सुमेर सिंह सोलंकी जिन्होंने कभी सीएम कभी प्रदेश अध्यक्ष तो कभी केन्द्रीय मंत्रिमंडल में शामिल होने का सपना देखा
भारतीय जनता पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व ने मध्य प्रदेश से राज्यसभा की दो सीटों के लिए राष्ट्रीय महामंत्री तरुण चुघ और प्रदेश भाजपा के नेता रजनीश अग्रवाल को उम्मीदवार घोषित करते ही सुमेर सिंह सोलंकी की राजनीतिक नैया को महज छह साल में ही किनारे लगा दिया। सुमेर सिंह सोलंकी आदिवासी वर्ग से आते हैं और एक युवा चेहरा हैं। लेकिन जिस विश्वास से भाजपा ने सुमेर सिंह सोलंकी को देश के सर्वोच्च सदन तक भेजा उस विश्वास पर सुमेर सिंह सोलंकी करें नहीं उतर पाए। सुमेर सिंह सोलंकी बड़वानी से आते हैं और एक आदिवासी नेता हैं। राजनीतिक विश्लेषक कयास लगा रहे थे कि सुमेर सिंह सोलंकी को आदिवासी होने का लाभ मिलेगा और वो एक बार फिर देश के सर्वोच्च सदन की सीढ़ी चढ़ने में कामयाब होंगे लेकिन ऐसा नहीं हो पाया। दरअसल सुमेर सिंह सोलंकी ने राज्यसभा सांसद बनते ही बड़े सपने देखने शुरु कर दिए थे। जिस प्रकार से उन्हे 'छपास' की बीमारी लगी वो उनके लिए घातक साबित हुई। सुमेर सिंह सोलंकी खुद को सीएम पद का दावेदार मानने के साथ केन्द्रीय मंत्रिमंडल में शामिल होने का भी सपना संजो रहे थे। यहां तक कि उन्हें लगा था कि वो भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष भी बन सकते हैं लेकिन उनके कोई भी मंसूबे पूरे नहीं हुए। वर्तमान में प्रदेश महामंत्री के पद पर मौजूद सुमेर सिंह सोलंकी आदिवासी वर्ग के बीच अपनी और पार्टी की पैठ मजबूत करने में नाकाम रहे। उनके रहते बड़वानी में भाजपा को उतना महत्व नहीं मिला जितने की उम्मीद थी। सुमेर सिंह सोलंकी अक्सर पीएम मोदी,अमित शाह के साथ फोटो खिंचवाने और उसे वायरल करने में काफी व्यस्त थे। हांलांकि उन्होंने मिट्टी के बर्तन बनाने के साथ मेक इन इंडिया के सपने को साकार करने में अपनी तरफ से हल्के प्रयास किए लेकिन वो नाकाफी थे। मध्य प्रदेश भाजपा की तरफ से सुमेर सिंह सोलंकी को आदिवासी नेता बनाने का पर्याप्त मौका दिया गया लेकिन प्रत्येक मौके पर सुमेर सिंह सोलंकी नाकाम होते रहे। राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं उन पर इतनी हावी हो गई कि पार्टी का हित उन्होंने पीछे कर दिया और अपने हित को आगे रखा यहीं से उनके पतन का दौर शुरु हो गया।
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