निगम-मंडलों की लिस्ट में मालवा अंचल बन रहा रुकावट सीएम और कैलाश विजयवर्गीय की 'अदावत' सूची में बनी रुकावट
पिछले कुछ समय से मध्य प्रदेश की राजनीति निगम-मंडलों तक सीमित होकर रह गई है। सत्ता और संगठन के बीच आपसी समन्वय भी एक बड़ा कारण रहा है। जिस प्रकार से सीएम यादव संगठन पर भी अपना एकाधिकार चाहते हैं उसी की बानगी का प्रतीक है कि निगम-मंडल की सूची को अब तक जारी करने में सरकार और संगठन हिम्मत नहीं जुटा पाए हैं। अब Mukhbir को मिली जानकारी के अनुसार निगम-मंडल की सूची तैयार है लेकिन उसमें मंत्री कैलाश विजयवर्गीय और सीएम के बीच चल रही अंतर्कलह एक बड़ा कारण बन रही है। दरअसल निगम-मंडल के लिए प्रत्येक अंचल से एक मंत्री को कोआर्डिनेटर बनाया गया है। जिसके तहत मालवा अंचल का कोआर्डिनेटर मंत्री कैलाश विजयवर्गीय को बनाया गया है। और सूची में देरी का कारण भी यही कोआर्डिनेशन बन रहा है। पहले इंदौर के भागीरथपुरा में दूषित पानी मामले के चलते मामला ठंडे बस्ते में गया उसके बाद कैलाश विजयवर्गीय ने सूची में शामिल कुछ नामों को लेकर आपत्ति जता दी। क्योंकि कैलाश विजयवर्गीय को मालवा अंचल से कोआर्डिनेटर बनाया गया है इसलिए वो सूची में अपने करीबियों को डलवाना चाहते हैं। और सीएम यादव चाहते हैं कि निगम-मंडल में उनके करीबी रहें। जिस प्रकार से पार्टी के अंदर वर्चस्व की लड़ाई चल रही है उसको देखते हुए कैलाश विजयवर्गीय को 26 जनवरी के दिन समिधा हाजिर होने का आदेश दिया गया था। वो गुप्त रुप से समिधा गए भी थे जहां पर संघ के पदाधिकारियों के बीच उनकी काफी देर तक बात हुई है। वहीं इस पूरे मामले में संगठन की भी कुछ महत्वकांक्षाएं हैं जिसके तहत संगठन चाहता है कि सूची में ऐसे लोगों को शामिल किया जाए जिनसे साल 2028 में होने वाले विधानसभा चुनाव में भी लाभ हो सके। इन सभी उधेड़बुन के चलते सूची फायनल होने के बाद भी रुकी हुई है। दूसरी तरफ जो लोग निगम मंडल के दावेदार हैं उनके धैर्य का बांध फूट रहा है। सूची का इंतजार अब करने लगा है। जल्द ही सरकार और संगठन मिल कर निगम-मंडल की सूची को लेकर अंतिम निर्णय नहीं लेते हैं तो पार्टी को अंदरुनी तौर पर अंतरद्वंद से गुजरना पड़ सकता है। लगातार बढ़ता इंतजार अब अमावस की रात की तरह महसूस होने लगा है। ऊपर से मोहन सरकार के करीब ढाई साल होने वाले हैं और निगम-मंडलों का कार्यकाल तीन साल का होता है। चुनाव आचार संहिता लागू होने के बाद सभी निगम-मंडल निस्क्रृय हो जाते हैं इसी लिए दावेदारों को टेंशन हो रही है कि वो लिस्ट में शामिल भी होंगे तो उन्हें तीन साल का कार्यकाल भी नहीं मिल पाएगा।
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