भाजपा के देवतुल्य कार्यकर्ता सिर्फ 'दरी और टाट' बिछाने तक सीमित 'जी भाई' साहब वाले कार्यकर्ता पदों की 'रेवड़ी' में आगे
कैडरबेस पार्टी कहलाने वाली जिस भारतीय जनता पार्टी में कार्यकर्ता को सर्वोपरि और देवतुल्य की संज्ञा दी जाती है वही देवतुल्य कार्यकर्ता आज अपने भविष्य को लेकर पार्टी में चिंतित हैं। जिस प्रकार से पार्टी में कार्यकारिणी का विस्तार हुआ उसके बाद कार्यकर्ताओं के मन में पार्टी के प्रति संदेह जन्म लेने लगा है और अब दवी जुवां कार्यकर्ता ही कहने लगे हैं कि अब भाजपा वो पार्टी नहीं रही जहां पर कार्यकर्ता सर्वोपरि हुआ करते थे। क्योंकि पहले पार्टी में कार्यकर्ताओं के काम को देख कर पद दिया जाता था लेकिन पिछले कुछ सालों में भाजपा में 'जी भाई' साहब का कल्चर बढ़ने से मेहनती कार्यकर्ताओं को अनदेखा करके जी भाई साहब कहने वाले कार्यकर्ताओं को आगे बढ़ाने का कल्चर हावी होने लगा है। प्रदेश के अलग-अलग जिलों से आने वाले कार्यकर्ता प्रदेश कार्यालय आते हैं तो मायूसी लेकर ही अपने घर लौटते हैं। मायूस कार्यकर्ताओं का एक ही जवाब होता है कि उनके पास कोई बड़ा नेता नहीं है अथवा वो किसी गुट में शामिल नहीं हैं इसलिए उनकी कहीं गिनती ही नहीं है वो सिर्फ दरी और टाटा पट्टी बिछाने के लिए ही याद किए जाते हैं। जिस कार्यकर्ता के नाम को कोई बड़ा नेता प्रस्तावित करता है तो उसे पद मिल जाता है और जिस कार्यकर्ता की पहचान बड़े नेताओं से नहीं है वो कार्यकर्ता गुटबाजी का शिकार होकर घर बैठ जाते हैं। उसके बाद भी भाजपा के कार्यकर्ता वास्तव में देवतुल्य हैं। क्योंकि साढ़े चार साल तक तो वो घर पर बैठे रहेंगे लेकिन जैसे ही चुनाव आएगा वो सभी कार्यकर्ता अपने घर का हर कार्य छोड़ कर अपनी पार्टी के प्रतिनिधि को जिताने के लिए रात दिन एक कर देंगे। और जैसे ही भारतीय जनता पार्टी चुनाव में जीत जाएगी वो कार्यकर्ता घर बैठ जाएंगे और उनकी जगह जी भाई साहब वाले कार्यकर्ता सक्रिय भूमिका में आ जाएंगे उन्हीं को पार्टी पद देकर पुरस्कृत भी करेगी। लेकिन सवाल इस बात का उठता है कि कार्यकर्ता कब तक साइलेंट मूड में देवतुल्य की भूमिका निभाते रहेंगे आखिर एक दिन उनके धैर्य का बांध भी फूटेगा और जिस दिन कार्यकर्ताओं के धैर्य का बांध फूटेगा उस दिन सियासी सैलाब आएगा और उसे रोक पाना भाजपा के चाणक्यों के लिए मुस्किल होगा। क्योंकि चाणक्य तभी तक हैं जब तक पार्टी जीत की राह पर है जिस दिन पार्टी हारने लगती है उस दिन वही चाणक्य दिग्विजय सिंह और कमलनाथ दिखने लगते हैं।
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