भाजपा में गले तक 'गुटबाजी' बनी नियुक्तियों पर रोड़ा न प्रदेश कार्यसमिति और न ही निगम-मंडल की हो पाई घोषणा
मुफ्त की रेवड़ियां बांट कर मध्य प्रदेश भाजपा सरकार बनाने में कामयाब तो रही है लेकिन पार्टी की गुटबाजी गले तक आ चुकी है जिसे रोकने में पार्टी के वरिष्ठ नेता भी नाकाम साबित हो रहे हैं। हेमंत खंडेलवाल जैसा प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त होने के बाद भी पार्टी की गुटबाजी पर विराम नहीं लग पाया। अब तक कांग्रेस पर गुट और गिरोह में बंटने का आरोप लगाने वाली भाजपा आज खुद इतने गुटों में बंट चुकी है कि कोई भी फैसला लेना हो तो पार्टी में आपसी सहमति नहीं बन पाती है। प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद हेमंत खंडेलवाल ने कार्यकारिणी घोषित करने में ज्यादा समय नहीं लिया लेकिन कार्यकारिणी घोषित होते ही भाजपा के सभी गुट सक्रिय हो गए। यही कारण है कि भाजपा अब तक दस प्रकोष्ठों सहित प्रदेश कार्यसमिति की घोषणा नहीं कर पाई है। इसके अलावा एल्डरमैनों की आंशिक रुप से नियुक्ति हुई सभी जगहों पर अब तक एल्डरमैनों की भी घोषणा नहीं हो पाई। इतना ही नहीं मोहन सरकार के कार्यकाल को ढाई साल बीतने चले हैं लेकिन निगम-मंगल की घोषणा अब तक नहीं हो पाई है। जिस भाजपा में कैडर की बात हुआ करती उसी भाजपा में आब कैडर गायब है। प्रदेश अध्यक्ष नेताओं को जितना पास लाने का प्रयास करते हैं वो उतने ही दूर होते जाते हैं। भोपाल से लेकर दिल्ली तक सरकार और संगठन की की बैठकें हुई लेकिन सारी बैठकें बेनतीजा रहीं। इतना ही नहीं पिछले हफ्ते भर संघ,संगठन और सरकार के बीच तीन बार समन्वय बैठकें हुई और वो भी बेनतीजा निकलीं। प्रदेश कार्यालय में कार्यकर्ता आते तो हैं लेकिन बेमन ही दिखाई पड़ते हैं। कार्यकर्ताओं को खुश करने के लिए प्रदेश अध्यक्ष ने नवाचार शुरु किया और अब वो खुद लगातार प्रवास कर अलग-अलग क्षेत्रों में कार्यकर्ताओं के साथ मीटिंग कर रहे हैं उसके बाद भी पार्टी के कार्यकर्ताओं में प्रत्यक्ष तरीके से कोई उत्साह और बदलाव नहीं आया। पार्टी के जो नेता किसी दौर में पार्टी का आधार स्तंभ माने जाते थे वही नेता आज पार्टी के लिए समस्या बन कर खड़े हैं। कैलाश विजयवर्गीय,प्रहलाद पटेल,राकेश सिंह,भूपेन्द्र सिंह,गोपाल भार्गव,विजय शाह,फग्गन सिंह कुलस्ते सहित कुछ अन्य नेता हैं जो भाजपा का आधार स्तंभ हुआ करते थे लेकिन आज की भाजपा में ये नेता फिट नहीं बैठते। भाजपा में भी पीढ़ी परिवर्तन का दौर चल रहा है। लेकिन जो सीनियर नेता हैं वो पीढ़ी परिवर्तन को स्वीकार करने और खुद की जगह छोड़ने के लिए तैयार नहीं हैं। प्रदेश अध्यक्ष के नेतृत्व में भाजपा अलग-अलग तरह के कार्यक्रम संचालित करने जा रही है। जिसके तहत सांसद और विधायकों को भी जनता से संवाद के लिए कहा जा रहा है लेकिन कोई भी नेता चिलचिलाती धूप में अपने ऐसी रुम छोड़ कर बाहर जाने को तैयार नहीं हैं। कुल मिला कर भाजपा की गुटबाजी अब कार्यकर्ताओं के सिर चढ़ कर बोल रही है जिससे पार पाना भाजपा के लिए एक अबूझ पहेली बनता जा रहा है। निगम-मंडलों की नियुक्तियां नहीं होना सरकार की कमजोरी को प्रदर्शित कर रहा है तो वहीं प्रदेश कार्यसमिति की लेट लतीफी संगठन की कमजोरी उजागर करती दिख रही है। रणनीति बनाने में माहिर प्रदेश अध्यक्ष एक ऐसे दलदल में फंस चुके हैं जिससे निकलना उनके लिए कठिन चुनौती बनता जा रहा है।
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