लाख कोशिशों के बाद भी नाकाम साबित हो रहे कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी वरिष्ठों को एक मंच पर लाने में अब तक रहे नाकाम
साल 2023 विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की करारी हार के बाद केन्द्रीय नेतृत्व ने युवा चेहरा जीतू पटवारी पर विश्वास दिखाया। अध्यक्ष बनते ही कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष ने एक के बाद एक लगातार बदलाव किए। 2025 में संगठन सृजन अभियान भी चलाया गया। सभी जिलों को नया अध्यक्ष दिया गया और उसके बाद संगठन को जमीनी स्तर पर उतारने के लिए भी कई तरह के प्रयास हुए। इतना सबकुछ होने के बाद भी अब तक कांग्रेस भाजपा से कोसों दूर है। 2028 की तैयारी में जुटी कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती ब्लाक और बूथ स्तर तक पार्टी को खड़ा करना है जिसकी कागजी तौर पर तैयारी चल रही है लेकिन जमीनी तौर पर हकीकत अलग है। कांग्रेस अध्यक्ष के आगे बढ़ी चुनौती के रुप में उन्हीं के सीनियर नेता हैं। जो उनके लिए रोड़ा बन कर खड़े हैं। कांग्रेस सरकार बनाने में लगातार नाकाम हो रही है लेकिन उसके सीनियर नेताओं का स्वाभिमान पार्टी के लगातार आड़े आ रहा है। और वही स्वाभिमान कांग्रेस अध्यक्ष के लिए समस्या बन रहा है। अलग-अलग अंचलों में कांग्रेस को भाजपा नहीं अपने ही नेताओं से लड़ाई लड़नी है जिसमें दिग्विजय सिंह,अजय सिंह (राहुल) भैया,कमलनाथ,अरुण यादव,उमंग सिंघार,कांतीलाल भूरिया सहित कई ऐसे नेता हैं जो भाजपा से ज्यादा कांग्रेस के लिए घातक साबित हो रहे हैं। मतलब साफ है कि कांग्रेस अध्यक्ष को सबसे पहले अपने घर को साफ करना होगा तभी वो बाहरी दुष्मनों से लड़ाई कर पाएंगें। लेकिन ऐसा होता नहीं दिख रहा है। क्योंकि कांग्रेस की पहचान ही यही नेता हैं। कांग्रेस एक ऐसा दल है जो पार्टी के नाम से नहीं छत्रपों के दम पर चलने वाला दल है। लिहाजा मिशन 28 को फतह करना है तो कांग्रेस अध्यक्ष को सबसे पहले वरिष्ठ नेताओं को एक मंच पर लाना होगा और उन्हें इस बात के लिए राजी करना होगा कि पहले अपनी सरकार बनवा लो बाद में तय होगा कि सीएम किसको बनना है। फिलहाल तो कांग्रेस के आगे यही बड़ी परीक्षा है कि राज्यसभा की एक सीट उसके खाते से खाली हो रही है जिसमें अगला नेता कौन होगा यह भी कांग्रेस के लिए बड़ी चुनौती बना हुआ है।
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