संघ और बीजेपी मिल कर 'सवर्णों' का टिकट कटवाना चाहते हैं और राजनीति से बाहर करने की रच रहे साज़िश
जिन सवर्णों ने देश को ज्ञान,विज्ञान और हर स्तर की शिक्षा से परिपूर्ण किया आज उन्हीं सवर्णों को संघ और बीजेपी मिल कर समाज की मुख्य धारा से बाहर करने की रणनीति पर काम कर रहे हैं। पहले आरक्षण की बेड़ी डाल कर शासकीय नौकरियों से बाहर किया और अब राजनीति में सवर्णों के बढ़ते प्रभाव को खत्म करने की रणनीति पर काम कर रहे हैं। एक ऐसा कुचक्र चला जा रहा है जिससे सवर्ण में आने वाला प्रत्येक वर्ग घर बैठ जाएं। दरअसल सवर्ण वो वर्ग है जो पूरी तरह से शिक्षित हैं। जहां पर गलत देखते हैं वहां पर वो चुप नहीं रह पाते लेकिन संघ और सवर्ण को ऐसे लोग नहीं चाहिए जो बोलते हों। ओबीसी,दलित और आदिवासी को आगे बढ़ाया जा रहा है अच्छी बात है लेकिन इन नेताओं को आगे बढ़ाने के बाद अहसानों के बोझ तले दबा दिया जाता है और वो किसी भी सार्वजनिक मंच पर सरकार की गलत नीतियों का विरोध नहीं करते हैं। यही कारण है कि संघ और भाजपा ऐसे नेताओं और वर्गों को आगे लेकर आना चाहते हैं जो मूकबधिर बन कर संघ और भाजपा की बात में हां में हां मिलाएं लेकिन उनकी गलत नीतियों का विरोध न करें। वरिष्ठ अधिवक्ता अनिल मिश्रा ने भी अपने बयान में यह स्पष्ट किया है कि संघ और भाजपा मिल कर सवर्ण वर्ग को समाज की मुख्य धारा से बाहर करने की पूरी कोशिश कर रहे हैं। भाजपा में धीरे-धीरे सवर्णों का टिकट काटा जा रहा है जिसकी शुरुआत दतिया उप चुनाव से पूर्व गृह मंत्री डाक्टर नरोत्तम मिश्रा से की गई है। क्योंकि पूर्व गृह मंत्री एक कद्दावर और पढ़ें लिखे नेता हैं। गलत को ग़लत और सही को सही कहने की ताकत रखते हैं इसी लिए उनका ऐन मौके पर टिकट काटा गया और एक ऐसे ब्राम्हण को टिकट दिया गया जो सिर्फ ब्राह्मण है लेकिन उनके जुवान नहीं है। गोपाल भार्गव को घर बैठा दिया गया क्योंकि वो एक सीएम मटेरियल थे। अनूप मिश्रा को घर बैठा दिया गया क्योंकि वो भी तेजी से उभर रहे थे। कई क्षत्रिय नेताओं को भी घर बैठा दिया गया जिनमें बड़ा नाम अरविंद भदौरिया हैं। ऐसे सवर्ण नेताओं को बैठाया गया है जो बोलने में माहिर हैं। पिछले कुछ सालों में संघ और भाजपा ने गुप्त तरीके से अपनी योजनाओं को धरातल में उतारने का काम किया जिसकी भनक सवर्ण वर्ग को लगने ही नहीं पाई।
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