बीजेपी के राज में पहले ब्राह्मण उपेक्षा का शिकार थे अब गोलियों का शिकार हैं सारे कथावाचक भी मौन हैं सिर्फ अपनी दुकान संचालित कर रहे
जिस बीजेपी की नींव ब्राह्मणों ने रखी उसी बीजेपी के राज में आज ब्राह्मण गोलियों का शिकार हो रहे हैं। अटल युग का समापन होने के बाद मोदी युग आते ही भाजपा की तस्वीर ऐसे बदली कि सबसे पहले ब्राह्मण,क्षत्रियों को संगठन के प्रमुख पदों से धीरे-धीरे करके बाहर का रास्ता दिखाया गया उसके बाद सरकार के प्रमुख पदों से हटाया गया और ऐसे ब्राह्मणों को सरकार में खानापूर्ति के लिए रखा गया जो सिर्फ जन्म से ब्राह्मण हैं बांकी उनके कर्म ब्राह्मणों से अलग हैं। बिहार में हुई भरत तिवारी के कथित एनकाउंटर पर एक भी ब्राह्मण नेता की जुवान नहीं खुली। यहां तक कि एक भी कथावाचक ने अब तक कुछ भी नहीं बोला। जितने भी कथावाचक हैं वो सिर्फ अपनी दुकान संचालित कर रहे हैं। कथावाचक ये मान कर बैठे हैं कि अगर उन्होने अपनी जुवान खोली तो उनकी दुकानें बंद हो जाएंगी। लिहाजा ये सभी धर्म के ठेकेदार सिर्फ मंच तक सीमित होकर रह गए हैं। जिस विकास तिवारी ने जनता की आवाज बनने की कोशिश की उसको निहत्था पाकर पुलिस ने तावड़ तोड़ गोलियां चलाई और बेरहमी के साथ उसकी हत्या कर दी गई। बागेश्वरधाम वाले धीरेन्द्र कृष्ण शास्त्री कहां हैं। उनके धाम में आने के लिए भरत तिवारी ने बिहार से छतरपुर तक पैदल यात्रा की थी और हिंदू राष्ट्र की कामना लेकर बालाजी धाम पहुंचा था। शिवकथा वाचक प्रदीप मिश्रा की जुवान पर ताला लगा है। देवकीनंदन ठाकुर क्यों चुप बैठे हैं। अनेकों ऐसे कथावाचक हैं जो जनता के बीच में कथा के माध्यम से भगवान की तरह पूजे जाते हैं। आज ये जो कुछ भी हैं सिर्फ ब्राह्मण कुल में जन्म लेने के कारण ही हैं। लेकिन जिस समाज में जन्म लेने के बाद आज उन्हें इतनी प्रतिष्ठा और सम्मान मिल रहा है वो अपने समाज की सोचने के बजाय सिर्फ बनिया बन चुके हैं। अंतर सिर्फ इतना है कि बनिया एक घर में बैठ कर दुकान चलाता है और ये कथावाचक मंच पर बैठ कर अपनी दुकान संचालित कर रहे हैं और करोड़ों रुपये छाप रहे हैं। ऐसे ब्राह्मण कथावाचकों और नेताओं की आंख कब खुलेगी।
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