'ब्राह्मण नेतृत्व' खत्म करने की साजिश डॉ नरोत्तम मिश्रा का टिकट काटते ही दतिया में भूचाल
दतिया विधानसभा उपचुनाव में भाजपा द्वारा डॉ. नरोत्तम मिश्रा का टिकट काटकर आशुतोष तिवारी को प्रत्याशी बनाए जाने के बाद प्रदेश की राजनीति गर्मा गई है। टिकट कटते ही दतिया में विरोध की ऐसी सुनामी आई कि जिला संगठन से लेकर 251 बूथ समितियों तक ने इस्तीफे दे दिए।
लेकिन अब सवाल सिर्फ टिकट का नहीं है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि क्या भाजपा ने जानबूझकर 'ब्राह्मण नेतृत्व' को खत्म करने के लिए नरोत्तम मिश्रा को साइडलाइन किया है?
संकटमोचक से साइडलाइन तक का सफर
नरोत्तम मिश्रा को भाजपा में "संकटमोचक" और "आधुनिक चाणक्य" कहा जाता रहा है। साल 2008 में परिसीमन के बाद डबरा से दतिया भेजे गए मिश्रा ने यहां लगातार 3 चुनाव जीते और जनता का भरोसा जीता।
लेकिन इस बार नामांकन से 2 दिन पहले उनका टिकट काट दिया गया। पार्टी ने एक ऐसे चेहरे को मैदान में उतारा जिसे दतिया की जनता जानती तक नहीं है।
ब्राह्मण कार्ड या ब्राह्मण विरोध?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि नरोत्तम मिश्रा के मैदान में रहने से कांग्रेस को सहानुभूति का लाभ मिलता और सीट निकल जाती। लेकिन अंदर की बात कुछ और बताई जा रही है।
सूत्रों के अनुसार नरोत्तम मिश्रा प्रदेश के एकमात्र ऐसे भाजपा नेता हैं जिन्हें हर जिले का ब्राह्मण समाज अपना नेता मानता है। हर जिले से ब्राह्मण उनसे मिलने उनके निवास आते हैं। भाजपा नेतृत्व को डर है कि अगर मिश्रा विधायक रह गए तो प्रदेश का पावर हाउस उनकी तरफ शिफ्ट हो जाएगा।
इसीलिए एक नए, "पावर विहीन" चेहरे को लाकर ब्राह्मणों की ताकत को खत्म करने की साजिश रची गई है। प्रदेश का ब्राह्मण समाज इस कुचक्र को समझ रहा है, इसलिए आज पूरा ब्राह्मण समाज डॉ. नरोत्तम मिश्रा के साथ खड़ा है।
दतिया में आक्रोश
टिकट कटने के बाद दतिया में हजारों कार्यकर्ताओं ने हाईवे जाम किया, जिला कार्यालय पर रात भर धरना दिया। पुलिस ने लाठीचार्ज और आंसू गैस भी चलाई। कार्यकर्ताओं का कहना है कि जिस नेता ने अपना खून-पसीना पार्टी को दिया, उसी की पीठ में छुरा घोंपा गया।
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