विधायकों के 'चंगुल' में भाजपा के मंडल अध्यक्ष निधि संचय अभियान में मंडल अध्यक्षों के हाथ रहते हैं खाली जिला और प्रदेश इकाई होती हैं मालामाल
मध्य प्रदेश भाजपा की संगठनात्मक गतिविधियों को आर्थिक रुप से संचालित करने के लिए प्रति वर्ष निधि संचय अभियान का आयोजन किया जाता है। सभी जिलों को प्रदेश नेतृत्व की तरफ से निधि संचय का टारगेट भी दिया जाता है। और फिर जिलों की तरफ से मंडल इकाइयों पर निधि संचय का दबाव बनाया जाता है। जिससे प्रदेश नेतृत्व द्वारा दिए गए टारगेट को पूरा किया जा सके। लेकिन इस पूरे मामले में चौंकाने वाली ये है कि निधि संचय अभियान में कोई भी जिला जितना निधि संचय करता है उसका आधा हिस्सा प्रदेश नेतृत्व के हिस्से में आता है और आधा हिस्सा जिला अध्यक्ष यानि जिला बाडी के हिस्से में आता है। और मूल रुप से निधि संचय अभियान में जो महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं यानि मंडल अध्यक्ष और मंडल की कार्यकारिणी में काम करने वाले जो कार्यकर्ता मेहनत करते हैं उनके हाथ खाली ही रहते हैं। ऐसी स्थिति में मंडलों को विधायकों के आश्रित रहना पड़ता है क्योंकि उनके पास पार्टी की तरफ से कोई कार्यक्रम संचालित करने के लिए पार्टी व्यक्तिगत फंड नहीं देती है। जबकि भाजपा का मूल कैडर मंडल और बूथ ही माने जाते हैं और उन्ही के बल पर भाजपा चुनाव जीतने का दावा भी करती है। लेकिन उसी मंडल के अध्यक्ष और अन्य पदाधिकारी किस आर्थिक संकट से गुजरते हैं उसकी परवाह प्रदेश नेतृत्व नहीं करता है। यही कारण हैं कि मंडल अध्यक्षों को स्थानीय विधायक अपने हाथ की कथपुतली समझते हैं। भाजपा में हर कार्यकर्ता को अपनी बात रखने का अधिकार है लेकिन कभी कोई मंडल अध्यक्ष प्रदेश नेतृत्व के सामने ये नहीं कह पाया कि मंडल निधि संचय अभियान से लेकर चुनावी गतिविधियों को संचालित करने में महत्वपूर्ण योगदान देता है लेकिन वो आर्थिक रुप से कमजोर है और पदाधिकारियों को अपनी जेब से पैसे खर्च करने पड़ते हैं। पार्टी के इसी रवैए के चलते इस बार निधि संचय अभियान में पार्टी के कार्यकर्ता दिलचस्पी नहीं ले रहे हैं। प्रदेश नेतृत्व की तरफ से जिलों को जो टारगेट दिया गया था वो टारगेट अभी तक पूरा नहीं हुआ इसी लिए पार्टी निधि संचय अभियान की तारीखें को लगातार बढ़ाती जा रही हैं। भाजपा के मंडल अध्यक्षों को अगर विधायकों के चंगुल से आजाद कराना है तो उन्हें भी आर्थिक रुप से सशक्त बनाना होगा अन्यथा पार्टी की तरफ से किए जा रहे भेदभाव के कारण कार्यकर्ता धीरे-धीरे संगठनात्मक गतिविधियों से खुद को दूर रखने लगे हैं।
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