एक नेता पर सिमटी विंध्य की राजनीति ने भविष्य के नेताओं के रास्ते पर बिछाए 'कांटे' भाजपा को होगी दिक्कत
मध्य प्रदेश में विंध्य की जनता भाजपा और कांग्रेस दोनों के लिए रहस्य से कम नहीं रहे हैं। यहां की राजनीति किसी भी नेता के बस की बात नहीं रही है। लेकिन विंध्य में भाजपा हो या फिर कांग्रेस इन पार्टियों ने एक से अधिक नेता तैयार नहीं होने दिया। हांलाकि कांग्रेस के दौर में अर्जुन सिंह और श्रीनिवास तिवारी दो नेता हुआ करते थे लेकिन अर्जुन सिंह के राष्ट्रीय राजनीति में होने के कारण श्रीनिवास तिवारी ने अपना वर्चस्व बनाए रखा। उनके बाद भारतीय जनता पार्टी ने विंध्य में एंट्री मारी और एकतरफा भाजपा के पक्ष में सीटें आई। लेकिन समस्या यहां भी जस की तस बनी रही। भाजपा ने राजेन्द्र शुक्ल को आगे किया तो बस वही आगे रहे उनके आसपास भी कोई नेता फटकने नहीं पाया। ऐसा भी नहीं है कि विंध्य में भाजपा के पास नेताओं की कमी है लेकिन राजेन्द्र शुक्ल के आगे भाजपा संगठन ने दूसरे नेता को आगे बढ़ाने का प्रयास भी नहीं किया। दरअसल रीवा में भाजपा के सभी विधायक दूसरे दलों से आए हुए नेता हैं। उसी तरह राजेन्द्र शुक्ल भी कांग्रेस से ही आए थे लेकिन उन्हें भाजपा ने आत्मसात कर लिया और अन्य नेताओं पर दलबदलू नेता का ही टैग लगा रह गया और उसके कारण विंध्य से अन्य नेताओं को आगे नहीं बढ़ने दिया गया। इसके पीछे ग्वालियर-चंबल का भी बड़ा योगदान है। मध्य प्रदेश भाजपा में ग्वालियर-चंबल का एकाधिकार रहा है वहीं के नेताओं में पार्टी की बागडोर ज्यादातर रही है इसलिए वो हमेशा चाहते थे कि अन्य क्षेत्रों के नेताओं का पार्टी में वर्चस्व स्थापित न होने पाए और इसी लिए विंध्य के नेता हमेशा बीजेपी में उपेक्षित किए जाते रहे। रही-सही कसर राजेन्द्र शुक्ल पूरी कर देते हैं क्योंकि उन्हें ये बात मालूम है कि अगर उनकी तरह कुछ और नेता आगे आए तो उनकी बादशाहत खतरे में आ जाएगी लिहाजा राजेन्द्र शुक्ल अन्य नेताओं को उड़ान भरने से पहले ही उनके पर कुतर देते हैं। यही स्थिति चलती रही तो आने वाले समय में भाजपा का भी विंध्य में वही हश्र होने वाला है जो अभी कांग्रेस का हो रहा है।
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