बीजेपी के विधायकों पर साल भर सिर चढ़ कर बोलता रहा सत्ता का 'नशा' बेलगाम होती जुबान पर अंकुश लगाने में नाकाम रहे सरकार और संगठन
मप्र में भारतीय जनता पार्टी की सरकार को 20 वर्ष से ज्यादा का समय हो चुका है। समय बदलने के साथ मंत्री बदले,विधायक बदले और सीएम भी बदले लेकिन नहीं बदला तो विधायकों के सिर पर चढ़ता सत्ता का नशा। मप्र में हमेशा दो दलीय व्यवस्था रही है। लेकिन पिछले कुछ सालों में भाजपा मजबूत होती चली गई और कांग्रेस लगातार रसातल की ओर जाती गई जिसके कारण प्रदेश में सत्ताधारी दल भाजपा का एकाधिकार होता चला गया। भाजपा की प्रचंड बहुमत का असर विधायकों के सिर चढ़ कर बोलने लगा। विधायक हों अथवा मंत्री सभी ने अपनी जुवानी मर्यादाएं लांघी। बयानों में महिलाओं तक को नहीं छोड़ा गया। जातियों के आगे सरकार झुकती रही। भाजपा के करीब दर्जन भर विधायकों ने विवादित बयान दिया और जमकर सुर्खियां बटोरी। भोपाल में भी उसका असर देखने को मिला संगठन महामंत्री से लेकर प्रदेश कार्यालय और गुप्त रुप से नदी का घर में भी बैठकें होती रहीं लेकिन विधायकों ने संघ और संगठन की बात एक कान से सुनी तो दूसरे कान से निकाल दी। कुछ साल पहले तक इसी भाजपा का आलम ये हुआ करता था कि विधायकों को प्रदेश कार्यालय में तलब किया जाता था तो उसके बाद अपेक्षित परिणाम भी आते थे लेकिन अब ऐसी स्थिति बनती गई कि विधायकों में संगठन के प्रति कोई डर ही नहीं रहा है। मंत्री विजय शाह ने महिला अधिकारी के खिलाफ विवादित बयान दिया लेकिन आदिवासी वोट खिसकने के डर से सरकार और संगठन ने कोई एक्शन नहीं लिया। प्रतिमा बागरी का भाई गांजा तस्करी में पकड़ा गया लेकिन उसके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई। मंत्री नरेन्द्र शिवाजी पटेल दो से तीन बार मीडिया कर्मियों से भिड़े विवाद बढ़ता रहा लेकिन सरकार के कान तक आवाज नहीं पहुंची। विश्वास सारंग जैसे मंत्री का मछली कांड में नाम आया उनकी तस्वीरें और वीडियो जमकर वायरल हुए लेकिन सरकार और संगठन ने पूरे मामले में संज्ञान ही नहीं लिया। इसी सरकार में पत्रकारों को लगातार टारगेट किया गया कई पत्रकारों को अलग-अलग तरीकों से मामलों में फंसाया गया पीटा गया लेकिन सरकार ने कोई एक्शन नहीं लिया। प्रदेश की मोहन सरकार में संतोष वर्मा जैसा अधिकारी ब्राह्मण बेटियों पर अभद्र टिप्पणी करता रहा और सरकार ने कोई भी ऐक्शन नहीं लिया। तरह-तरह के विवाद और घटनाएं होती रहीं सरकार के दो साल बीत गए और आज स्थिति ये है कि अब सरकार को अपना काम चीख-चीख कर बताना पड़ रहा है लेकिन फिर भी काम दिख नहीं रहा है। ब्रांडिंग में तो पैसे खर्च किए जा रहे हैं वहीं पैसे विकास कार्यों में लगाए गए होते तो शायद तस्वीर कुछ अलग होती लेकिन सीएम की मुस्कुराहट के पीछे सबकुछ छिपता रहा और सामने सबकुछ ठीक लेकिन पीछे देवी जुवां लोग यही कहते रहे कि सरकार का तंत्र पूरी तरह फेल है। कानून व्यवस्था पूरी तरह चौपट रही। और सीएम गृह मंत्रालय अपने पास लेकर बैठे रहे फिर भी कोई सुधार नहीं हुआ।
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