निगम-मंडल अध्यक्षों को 'दर्जा' नहीं मिला तो वो खुद ही अपना 'दर्जा' दिखाने लगे और जिस डाली पर बैठे उसी डाली को काटने लगे
तत्कालीन शिवराज सरकार में निगम-मंडल के अध्यक्षों को कैबिनेट और राज्य मंत्री का दर्जा दिया जाता था। उस दर्जे के बल पर वो अध्यक्ष खुद को मंत्री के बराबर समझने की गलतफहमी पाले रहते थे। लेकिन मोहन सरकार में निगम-मंडल के अध्यक्षों की करीब डेढ़ महीने से ज्यादा की घोषणा हो चुकी है लेकिन अब तक उन्हें 'दर्जे' का इंतजार है। सभी अध्यक्षों को सरकारी वाहन तो दे दिए गए हैं जिसका वो पूरी सिद्धत के साथ इस्तेमाल भी कर रहे हैं लेकिन सरकार की तरफ से दर्जा नहीं मिलने के कारण अब वही अध्यक्ष खुद का दर्जा बनाने लगे हैं। उस दर्जे के चक्कर कुछ अध्यक्षों ने सरकार और सीएम के लिए समस्या भी खड़ी कर दी है। एक अध्यक्ष तो ऐसे भी हैं जो आए दिन सीएम मोहन यादव के साथ फोटो खिंचवाते रहे और सोशल मीडिया में उनका करीबी होने का दंभ भरते रहे। आखिर ऐसा हो भी क्यों नहीं भाजपा कार्यालय में सहयोग सेल के को-आर्डिनेशन का काम संभालने वाले इन महाशय पर सीएम साहब ने ऐसी असीम अनुकंपा की जिससे वो एक मलाईदार विभाग के अध्यक्ष बन गए। अध्यक्ष बनते ही उन्होंने एक ऐसी डाली पर कुल्हाड़ी मारना शुरु कर दिया जिस डाली पर वो खुद बैठे थे। अध्यक्ष बनने के बाद दर्जा तो मिला नहीं था लिहाजा उन्होंने खुद का दर्जा दिखाते हुए कांग्रेस अध्यक्ष के वेयर हाउसों में छापा मारना शुरु कर दिया। उन्हें भाजपा नेताओं के वेयर हाउस नहीं दिखे- अगर दिखे तो सिर्फ कांग्रेस नेताओं के वेयर हाउस। आखिर उन अध्यक्ष ने अपना दर्जा इतना बड़ा कर दिया कि उनके दर्जा दिखाते ही सीएम पर और उनके पूरे परिवार पर जमीन खरीदी के आरोप लग गए। छापों के चक्कर में साहब ने दो-तीन दिन जमकर सुर्खियां बटोरी लेकिन वो सुर्खियां दो दिन बाद इतना भयावह रुप ले लेगी उन अध्यक्ष महोदय को अंदाजा भी नहीं था। आखिर दर्जा दिखाने के चक्कर में साहब ने सीएम मोहन यादव की छवि को ही धूमिल करवा दिया। अब जमीन खरीदी प्रकरण आने के बाद अध्यक्ष जी घर पर अपने दर्जे का इंतजार कर रहे हैं और अब उन्हें पार्टी भी कोई दर्जा नहीं दे रही है।
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