कार्यकर्ताओं की पार्टी कहलाने वाली बीजेपी में दो व्यक्तियों का प्रभुत्व कार्यकर्ताओं में विरोध करने का नहीं सामर्थ्य
भारतीय जनता पार्टी को कार्यकर्ता आधारित दल माना जाता है। जिसमें कार्यकर्ताओं को देव तुल्य का दर्जा दिया गया है। लेकिन उन्हीं देवतुल्य कार्यकर्ताओं को ये पता नहीं रहता कि उनकी पार्टी में क्या हो रहा है। दरअसल ये स्थिति कुछ साल पहले तक नहीं थी। हर कार्यकर्ता को थोड़ा बहुत अंदाजा रहता था कि पार्टी में किसको क्या पद मिलने वाला है लेकिन जिस प्रकार से पीएम मोदी और अमित शाह ने पार्टी में अपना वर्चस्व स्थापित किया तो कार्यकर्ता आधारित दल अब व्यक्ति वाद का शिकार हो चुकी है। कुछ साल पहले भाजपा में कोई भी फैसला लेने से पहले बैठकें हुआ करती थी। बैठक में रायशुमारी होती थी और दो से चार दिन का वक्त दिया जाता था जिससे कमेटी में शामिल लोग अन्य लोगों से भी संभावितों के विषय में बात कर लें। लेकिन पिछले कुछ सालों में बीजेपी के मूल ढांचे को पूरी तरह ध्वस्त कर उसमें कुछ नेताओं ने अपना वर्चस्व स्थापित कर दिया। अब पार्टी में वरिष्ठता का कोई महत्व नहीं रह गया। न ही ये देखा जाता कि किस कार्यकर्ता ने पार्टी के लिए कितनी मेहनत की है। अब सिर्फ ये देखा जाता है कि लंबी रेस का घोड़ा कौन होगा। और ऐसा कौन सा नेता होगा जो पद में रहते हुए भी उनके कहे अनुसार ही काम करेगा। हाल ही में राष्ट्रीय अध्यक्ष की घोषणा हुई। किसी को खबर ही नहीं थी कि नितिन नवीन भी राष्ट्रीय अध्यक्ष बन सकते हैं। नेता में कोई कमी नहीं है और एक अच्छा फैसला भी माना जा रहा है। लेकिन जिस प्रकार से फैसला हुआ वो पार्टी के कार्यकर्ताओं के गले से नहीं उतर रहा क्योंकि किसी भी नेता से रायशुमारी किए बगैर अचानक राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष की घोषणा कर दी गई जो पार्टी के कार्यकर्ताओं के लिए बड़ा झटका था। यही भाजपा कांग्रेस में परिवारवाद का आरोप लगाती रही है लेकिन भाजपा में परिवार हावी होने के बजाय व्यक्ति हावी हो चुके हैं और पार्टी में किसी नेता की इतनी मजाल नहीं कि कोई भी उन दो व्यक्तियों का विरोध कर सके।
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