भाजपा नेताओं में 'फ्रस्ट्रेशन' दबाए रखने के लिए भइया जी 'स्माइल' की जंचती है लाइन मुखबिर पर पढ़िए पूरी खबर
भारतीय जनता पार्टी के विधायकों की जुवान बेलगाम हो रही है उसके पीछे मानसिक तनाव और फ्रस्ट्रेशन भी एक बड़ा कारण साबित हो रहा है। दरअसल साल 2023 का विधानसभा चुनाव जीतने के बाद भाजपा विधायकों ने बहुत कुछ सोच रखा था। लेकिन जब वो विधायक बने तो उनके सपने चूर-चूर होने लगे। पार्टी के विधायक ही नहीं बल्कि मंत्रियों के पास भी इतना अधिकार नहीं कि वो एक चपरासी तक का तबादला कर पाएं। जिस भाजपा में नेताओं को अनुशासन का पाठ पढ़ाया जाता है उसी भाजपा में नेता पब्लिक डोमिन पर कुछ भी बोल रहे हैं। दरअसल सीएम हो मंत्री हो अथवा विधायक हर व्यक्ति मेहनत करके ही चुनाव जीत कर आता है। उसके कुछ खुद के लिए सपने होते हैं और कुछ स्थानीय जनता और क्षेत्र के लिए सपने होते हैं। उन सपनों को पूरा करने के लिए जब जन प्रतिनिधि कोशिश करते हैं तो सरकार स्तर पर ही उनकी सुनवाई नहीं होती। बड़े अरमानों के साथ जन प्रतिनिधि तो बन गए लेकिन उनके हाथ सिर्फ जन प्रतिनिधि का झुनझुना ही लगा। क्योंकि कोई भी जन प्रतिनिधि अपने क्षेत्र में कुछ नहीं कर पा रहा है। पूरी सरकार और प्रशासन एक ही व्यक्ति के हाथ में 'बंधक' बन कर रह गया है। चेहरे पर मुस्कान और जुवान पर ताला लगा दिया गया है। कोई भी नेता खुल कर अपने दिल की बात भी नहीं कर पाता है। ऐसी स्थिति में कभी-कभार कहीं का ग़ुस्सा कहीं निकल जाता है और मामला संगीन हो जाता है। कैलाश विजयवर्गीय जैसे संतुलित बोलने वाले नेताओं की जुवान से जब घंटा शब्द निकला तो यह बात स्पष्ट होती है कि टंप्रेचर ज्यादा बढ़ गया है। उनके अलावा प्रहलाद पटेल की जुवान से भीख मांगना जैसा शब्द निकलता है। उज्जैन के ही विधायक के बागी स्वर निकलते हैं। साल भर में करीब एक दर्जन विधायकों की जुवान से ऐसे शब्द निकले जो नहीं निकलने चाहिए थे। हाल ही में प्रीतम लोधी की जुवान फिसली उनके पहले सागर के एक विधायक की जुवान बिगड़ी। भाजपा को अपने नेताओं के तनाव पर विचार करना होगा। जिस प्रकार से जन प्रतिनिधियों के अधिकार पर अंकुश लगाया गया है वो भाजपा के भविष्य पर ग्रहण लगाने के लिए पर्याप्त है।
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