नरोत्तम मिश्रा सरकार में होते तो क्या 'घंटे' की गूंज दिल्ली तक सुनाई देती
मप्र की भाजपा सरकार में मझे हुए नेताओं की एक लंबी लिस्ट हुआ करती थी। बड़े से बड़े मामले आने पर मामलों को सुलझा लिया जाता था और कोई भी मामला लंबे समय तक नहीं खिंच पाता था लेकिन मोहन कैबिनेट में ऐसे नेताओं का अकाल है। खास कर जो नेता सरकार के पक्ष में कवच बन कर खड़े होते थे उनमें कैलाश विजयवर्गीय और पूर्व गृह मंत्री डाक्टर नरोत्तम मिश्रा हुआ करते थे। इन नेताओं की ऐसी जुगलबंदी हुआ करती थी कि विपक्षियों के सारे मंसूबे इनके सामने ध्वस्त हो जाया करते थे। डाक्टर नरोत्तम मिश्रा को इसी लिए संकट मोचक की संज्ञा दी जाती थी। आमतौर पर पूर्व सीएम शिवराज सिंह चौहान का उनको सबसे बड़ा प्रतिद्वंदी माना जाता था लेकिन जब भी सरकार पर संकट होता था तो अंगद की तरह अपने पांव जमा कर डाक्टर नरोत्तम मिश्रा सबसे आगे खड़े मिला करते थे। और सरकार को किसी भी विषम परिस्थिति से बाहर निकाल कर लाते थे। उनकी खूबी यह हुआ करती थी कि मीडिया कर्मियों से उनका दोस्ताना व्योहार और किसी भी बात को सरलता के साथ अपने अंदाज में रखने का उनका इतना जबरदस्त तरीका किसी के गुस्से को ठंडा करने के लिए पर्याप्त हुआ करता था कोई व्यक्ति गुस्से में भी आए तो वो शांत हो जाता है। मीडिया से लेकर हर नेता की नव्ज डाक्टर नरोत्तम मिश्रा पहचान लेते थे यही कारण है कि उनके सरकार में रहते बड़े से बड़े मामले आसानी से निपट जाया करते थे। आज वर्तमान की सरकार में ऐसे संकट मोचक की भारी कमी देखने को मिल रही है। सरकार भले इस बात को स्वीकार न कर रही हो लेकिन सत्य तो यही है कि वर्तमान की स्थितियों में पूर्व गृह मंत्री डाक्टर नरोत्तम मिश्रा जैसे मंझे हुए सियासी खिलाड़ी होते तो शायद मामला इतना दूर नहीं जाता और 'घंटे' की गूंज दिल्ली तक नहीं सुनाई पड़ती।
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