भाजपा में पुराने पदाधिकारी कितने भी अच्छे हों नेतृत्व बदला है तो वो 'भरोसे' के लायक नहीं
परिवर्तन प्रकृति का नियम है लेकिन ऐसा परिवर्तन प्रकृति भी बर्दास्त नहीं करती जहां विश्वसनीयता पर ही प्रश्नचिन्ह लग जाता हो। भारतीय जनता पार्टी में कुछ ऐसा ही हाल देखने को मिलता है। चाहे सरकार हो अथवा संगठन दोनों जगहों पर मुखिया के बदलते ही पूरा स्ट्रक्चर बदल दिया जाता है। नए लोगों को मौका देने के नाम पर पुरानों की बलि दे दी जाती है। दरअसल यह पूरा खेल विश्वास का है। नए सीएम बने तो उन्हें अपने हिसाब से मंत्री चाहिए जिससे वो उनका विश्वास जीत पाएं और उसी प्रकार से संगठन में नेतृत्व बदला तो वहां भी चेहरे बदले और पुरानों को किनारे लगा दिया गया। यहां से सरकार और संगठन दोनों ही अप्रत्यक्ष तरीके से यह ठप्पा लगा देते हैं कि फलां पदाधिकारी फलां नेता का समर्थक है लिहाजा उसकी उपयोगिता अब नहीं रही। जबकि वहीं पार्टी वहीं कार्यकर्ता बदला सिर्फ नेतृत्व लेकिन उसी नेतृत्व की भेंट चढ़ता है आम पदाधिकारी जिसका कोई गाड फादर नहीं है। पुराने पदाधिकारियों को ऐसे बाहर निकाल कर फेंक दिया जाता है जैसे दूध में पड़ी मक्खी हों। मोहन सरकार में 80 फीसदी नए चेहरे शामिल हुए ठीक उसी प्रकार संगठन में खंडेलवाल के आने के बाद पुराने चेहरों को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। जबकि पुराने लोगों की सूझ-बूझ और संगठनात्मक सोच ने नगरीय निकाय,विधानसभा और फिर लोकसभा चुनाव जीतने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई उसके बाद भी पुराने पदाधिकारियों को कूड़े की तरह ऐसे फेंक दिया गया जैसे वो Use and Throw हो चुके हैं। हांलांकि वर्तमान अध्यक्ष खंडेलवाल एक सुलझे नेता हैं लिहाजा उन्होने जिन पदाधिकारियों को पद से हटाया है उनको कहीं न कहीं अर्जेस्ट करने की कोशिश की है लेकिन दोबारा वही दायित्व नहीं मिलने से पुराने पदाधिकारियों के मन में ये कसक है कि उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया गया है।
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