मंत्रियों की मजबूरी भाजपा के प्रदेश कार्यालय आना जरुरी और कार्यकर्ताओं की बात सुनना मजबूरी क्योंकि केन्द्रीय नेतृत्व का निर्देश है जरुरी
दिवाली के बाद वीरान होते भाजपा कार्यालय को एक बार फिर गुलजार कर दिया गया है। सोमवार से शुक्रवार तक रोजाना एक कैबिनेट और एक राज्य मंत्री को प्रदेश कार्यालय में अवश्य रुप से बैठना है। केन्द्रीय नेतृत्व द्वारा जारी गाइडलाइन का पालन करना सभी मंत्रियों की मजबूरी बन चुका है। केन्द्रीय नेतृत्व का टेरर इतना है कि राकेश सिंह जैसे मंत्री समय से एक मिनट पहले प्रदेश कार्यालय में आकर बैठ गए। सबसे पहले उनके पास संगठन महामंत्री हितानंद शर्मा कमरे के अंदर गए। दोनों नेता करीब 20 मिनट तक बंद कमरे में बात करते रहे तब तक उनके कक्ष के बाहर बड़ी संख्या में कार्यकर्ता अपनी बारी का इंतजार करते रहे। जब संगठन महामंत्री राकेश सिंह से मुलाकात करके निकले तो कार्यकर्ता एक-एक करके मंत्री के कक्ष में जाकर अपना परिचय देने के साथ जिला बताते पार्टी में उनका क्या दायित्व है इन सभी की जानकारी देने के बाद कार्यकर्ता एक लेटर पकड़ाता और कहता भाई साहब मेरा भी ये काम करवा दीजिए बहुत जरुरी है। मंत्री राकेश सिंह सहजता के साथ कहते जाते कि ठीक है वो काम करवा देंगे। दूसरी तरफ राज्य मंत्री दिलीप अहिरवार के कक्ष में कुछ गिने चुने लोग ही पहुंच रहे थे। इससे यह समझ में आ रहा था कि कौन सा मंत्री कितना वजनदार है। लेकिन राकेश सिंह जैसे मंत्री जिस प्रकार से कार्यकर्ताओं से मुलाकात कर रहे थे उससे यह तो समझ में आ रहा था कि वो कार्यकर्ताओं के काम करें या न करें लेकिन केन्द्र की ओर से उन पर कितना दबाव है। ठीक इसी प्रकार से राजस्थान में भी मंत्रियों को प्रदेश कार्यालय में बैठने के लिए और कार्यकर्ताओं कि बात सुनने के लिए कहा गया है। मतलब साफ है कि भारतीय जनता पार्टी नेता नहीं कार्यकर्ताओं को पहले महत्व देती है। क्योंकि कार्यकर्ता ही सरकार बनाते हैं। कार्यकर्ताओं के नाराज होने की खबरें पार्टी में लंबे समय से थी और उसी नाराजगी को खत्म करने के लिए भाजपा के केन्द्रीय नेतृत्व ने ये उपाय निकाला है जिससे हर कार्यकर्ता का काम भी हो सके और उनकी जो नाराजगी है वो भी खत्म हो सके।
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