विधायकों ने संगठन को बना रखा है 'बंधक' बगैर उनकी अनुमति नहीं होती स्थानीय संगठनों में नियुक्तियां
भारतीय जनता पार्टी एक कैडर बेस पार्टी मानी जाती है। जिसमें संगठन को सर्वोपरि माना जाता है। कार्यकर्ताओं को देव तुल्य कहा जाता है। लेकिन हकीकत उससे कोसों दूर है। दरअसल संगठन को सर्वोपरि कहने वाली भाजपा में विधायक और सांसद सर्वोपरि होते हैं और कार्यकर्ताओं को उनके इर्द-गिर्द घूमना पड़ता है जिला स्तर पर सही तरीके से कहा जाए तो सांसद और विधायकों ने संगठन को 'बंधक' बना रखा है। जिसके चलते कार्यकर्ताओं को उन्हीं सांसद विधायकों की थी हुजूरी करनी पड़ती है तभी जाकर वो स्थानीय संगठनों में अपना स्थान पक्का कर पाते हैं। दरअसल भाजपा के मंडल अध्यक्षों की नियुक्ति में यही मामला प्रदेश के हर जिले में देखने को मिला है। कार्यकर्ताओं का कहना है कि वो जिन भाजपा नेताओं को जिताने के लिए अपना सर्वश्व न्यौछावर कर देते हैं वही नेता विधायक और सांसद बनने के बाद उनकी किस्मत लिखने का काम करने लगते हैं। क्योंकि भाजपा में चुनाव प्रक्रिया सिर्फ एक 'जुमला' है यहां सारे फैसले नेता बैठे कर आपस में करते हैं। जिसमें विधायकों और सांसदों की आपसी सहमति से होते हैं। जबकि प्रदेश कार्यालय में दर्शाया ये जाता है कि पहले संगठन फिर सरकार और प्रतिनिधि लेकिन होता इसके ठीक विपरीत है। इस मामले में भाजपा और कांग्रेस की कार्यप्रणाली में कोई खास अंतर नहीं है। जब स्थानीय संगठनों में पदाधिकारियों की नियुक्ति की बात आती है तो विधायकों और सांसदों की राय लेकर उन्हीं के करीबी लोगों को संगठन में चुन कर बैठा दिया जाता है। कांग्रेस के लोग तो विरोध भी कर लेते हैं लेकिन भाजपा में विरोध की परंपरा नहीं है लिहाजा सांसद-विधायक जिस नाम की सिफारिस कर देते हैं कार्यकर्ता उसी को अपनी किस्मत मान कर स्वीकार कर लेते हैं। पिछले कुछ महीनों में भाजपा ने जिस प्रकार से नियुक्तियां की हैं वो पार्टी के कार्यकर्ताओं के गले ही नहीं उतरी। जो नेता सक्रिय नहीं थे उन्हें पद देकर सम्मानित किया गया जो नेता लगातार सक्रिय थे वो सिर्फ मुंह ही ताड़ते रह गए। हाल ही में भाजपा युवा मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष की नियुक्ति हुई जो किसी भी कार्यकर्ता को आश्चर्य में डालने वाली थी। गुरुवार को भाजपा युवा मोर्चा के अध्यक्ष श्याम टेलर ने प्रभार ले लिया लेकिन कार्यकर्ता तब तक हैरान और परेशान ही रहे कि आखिर इसको कैसे प्रदेश अध्यक्ष बना दिया गया। यह नियुक्ति तो प्रदेश स्तर पर हुई। जिलों में ऐसी सैकड़ों नियुक्तियां हुई हैं जो सिर्फ सिफारिश के बल पर हुई और मूल कार्यकर्ता पार्टी के कैडर की ही बात करते रहे। अब जो असली कार्यकर्ता हैं जो जमीन पर उतर कर कार्य करते हैं उनके मन में भी यही बात घर करने लगी है कि अंत में नियुक्तियां तो सांसद और विधायकों के कहने पर ही होनी हैं।
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