नेतृत्व टेंशन में है। क्योंकि पुरुष दावेदार ही बड़ी संख्या में हैं ऊपर से महिलाओं को जिलों की कार्यकारिणी में शामिल करने के कारण बैलेंस बिगड़ रहा है। भोपाल जिले की कार्यकारिणी को लेकर कई बार प्रदेश नेतृत्व की तरफ से मंथन किया जा चुका है। प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल,संगठन महामंत्री हितानंद शर्मा और जिला अध्यक्ष रविन्द्र यति कई बार बैठकें कर चुके हैं। इतना ही नहीं सभी पांचों विधायकों और सांसद के साथ भी कई दौर की बैठकें हो चुकी हैं लेकिन सारी बैठकें बेनतीजा ही निकली हैं। जिस प्रकार से जिले की कार्यकारिणी को लेकर पेंच फंसा है और प्रदेश नेतृत्व अंतिम फैसला ले पाने में नाकाम साबित हो रहा है उससे यह स्पष्ट है कि विधायकों के दबाव में भाजपा का संगठन काम कर रहा है और उन्हीं की मर्जी से पदाधिकारी नियुक्त किए जा रहे हैं।

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