'विंध्य' में 'सत्ता' का दरवाजा खटखटाती प्रतिभाओं को ब्रेकर बना कर रोकने का हो रहा प्रयास
मप्र की जाजनीति में विंध्य के सियासी शेरों का हमेशा दबदबा रहा है। लेकिन पिछले कुछ सालों से विंध्य के शेर खुद ही अपसी शिकार में उलझे हैं जिसके कारण प्रदेश की राजनीति में विंध्य की बादसाहत कम होती जा रही है। विंध्य की बदकिस्मति भी यही है कि जब भी बड़े नेता निकले तो एक ही दल से निकले। पहले पूर्व सीएम अर्जुन सिंह और श्रीनिवास तिवारी जो कांग्रेस पार्टी से ही आते थे और उनकी राजनीतिक प्रतिद्वंदिता से दुनिया वाकिफ है। अब उसी विंध्य से राजेन्द्र शुक्ल और रीति पाठक आते हैं। दोनों नेता भारतीय जनता पार्टी से हैं। राजनीति का नियम है कि जो नेता आगे निकल गया तो दूसरे नेता को अपने आसपास भी फटकने नहीं देता है। कुछ ऐसा ही राजेन्द्र शुक्ल और रीति पाठक के बीच देखने को मिल रहा है। हांलाकि दोनों की उम्र और राजनीतिक सफर में एक बड़ा अंतर है। रीति पाठक सीधी से दो बार सांसद रहीं और 2023 में पहली बार विधायक बनीं। वहीं राजेन्द्र शुक्ल लगातार पांचवी बार विधायक बन कर सरकार में डिप्टी सीएम के पद पर हैं। लिहाजा अभी वो अपनी पारी को और लंबी खीचने के मूड में हैं लेकिन युवा नेत्री रीति पाठक उनके लिए सिरदर्द बनी हुई हैं। रीति पाठक की प्रतिभा और सियासत में लगातार बढ़ता जनाधार राजेन्द्र शुक्ल के लिए एक बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। यही कारण है कि एक पार्टी में रहते हुए भी दोनों नेताओं के बीच एक ऐसी सियासी खाई बन चुकी है जिसे पाटना अब किसी भी नेता के लिए बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। यहां पर एक कहावत भी फिट बैठती है कि दो शेरों की लड़ाई में मजे सियार ही लेते हैं। कुछ ऐसा ही रीति पाठक और राजेन्द्र शुक्ल के बीच चल रहे अंर्तद्वंद के कारण देखने को मिल रहा है। केन्द्र से प्रदेश की राजनीति में भेजी गई रीति पाठक अपने राजनीतिक अस्तित्व के लिए लगातार संघर्ष कर रही हैं। लेकिन उनके संघर्ष फिलहाल बेकार ही जा रहे हैं। यहां तक कि वो क्षेत्र के विकास का प्रयास करती हैं तो उसमें भी कई तरह की अड़चने डाल कर विकास कार्यों को अवरुद्ध करने का प्रयास किया जाता है जिसकी शिकायत वो कई बार खुले मंच से भी कर चुकी हैं और सीएम मोहन यादव के पास जाकर भी कई बार अर्जी लगा चुकी हैं फिर भी उनकी समस्याओं का अब तक हल नहीं निकल पाया है।
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