'स्वावलंबी गौशाला' योजना में गाय तो दूर जमीन ही नहीं मिली टेंडर में दुबई और ऑस्ट्रेलिया के लोग हुए थे शामिल
सरकार की "स्वावलंबी गौशाला योजना" का हाल सुनेंगे तो कहेंगे - गाय के नाम पर सिर्फ कागज ही स्वावलंबी हैं।
जिस योजना को बेसहारा गोवंश के लिए संजीवनी बताया जा रहा था, उसी की फाइलें एलओआई यानी "लेटर ऑफ इंटेंट" में ही दम तोड़ गईं। नतीजा? मंत्री का विभाग ही चला गया।
मामला क्या है?
राज्य सरकार ने बेसहारा गायों के लिए "मुख्यमंत्री स्वावलंबी गौशाला योजना" लॉन्च की थी। 5000 गाय पर 125 एकड़ जमीन + पैसा, सबका इंतजाम। तारीफ भी खूब हुई।
लेकिन हकीकत में हुआ क्या?
25 जिलों में 29 जगह टेंडर निकले। 7 जगह टेंडर, 4 जगह LOI भी जारी हो गई - रायसेन, दमोह, सागर, रीवा। पर जमीन आवंटित एक की भी नहीं हुई।
शिकायत ऊपर तक पहुंची तो केंद्र से फटकार आई। और बस... ताबड़तोड़ 2 घंटे में फैसला। राज्यमंत्री लखन पटेल से पशुपालन एवं डेयरी विभाग छीनकर सीधा CM डॉ. मोहन यादव के पास। राजपत्र में भी आधी रात को नोटिफिकेशन चिपका दिया गया।
अब लखन पटेल "संपर्क के बाहर" हैं।
अब क्या होगा?
सरकार को उम्मीद है कि अब CM के पास विभाग आने से फाइलों की रफ्तार बढ़ेगी। 14 जिलों में 461 एकड़ से 135 एकड़ तक जमीन चिन्हित तो है। बस कागज से जमीन पर आना बाकी है।
टेंडर में दुबई और ऑस्ट्रेलिया तक के लोग कूदे थे। पर यहां LOI के आगे बात नहीं बढ़ी।
विपक्ष का तंज
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने चिट्ठी लिखकर कहा - "विभाग बदलने से कुछ नहीं होगा, व्यवस्था बदलो"।
उन्होंने मांग की कि सभी गौशालाओं की हकीकत सार्वजनिक हो, गौपालकों के लिए राहत पैकेज आए और गोवंश की समस्या का स्थायी हल निकले।
एक गाय पर रोज 40 रुपये का अनुदान भी कागज पर ही चल रहा है।
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