एमपी में ई-बस कागजों पर चल रही है क्योंकि उसके लिए नगर सरकारें डिपो और चार्जिंग स्टेशन नहीं बना पाई सीएम के शहर में फंसे कई पेंच
मप्र के बड़े शहरों में ई-बस सेवा योजना शुरु की जा रही है लेकिन प्रदेश की नगर सरकारें अब तक डिपो ही नहीं बना सकी हैं। इंदौर और भोपाल में बस डिपो बनाने का केवल 15-15 प्रतिशत तो ग्वालियर में पांच प्रतिशत ही काम हो पाया है। चार्जिंग स्टेशनों के निर्माण में भी इंदौर, भोपाल और ग्वालियर पिछड़े हैं। केवल जबलपुर का काम संतोषजनक है। यहां कंठौंदा बस डिपो का निर्माण कार्य 70 प्रतिशत हो चुका है। मध्य प्रदेश के प्रमुख शहरों में ई-बस सेवा इसलिए शुरु हो रही है क्योंकि इन शहरों की हवा दूषित है, इसलिए इन्हें राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम के तहत चिह्नित किया है और इस दिशा में ई-बसों का संचालन महत्वपूर्ण माना जा रहा है लेकिन ई-बस संचालन में डिपो के निर्माण की धीमी गति बताती है कि इन शहरों के आमजनों को ई-बस सेवा की सुविधा के लिए अभी और इंतजार करना पड़ेगा। मुख्यमंत्री के शहर उज्जैन में 100 ई-बस चलनी है। और उसके लिए ओल्ड बस डिपो मक्सी रोड पर डिपो निर्माण किया जाना है, लेकिन यहां चौंकाने वाली बात यह है कि मेयर इन काउंसिल (एमआइसी) में अभी तक दर स्वीकृति को लेकर ही विवाद चल रहा है जिसके कारण काम रुका पड़ा है। यही हाल यहां चार्जिंग स्टेशन का है। इसी तरह सागर में 32 ई-बस संचालन के लिए नवीन आरटीओ कार्यालय तिलीमाफी में बस डिपो और चार्जिंग स्टेशन का अधोसंरचना विकास होना है। सागर नगर निगम इसकी निविदा ही जारी नहीं कर सका है। मध्य प्रदेश के इन शहरों में इतनी बसें चलाई जानी हैं। भोपाल 195, इंदौर 270, ग्वालियर 100, जबलपुर 200, उज्जैन 100, सागर 32, देवास 55 एवं सतना में 20 कुल 972 इलेक्ट्रिक बस स्वीकृत की गई है। इनमें भोपाल के लिए 100, इंदौर 150, ग्वालियर 60, जबलपुर 100, उज्जैन 30 एवं सागर में 32 इस तरह 472 ई बस के लिए सफल निविदाकार को लेटर ऑफ अवार्ड (एलओए) जारी किए जा चुके हैं। भोपाल, इंदौर, ग्वालियर और जबलपुर में में दो-दो उज्जैन व सागर में एक-एक कुल 10 डिपो के लिए सिविल एवं चार्जिंग अधोसंरचना निर्माण के लिए कार्रवाई चल रही है।
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