सरकार संगठन और संघ मिल कर भी एमपी में निगम मंडल की नहीं सुलझा पाए गुत्थी 'बीरबल की खिचड़ी' बन कर रह गई नियुक्ति
मप्र में बहुचर्चित निगम-मंडलों की नियुक्ति चर्चा का केन्द्र बन कर रह गई है। कार्यकर्ताओं के धैर्य का बांध फूट रहा है और वरिष्ठ नेता मामले को टालने की कोशिश में जुटे हैं। जिस प्रकार से दिन बीत रहे हैं कार्यकर्ताओं के दिलों की धड़कनें बढ़ती जा रही हैं। निगम- मंडल की नियुक्ति एक ऐसा सवाल बन चुकी है जैसे फिल्म बाहुबली में कटप्पा ने बाहुबली को क्यों मारा जैसा एक सवाल बन कर रहा गया था। लेकिन उस सवाल का जवाब तो एक साल में ही मिल गया था। पर निगम-मंडल की नियुक्ति का जवाब मोहन सरकार दो साल बीतने के बाद भी नहीं दे पाई है।भोपाल में जैसे ही किसी बड़े नेता की आवक होती है पार्टी के कार्यकर्ता उन दौरों का कनेक्शन निगम-मंडल से जोड़ने लगते हैं। हांलाकि पूर्व के इतिहास में जाएं तो भाजपा की तत्कालीन सरकारों में भी आधी पंचवर्षीय बीतने के बाद ही निगम-मंडलों की नियुक्ति होती रही है। लिहाजा अब वो समय आने वाला है जब इन नियुक्तियों को लेकर अब बड़ा फैसला होगा। और जल्द फैसला नहीं हुआ तो फिर पार्टी में कुछ बड़ा होने वाला है। इस बात में भी कोई सक नहीं कि पिछले दो महीने से निगम-मंडलों की नियुक्ति को लेकर सरकार,संघ और संगठन कई बार बैठक कर चुके हैं लेकिन इनके बीच अब तक अंतिम राय नहीं बन पाई। पहली बार ही यह भी देखने को मिल रहा है कि एमपी में सरकार और संगठन दोनों को कोई तीसरा ही चला रहा है जिसके चलते चौंकाने वाले फैसले ही भाजपा कर्यकर्ताओं का नसीब बन कर रह गया है।
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