ग्वालियर-चंबल में चल रही अलग सरकार सारे फैसले 'ऑन स्पॉट' भाजपा का कोई सासंद नहीं कर पा रहा मुकाबला
मध्य प्रदेश की राजनीति में ग्वालियर- चंबल क्षेत्र का एक अलग ही स्थान रहा है। यहां से आए नेता अक्सर मध्य प्रदेश की राजनीति को संचालित करते रहे हैं। लेकिन पिछले कुछ सालों से यहां की राजनीति में एक ऐसा नाम सामने आया जिसने राजघराने की परंपराओं से अलग होकर जिस प्रकार से जनता के घर तक जाने का रास्ता तैयार किया वो अपने आप में एक अलग सियासी परिभाषा ही गढ़ता जा रहा है। वो नेता और कोई नहीं केन्द्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया हैं। जिन्होंने अपने राजनीतिक तौर तरीके में ऐसा बदलाव किया है जिसका मुकाबला कोई नहीं कर पा रहा है। क्षेत्र के हर विकास कार्यों के लिए सिंधिया आए दिन स्थानीय अधिकारियों के साथ बैठक करते हुए पाए जाते हैं। इतना ही नहीं क्षेत्र में खुशी का मौका हो अथवा गम का मौका सभी जगहों पर ज्योतिरादित्य सिंधिया तत्काल पहुंचते हैं और पीड़ित परिवारों के हर काम में शामिल होकर यह अहसास कराते हैं कि वो उनके साथ हैं। जिस प्रकार से ज्योतिरादित्य सिंधिया ने अपना राजनीतिक गेयर बदला है वो भाजपा नेताओं के गले नहीं उतर रहा है। दरअसल ज्योतिरादित्य सिंधिया ने किसी की लाइन छोटी करने के बजाय खुद की लाइन बड़ी करने की योजना तैयार की। और उसी के तहत उन्होंने जनता के बीच बने रहने और उनके सुख-दुख में शामिल होने की योजना को अपनी दिनचर्या में शामिल कर लिया। सिंधिया की जनता के बीच मजबूत होती पकड़ जहां स्थानीय नेताओं के लिए गले की फांस बनता जा रहा है वहीं भाजपा के अन्य सांसदों को सिंधिया आइना भी दिखाते नजर आ रहे हैं। क्योंकि जिस प्रकार से सांसद और मंत्री होने के बाद ज्योतिरादित्य सिंधिया जनता के बीच पहुंच रहे हैं उस प्रकार से भाजपा के किसी भी सांसद का जनता से जुड़ाव नहीं है। चुनाव जीतने के बाद भाजपा के सांसद कितनी बार अपने क्षेत्र के भ्रमण में निकले इसकी जानकारी कोई सांसद नहीं दे पा रहा है। मोदी के नाम पर बगैर मेहनत के चुनाव जीतने वाले भाजपा के सांसद यह मान कर बैठे हैं कि जब तक मोदी हैं तब तक उनकी जीत मुमकिन है। सिंधिया को छोड़कर भाजपा का कोई भी नेता जनता के बीच नहीं जा रहा है। चिलचिलाती धूप में सिंधिया जनता के बीच जाकर अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं तो दूसरी तरफ भाजपा के अन्य सांसद एसी का मजा लेते हुए घर पर आराम फरमा रहे हैं। भाजपा के सांसदों की जिस प्रकार की कार्यप्रणाली है ऐसी स्थिति में मोदी का नाम हटा लिया जाए तो सिंधिया को छोड़ कर एक भी सांसद खुल के बूते चुनाव जीतने की क्षमता नहीं रखता है। प्रदेश की अधिकतर लोकसभा सीटें राम भरोसे संचालित हो रही हैं। जन प्रतिनिधि चुनाव जीतने के बाद नदारत हो चुके हैं। सिर्फ कागजों में जनप्रतिनिधि दिखाई पड़ते हैं।
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