विंध्य में ब्राह्मणों की उपेक्षा और कुर्मी समाज की निकटता ने कांग्रेस का किया बंटाधार आगे भी शून्य के बराबर उम्मीद
मध्य प्रदेश की राजनीति में विंध्य को वो स्थान नहीं मिलता जिसका वो हकदार है। जबकि हकीकत यही है कि विंध्य की जनता जिसके साथ होती है सरकार उसी की होती है। दरअसल विंध्य एक ब्राह्मण बाहुल क्षेत्र है। यहां पर ब्राह्मणों के अलावा क्षत्रियों का ही वर्चस्व रहा है। जब तक कांग्रेस के पास रीवा से श्रीनिवास तिवारी और सीधी से अर्जुन सिंह थे तब तक मध्य प्रदेश की सत्ता में कांग्रेस का राज था। लेकिन दोनों नेताओं के दिवंगत होते ही कांग्रेस विंध्य में जातिगत समीकरण साधने में नाकाम हो गई। कांग्रेस पार्टी की तरफ से कुर्मी समाज पर ज्यादा विश्वास दिखाया गया। 15 महीने की सरकार में कमलेश्वर पटेल को मंत्री बनाया गया और उन्हीं के हाथों विंध्य की राजनीति सौंप दी गई। कमलेश्वर पटेल ठहरे कट्टर कुर्मी पक्षी उन्होंने न सिर्फ सीधी बल्कि रीवा और सतना सहित अन्य जिलों में कुर्मी समाज के नेताओं को ही चुनाव मैदान में प्राथमिकता दी। कांग्रेस आला कमान भी कमलेश्वर पटेल के कहे अनुसार ही चलता रहा। नतीजा यह निकला कि कांग्रेस विंध्य में शून्य हो गई। मजे की बात यह है कि बार-बार झटके खाने के बाद भी कांग्रेस नेता और कांग्रेस का नेतृत्व नहीं संभला। जिस विंध्य में ब्राह्मण और क्षत्रियों के कहने से लोग वोट देते हैं उस विंध्य में कांग्रेस ऐसे वर्ग को महत्व देती रही जिसका जनाधार सिर्फ अपने वर्ग तक ही सीमित रहा है। दरअसल विंध्य में कुर्मी समाज अपने समाज के लोगों को ही वोट देता है। बांकी अन्य जितने भी समाज हैं वो ब्राह्मण और क्षत्रियों के कहने पर वोट देते हैं। कांग्रेस जब तक विंध्य में ब्राह्मण और क्षत्रिय नेता तैयार नहीं करेगी तब तक कांग्रेस पार्टी की विंध्य में दुर्गति होती रहेगी और मध्य प्रदेश में भाजपा की सरकार बनती रहेगी। विंध्य से भाजपा के लिए एकतरफा वोटिंग होती है क्योंकि भाजपा विंध्य में सोशल इंजीनियरिंग का फंडा अपनाती है। वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस पार्टी किसी एक नेता के कहने से टिकट बांटती है और हर बार हार का सामना करती है।
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