ओबीसी और आदिवासियों के सामने 'घुटने' टेकती भाजपा से दूर होता सवर्ण 'कॉकरोच' के आने से यूथ वर्ग भाजपा से कर रहा पलायन
सोशल इंजीनियरिंग के मामले में भाजपा का कोई तोड़ नहीं और वही ताकत भाजपा को सत्ता के सिखर तक पहुंचाने का बड़ा कारण बनती रही है। लेकिन पिछले कुछ सालों में मध्य प्रदेश भाजपा कुछ वर्गों के सामने घुटने टेकती रही है जिसके कारण भाजपा का कोर वोटर भाजपा से नाराज होकर भी मौका देता रहा। लेकिन अब पानी सिर से ऊपर हो रहा है। दरअसल भाजपा की नींव सवर्ण वर्ग द्वारा रखी गई थी। सवर्ण वर्ग ने भाजपा को अपने खून पसीने से सींचा कर आज इस मुकाम तक पहुंचाया कि केन्द्र से लेकर देश के करीब बीस राज्यों में भाजपा की सरकार है। लेकिन बदले समीकरण और वोट के ध्रुवीकरण को देखते हुए भाजपा ने अपना स्टैंड बदला और पार्टी के मुख्य केन्द्र बिंदु में ओबीसी और आदिवासी वर्ग आ गए। पीएम मोदी से लेकर एमपी के सीएम मोहन यादव तक ओबीसी वर्ग को भाजपा ने प्रतिनिधित्व दिया। मंत्रिमंडल और संगठन में भी ओबीसी वर्ग का वर्चस्व है। पार्टी में ओबीसी वर्ग के नाम पर एक हउआ बनाया गया है कि ओबीसी वर्ग के बिना सरकार नहीं बन सकती। जबकि ये एक ऐसा वर्ग है जिसका वोट कभी भी स्थाई रुप से भाजपा अथवा कांग्रेस को नहीं मिला। ओबीसी वर्ग हो या फिर आदिवासी वर्ग इनके वोट अक्सर एक से दूसरी पार्टी में शिफ्ट होते रहे हैं। उसके बाद भी ओबीसी और आदिवासियों को साधने के चक्कर में भाजपा सवर्ण वर्ग को पीछे धकेलती रही है। उसका सबसे बड़ा जीवंत उदाहरण यह है कि एमपी बीजेपी के आठ राज्यसभा सांसद हैं लेकिन उनमें एक भी स्वर्ण वर्ग का सांसद नहीं है। वर्तमान सांसदों में एससी,एसटी और ओबीसी वर्ग से ही सांसद हैं। अब जून के महीने में राज्यसभा की तीन सीटों में चुनाव होने जा रहा है जिसमें दो सीट भाजपा के खाते की है तो एक सीट कांग्रेस के खाते की है। एक सीट पर आदिवासी चेहरा सुमेर सिंह सोलंकी तो दूसरी सीट पर जार्ज कुरियन राज्यसभा सांसद हैं। इन दोनों के एक बार फिर रिपीट होने की प्रबल संभावनाएं बन रही हैं। मतलब साफ है कि एक बार फिर भाजपा सवर्ण वर्ग के हाथ में झुनझुना ही थमाने की तैयारी में है। अगर इस बार भाजपा ऐसा करती है तो बड़ी संख्या में सवर्ण वर्ग भाजपा से अलग हो सकता है। इस बात में कोई सक नहीं कि आदिवासी और ओबीसी वर्ग भाजपा के कभी भी स्थाई वोटर नहीं रहे जबकि सवर्ण वर्ग भाजपा का स्थाई रुप से वोटर रहा है। उसके बाद भी सवर्णों के हाथ खाली ही रहे हैं। दूसरी तरफ 'कॉकरोच' जनता पार्टी ने जिस प्रकार से मध्य प्रदेश में दस्तक दी है उससे भाजपा के साथ से युवा वर्ग का वोट भी खिसकने की स्थिति में पहुंच रहा है। भाजपा के दो ही कोर वोटर माने जाते हैं। सामान्य वर्ग और यूथ। मोदी अपने प्रत्येक संबोधन में युवा वर्ग की बात करते हैं लेकिन रोजगार की बात आती है तो युवाओं को आश्वासनों का झुनझुना थमा दिया जाता है। ऐसी स्थिति में युवा वर्ग तीसरे विकल्प की तलाश में हैं। कांग्रेस में किसी को विश्वास नहीं और भाजपा की रणनीति के कारण युवा वर्ग और सामान्य वर्ग उससे दूर होने की स्थिति में हैं। अब भी अगर भाजपा उचित फैसला नहीं लेती है तो उसके सामने साल 2018 जैसी स्थिति बनने में देर नहीं लगेगी।
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