खंडेलवाल ने पटवारी के 'खसरों' पर बार-बार चलाई कलम और हर बार किया चारों खाने चित्त पर्दे के पीछे से लोकसभा और पर्दे के सामने से राज्यसभा चुनाव में दी सिकस्त
मध्य प्रदेश भाजपा अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल और कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी के बीच शुरु हुई 2024 से सियासी जंग लगातार जारी है। दो साल में भाजपा अध्यक्ष ने कांग्रेस अध्यक्ष को बार-बार चुनाव हराया और हर बार कांग्रेस अध्यक्ष भाजपा अध्यक्ष की रणनीतिक कौशल को समझने में नाकाम रहे। दोनों नेताओं के बीच यह जंग उस वक्त शुरु हुई थी जब हेमंत खंडेलवाल लोकसभा चुनाव प्रबंधन समिति के संयोजक बनाए गए थे। उनसे पहले जीतू पटवारी कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष बन चुके थे। हेमंत खंडेलवाल तब तक सिर्फ विधायक थे और उनके रणनीतिक कौशल को देखते हुए भाजपा ने लोकसभा चुनाव प्रबंधन समिति का संयोजक बनाया था। जीतू पटवारी ने लोकसभा चुनाव में जमकर मेहनत की और मीडिया के सामने कहते रहे कि कम से कम दस सीट कांग्रेस जीत कर आयेगी। उधर हेमंत खंडेलवाल बगैर शोर शराबे के अपनी योजनाओं को अमली जामा पहनाते रहे। अंत में नतीजे आए तो भाजपा ने पहली बार क्लीन स्वीप कर दिया और जीतू पटवारी के खाते में शगुन की एक सीट तक नहीं बची। उसके बाद हेमंत खंडेलवाल बीजेपी के अध्यक्ष बने और जो लड़ाई पर्दे के पीछे से लड़ रहे थे वहीं लड़ाई वो पर्दे के सामने से लड़ने लगे। हेमंत के हाथों इतनी करारी हार के बाद भी जीतू पटवारी उन्हें समझ नहीं पाए और हल्के में ही लेते रहे। अब बारी आई राज्यसभा चुनाव की तो सहज और सरल दिखने वाले हेमंत खंडेलवाल ने ऐसी चाल चली की सभी तीनों सीट भाजपा निर्विरोध जीत गई और पटवारी को जब तक पता चला तब तक कांग्रेस के हाथ सिर्फ 'ठनठन गोपाल लगे' कुल मिला कर जीतू पटवारी और हेमंत खंडेलवाल के बीच रणनीतिक कौशल की लड़ाई पिछले ढाई साल से चल रही है। और बार-बार जीतू पटवारी के हिस्से में हार ही लग रही है। इतना सबकुछ होने के बाद कांग्रेस अध्यक्ष सीख लेने के बजाय अपनी प्रतिष्ठा बचाने के लिए अलग-अलग तरह के हथकंडे अपना रहे हैं जो किसी काम नहीं आ रहे। जीतू पटवारी को चाहिए कि पहले वो विपक्ष की रणनीति को समझें फिर उसके खिलाफ अपनी रणनीति को धरातल में उतारें लेकिन उनका एटीट्यूट आड़े आ जाता है और उसी में सारा खेल बिगड़ जाता है।
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