भाजपा में 'छत्रपों' के आगे कमजोर पड़ता संगठन और मजबूत होते 'छोटभइया' नेता अगले चुनाव में बनेंगे समस्या
जिस भारतीय जनता पार्टी को कैडरबेस पार्टी कहा जाता था जहां पर अनुशासन को ही सर्वोच्च स्थान दिया जाता था उसी पार्टी में आज जिस नेता के मन में जो आता है वही कह देता है। औपचारिकता के नाम पर संगठन की तरफ से बुलाया जाता है और समझाइश दी जाती है और फिर वही पुराना ढर्रा शुरु हो जाता है। मुफ्त की रेवड़ियां बांट कर सरकार तो बनाने में भाजपा कामयाब हो रही है लेकिन आंतरिक स्थिति लगातार कमजोर होती चली जा रही है। मजबूत संगठन के नाम से पहचानी जाने वाली भाजपा में आज छोटभइया नेता हावी होते जा रहे हैं। प्रीतम लोधी जैसे नेता आज सरकार और संगठन को आइना दिखाते नजर आ रहे हैं। लेकिन उनके खिलाफ कोई एक्शन न लेना संगठन की कमजोरी को दर्शाता है। जिस दिन भाजपा एक भी विधायक पर कड़ा ऐक्शन लेगी उसी दिन पार्टी की स्थिति सुधर जाएगी लेकिन संगठन में आत्म विश्वास की इतनी कमी दिख रही है कि कोई एक्शन लेना तो दूर। ऐसा उदाहरण ही नहीं पेश किया जा रहा जिससे नेताओं की जुवान पर ताला लग सके। इसके पीछे प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल की सहजता और सरलता भी एक बड़ा कारण साबित हो रही है। संगठन का नेतृत्व करने वाले नेता की जुवान पर शहद जैसी मिठास होनी चाहिए लेकिन समय आने पर जुवान में तलवार जैसी धार भी होनी चाहिए। लेकिन प्रदेश अध्यक्ष ने अपना एक जोन स्थापित कर रखा है जिससे वो बाहर निकलना ही नहीं चाहते। प्रदेश कार्यालय में कार्पोरेट सिस्टम तो लागू कर दिया लेकिन संगठन में ढिलाई पार्टी के लिए भारी पड़ती जा रही है। प्रदेश अध्यक्ष की सहजता को हर कार्यकर्ता सराहता है लेकिन जब उनके फैसलों की बात आती है तो वही कार्यकर्ता पीठ पीछे अध्यक्ष की बुराई करने से कोई परहेज नहीं करता है। यही कारण है कि भाजपा में धीरे-धीरे छत्रप तैयार होते जा रहे हैं। टाट-दरी बिछाने वाले कार्यकर्ता भी प्रदेश अध्यक्ष के फैसलों से सहमत नजर नहीं आते हैं। नया अध्यक्ष मिलने के बाद पार्टी के कार्यकर्ताओं को काफी उम्मीद जागी थी लेकिन समय बीतने के साथ कार्यकर्ताओं के मन में पार्टी और संगठन के प्रति बनी तस्वीर भी अब धुंधली होती जा रही है।
What's Your Reaction?